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खजुराहो के मंदिरों के शिल्प सौंदर्य को देखना किसी अध्यात्मिक यात्रा से कम नहीं

वह दिन आज भी मेरे स्मृति पटल पर तैर जाता है जब अपने मित्रों के साथ झांसी से प्रातः बस से रवाना होकर करीब चार धंटे का सफर तय कर विश्व में बेमिसाल कला के प्रतिमान मंदिरों की धरती खजुराहो पर कदम रखा था। मंदिरों के आसपास ही ठहरने के लिए दो कमरे लिए और अल्पाहार कर हम चल पड़े खजुराहो के मंदिरों के दर्शन करने के लिये। सबसे पहले हमारे सामने थे पश्चिम मंदिर समूह परिसर के एक विशाल उद्यान में ऊंचे शिखर वाले अनेक मंदिर जो ऊँचे चबूतरों पर बने हैं। हमारी मंदिर यात्रा का पहला मंदिर था मंतगेश्वर जो सबसे प्राचीन मंदिर है। पिरामिड शैली में बने मंदिर के गर्भगृह में करीब एक मीटर व्यास का ढाई मीटर ऊंचा शिवलिंग देखते ही बनता है। इसे 920 ई. में राजा हर्षवर्मन ने बनवाया था।

इसके समीप ही स्थित विशाल लक्ष्मण मंदिर पंचायतन शैली में बना है जिसके चारो कोनों पर एक.एक उप मंदिर बने हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर रथ पर सवार सूर्यदेव नजर आते हैं। मंदिर की बाह्य दीवारों पर असंख्य मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मूर्तियों की भाव.भंगिमाएं एवं सुंदरता देखते ही बनती है। तीन कतारों में प्रमुख मूर्तियों की श्रृंखला है। कुछ कतारें छोटी मूर्तियों की हैं। मध्य ताखों में देव प्रतिमाएं हैं। नृत्यए संगीतए युद्ध, शिकार आदि प्रतिमाओं में तत्कालीन जीवन के दर्शन होते हैं। अन्य मूर्तियों में विष्णु, शिव, अग्निदेव, गंधर्वए सुर.सुंदरी, देवदासी, तांत्रिक, पुरोहित, और काम कला की प्रतिमाये हैं। एक मूर्ति में नायक.नायिका द्वारा एक -दूसरे को उत्तेजित करने के लिये नख.दंत का प्रयोग कर रहे हैं।मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की त्रिमूर्ति प्रतिमा विराजित है। अंदर की दीवारों पर भी मूर्तियों का खजाना हैं। मंदिर के चबूतरे पर भी विविध विषयों के साथ सामूहिक मैंथुन की मूर्तियां अद्भुत शिल्प लिये हैं। मंदिर के सामने लक्ष्मी मंदिर एवं वराह मंदिर बने हैं।

पास में ही कंदारिया महादेव का मंदिर सभी मंदिरों से अलग है जो काम शिक्षा के लिए मशहूर है। मंदिर की बनावट और अलंकरण भी अत्यंत वैभवशाली है और मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर का प्रवेश द्वार 9 शाखाओं से युक्त है जिन पर कमल ,पुष्प, नृत्यमग्न अप्सराएं तथा व्याल आदि बने हैं। सरदल पर शिव की चारमुखी प्रतिमा बनी है। इसके पास ही ब्रह्मा एवं विष्णु भी विराजमान हैं। गर्भगृह में संगमरमर का विशाल शिवलिंग स्थापित है। मंडप की छतों पर भी पाषाण कला के सुंदर चित्र बने हुुुए हैं।बाह्य दीवारों पर सुर.सुंदरी नर.किन्नर, देवी.देवता व प्रेमी.युगल आदि सुंदर रूपों में अंकित हैं। मध्य की दीवारों पर कुछ अनोखे मैथुन दृश्य चित्रित हैं। एक स्थान पर ऊपर से नीचे की ओर एक क्रम में बनी तीन मूर्तियां कामसूत्र की अनुकृति कही जाती हैं। इसमें मैथुन क्रिया के आरंभ में आलिंगन व चुंबन के जरिए पूर्ण उत्तेजना प्राप्त करने का महत्व दर्शाया गया है। एक अन्य दृश्य में एक पुरुष शीर्षासन की मुद्रा में 3 स्त्रियों के साथ रतिरत नजर आता है। विशालतम मंदिर की बाह्य दीवारों पर कुल 646 मूर्तियां हैं तो अंदर भी 226 मूर्तियां जड़ी हैं। इतनी मूर्तियां शायद अन्य किसी मंदिर में नहीं हैं। सप्तरथ शैली में बना यह मंदिर सबसे विशाल करीब 117 फुट लंबाए 66 फुट चैडा एवं 117 फुट ऊंचा है । इस मंदिर का निर्माण राजा विद्याधर ने मोहम्मद गजनवी को दूसरी बार परास्त करने के बाद 1065 ई. के आसपास करवाया था।

इन मंदिरों के दर्शन कर दूसरे दिन यहाँ से आगे की यात्रा विश्वनाथ मंदिर से शुरू हुई । इससे पहले पार्वती का एक नवनिर्मित मंदिर है। यहां स्थित प्राचीन मंदिर खंडित हो चुका था। छतरपुर के महाराजा ने 1880 के आसपास वर्तमान मंदिर बनवाकर उसमें पार्वती की प्रतिमा की स्थापना की। यह मंदिर अन्य मंदिरों से भिन्न है। इस के आगे विश्वनाथ मंदिर शिव को समर्पित है। मंदिर की सीढ़ियों के आगे दो शेर और हाथी बने हैं। मंदिरों में देव प्रतिमाएँ अष्टदिकपाल, नाग कन्याएं, अप्सराएं , राजसभा, रासलीला, विवाह, उत्सव, वीणा बजाते नायिका एवं पैर से कांटा निकलती अप्सरा आदि मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। आलों में चामुंडा, कौमारी, वैष्णवी, वराही महेश्ववरी, नटराज आदि मूर्तियां हैं। यह मंदिर 90 फुट ऊंचा और 45 फुट चैडा है। इस मंदिर का निर्माण 1002 ई. में राजा धंगदेव द्वारा करवाया गया था। प्रमुख मंदिर के सामने चैकोर मंडप में शिव के वाहन नंदी की 6 फुट ऊँची दर्शनीय प्रतिमा है।

विश्वनाथ मंदिर के आगे चित्रगुप्त मंदिर सूर्यनारायण को समर्पित है। मंदिर की दीवारों पर अन्य मूर्तियों के मध्य उमा-महेश्वर,लक्ष्मी नारायण और विष्णु के विराट रूप में मूर्तियां भी हैं। जनजीवन की मूर्तियों में पाषाण ले जाते श्रमिकों की मूर्तियां मंदिर निर्माण के दौर को दर्शाती हैं। मुख्य प्रतिमाओं के मध्य व्याल व शार्दूल नामक पशुओं की प्रतिमाएं हैं जो हर मंदिर पर बनी हैं। चित्रगुप्त मंदिर की दीवारों पर नायक-नायिका को आलिंगन के विभिन्न रूपों में उत्कीर्ण किया गया है। गर्भगृह में 7 घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य की प्रतिमा विराजमान है। निकट ही हाथ में लेखनी लिए चित्रगुप्त बैठे हैं।

चित्रगुप्त मंदिर से कुछ आगे जगदंबी मंदिर है। मूलत यह मंदिर विष्णु को समर्पित था लेकिन मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। छतरपुर के महाराजा ने जब इन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तब यहां जगदंबा की प्रतिमा स्थापित की गई। इस मंदिर में अन्य देव प्रतिमाओं के साथ यम की प्रतिमा भी विद्यमान है। यहां भी दीवारों पर कुछ अच्छे मैथुन दृश्य देखने को मिलते हैं। प्रवेश द्वार पर चतुर्भुजी विष्णु गरूड़ पर आसीन नजर आते हैं। मंदिर के आलियों में सरस्वती एवं लक्ष्मी की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जगदंबी मंदिर के निकट ही महादेव मंदिर है। इस छोटे मंदिर का मूल भाग खंडित अवस्था में है तथा वेदी भी नष्ट हो चुकी है। प्रवेश द्वार पर एक मूर्ति में राजा चंद्रवर्मन को सिंह से लड़ते दर्शाया गया है। यह दृश्य चंदेलों का राजकीय चिह्न बन गया था।इसका निर्माण राजा घँगदेव ने 1025 ईण्में करवाया था।

खजुराहो के प्राचीन गांव के निकट थोड़ी-.थोड़ी दूरी पर स्थित पूर्वी मंदिरों को देखने के लिए हमने साइकिल सफारी का आनंद उठाया। यहां साइकिल बहुत कम दाम पर किराए से मिल जाती हैं जब कि टैक्सीवाले 500 से 1000 रुपये तक ले लेते हैं। पूर्वी मंदिरों में 4 जैन तथा 3 हिन्दू मंदिर हैं। पहला पिरामिड शैली में बना छोटा सा ब्रह्मा मंदिर है। ब्रह्मा की प्रतिमा के साथ यहां भगवान विष्णु और शिव भी उपस्थित हैं। मंदिर में एक शिवलिंग भी है। ब्रह्मा मंदिर से करीब 300 मीटर की दूरी पर वामन मंदिर है। यह मंदिर 11वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बना माना जाता है। इस मंदिर की दीवारों पर प्रेमी युगलों के कुछ आलिंगन दृश्यों को छोड़ ज्यादातर एकल प्रतिमाएं हैं। शिव.विवाह का खूबसूरत उत्कीर्ण भी यहाँ देखने को मिलता है। वामन मंदिर से थोड़ा.सा आगे चलने पर आता है जवारी मंदिर है। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उनके बैकुंठ रूप में दर्शन होते हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों की मूर्तियां में अनेक मैथुन दृश्य भी हैं।

यहीं पर 4 जैन मंदिर स्थित हैं। इनमें से घंटाई मंदिर भग्न स्थिति में है। एक मंडप के रूप में दिखने वाले इस मंदिर के स्तंभों पर घंटियों का सुंदर अलंकरण है। प्रवेश द्वार पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हैं जबकि गर्भगृह के द्वार पर शासन देवी चक्रेश्वरी की गरूड़ पर आरूढ़ प्रतिमा है। शेष तीनों जैन मंदिर कुछ दूर एक परिसर में स्थित हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है पार्श्वनाथ मंदिर है जिसकी बाहरी दीवारों पर तीर्थंकर प्रतिमाएं बनी हैं। इनके साथ कुबेर, द्वारपाल, गजारूढ़ या अखारूढ़ जैन शासन देवताओं का सुंदर अंकन भी है। यहां मूर्तियों की पंक्तियों में गंधर्व,किन्नर, विद्याधर शासन देवी.देवताए यक्ष मिथुन व अप्सराएं शामिल हैं। इनमें काजल लगाती नायिका तथा शिशु पर वात्सल्य छलकाती माता की मूर्तियां मोहक हैं। मंदिर के तोरण में तीर्थंकर माता के 16 स्वप्नों का सुंदर चित्रण है और गर्भगृह में आदिनाथजी की प्रतिमाये हैं। मंदिर का निर्माण राजा घंगदेव के समय एक नगर सेठ ने करवाया था।

पूर्वी मंदिर के बाद दक्षिणी मंदिरों में दूल्हादेव मंदिर शिव को समर्पित है। मंदिर के अंदर एक विशाल शिवलिंग पर शहत्रमुखी छोटे.छोटे शिवलिंग बने हैं। यह 12वीं शताब्दी में निर्मित चंदेल राजाओं की अंतिम धरोहर है। इसके बाद दूल्हादेव मंदिर से कुछ दूर चतुर्भुज मंदिर एक साधारण चबूतरे पर बना है। इस मंदिर की दीवारों पर बनी मूर्तियों में दिग्पाल,अष्टवसु, अप्सराएं और व्याल प्रमुख हैं। मंदिर के गर्भगृह में शिव की सौम्य प्रतिमा है।

लगभग सभी मंदिरों की दीवारों पर कहीं-कहीं एकल तो कहीं.कहीं सामूहिक मैथुनरत मूर्तियां वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित और चित्रित अनेक आसनों का बोध कराती हैं। सामूहिक मैथुन के दृश्य तो दर्शकों के मन में एक अलग तरह का कौतूहल पैदा करते हैं। मूर्ति शिल्प की उत्कृष्टता यह भी दर्शाती है कि ये मैथुन मूर्तियां किसी तरह के पूर्वाग्रह या कुंठा से उपजी हुई नहीं हैंए नहीं अश्लीलता झलकती है वरन सरल सुबोध भाव से जीवन के सच्च की पराकाष्ठा है। भारतीय मंदिर कला के उच्चतम प्रतिमानों के दर्शन कर जब वापस लौट रहे थे तो मन में एक ही भाव था कैसे होंगे वो अनाम शिल्पी जिन्होंने ने इन मूर्तियों और स्थापत्य के इस अकल्पनीय संसार की रचना कीए जिसे देखने के लिए आज पूरे विश्व के सैलानी यहां आना अपना सौभाग्य मानते हैं और कैमरे में संजोकर ले जाते हैं अपनी यात्रा की मधुर यादें।

पश्चिमी मंदिर समूह के विपरीत स्थित भारतीय पुरातत्व विभाग के संग्रहालय को चार विशाल गृहों में विभाजित किया गया है। जिनमें शैवए वैष्णवए जैन और अन्य । प्रतिमाओं का विशाल संग्रह देखा जा सकता है। इसमें विष्णु की प्रतिमा को मुंह पर अंगुली रखे चुप रहने के भाव के साथ दिखाया गया है। संग्रहालय में चार पैरों वाले शिव की भी एक सुन्दर मूर्ति है। जैन संग्रहालय में लगभग 100 जैन मूर्तियां हैं। ट्राईबल और फॉक के राज्य संग्रहालय में जनजाति समूहों द्वारा निर्मित पक्की मिट्टी की कलाकृतियांए धातु शिल्पए लकड़ी शिल्पए पेंटिंगए आभूषणए मुखौटों और टेटुओं को दर्शाया गया है। शाम को पश्चिम मंदिर समूह परिसर में प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम प्रद्रर्शित किया जाता हैै जो यहां के इतिहास को जीवंत कर देता है। खजुराहो के कार्यक्रम में इन्हें भी जरूर देखें। ऊँचे मंदिरों को शिखर तक आनन्द लेने के लिए बाइस्कोप जरूर ले जावें। खजुराहो गावँ के अनेक धरों में मूर्तियां बनाते कारीगर देखे जा सकते हैं। पूरा गावँ ही शिल्प बाजार का दृश्य उपस्थित करता है।

खजुराहो निः सन्देह चन्देल कलाकेन्द्रों में सर्वाधिक महतवपूर्ण केन्द्र था। ये मन्दिर नागर शैली के उत्कृष्टतम उदाहरण हैं। इनकी स्थापत्यगत योजना एवं शिल्प संयोजन तथा वैभव समकालीन स्मारकों में अद्वितीय है। मध्यकालीन अन्य केन्द्रों की ही भाँति खजुराहो में भी मूर्तियाँ मुख्यतः मन्दिरों के विभिन्न भागों पर (बाह्य एवं भीतरी भित्तियों, गर्भगृह, शिखर, जगती, प्रदक्षिणापथ) उत्कीर्ण की गई हैं। कामक्रीड़ा युक्त मूर्तियां यहां का बड़ा आकर्षण हैं। मूर्तियों की ’चित्ताकर्षक भव्यता’ मन्दिरों के सौन्दर्य में वृद्धि करती है। मूर्तियाँ सामान्यतः खड़ी मुद्रा में हैं एवं उनकी मुखाकृतियों और शरीर रचना में वक्रता और एन्द्रिकता दर्शनीय हैं, विशेषकर अप्सराओं एवं कामकला से सम्बन्धित मूर्तियों में।

नृत्य में तल्लीन नर-नारियाँ, मिथुन-युगल, स्त्री-पुरूष दम्पत्ति और मिथुन समूह प्रतिमाओं के माध्यम से खजुराहो के इन मन्दिरों में ’रति-क्रीड़ा’ सम्बन्धी सैकड़ों दृश्य उकेरे गये हैं । जिनमें प्रेमी-युगलों को सामान्य व असामान्य रूप में क्रीड़ारत दर्शाया गया है। स्त्री-पुरूष दम्पति मूर्तियों को एक-दूसरे के समीप और आलिंगन करते हुए दिखाया गया है। इसी प्रकार स्त्री-पुरूष तीव्र चुम्बनों और प्रगाढ़ आलिंगन की मुद्राओं में दिखाये गये हैं। इस वर्ग की मूर्तियाँ सर्वाधिक संख्या में बनी हैं। अलंकरणों के वैविध्य के साथ ही केश-सज्जा और वस्त्र-विन्यास में भी विविधता दिखाई पड़ती है।अप्सराओं, देव-कन्याओं व अलस-कन्याओं व अलस-कल्याओं की ’श्रृंगार-प्रधान’ मूर्तियाँ खजुराहो को विश्व-प्रसिद्धि दिलाती हैं। मन्दिरों के विभिन्न स्थानों पर कोरकर अथवा अंशतः कोरकर बनाई इन मूर्तियों को वस्त्राभूषणों से अलंकृत, अलौकिक मुद्राओं व विभिन्न नृत्य मुद्राओं में दर्शाया गया है। देवताओं की व आराध्य देवों की पूजा-अर्चना हेतु हाथ में दर्पण, घट, वस्त्रालंकार उठाये हुए अथवा अनेक प्रकार के क्रियाकलापों को व्यक्त करती हुई दर्शायी गई हैं। यहां नायिका अपने को विवस्त्र करती, अंगड़ाई लेते हुए, पैर से काँटा निकालती, शिशु को दुलारती, शुक अथवा वानर आदि के साथ क्रीड़ा करती, पत्र लिखती, वीणा अथवा वंशी बजाती, दीवारों पर चित्रांकन करती, बालों से पानी निचोड़ती, महावर रचाती, नेत्रों में सुरमा, दर्पण में मुख देखती, प्रसाधन करती हुई आदि विभिन्न कार्यकलापों और मुद्राओं में दर्शायी गई हैं। इस वर्ग की नायिकाएँ ’ऐन्द्रिकता’ का भाव व्यक्त करती हैं। चिर-परिचित क्रिया-कलापों को अभिव्यक्त करती इन नारी मूर्तियों के माध्यम से ’अलौकिक सौन्दर्य’ की अभिव्यक्ति हुई है। मूर्तियों की कलात्मकता चरमोत्कर्ष को छूती है। इन मन्दिरों का निर्माण लगभग 900 ई. से 1150 ई. के मध्य माना जाता हैं। मंदिर समूह का महत्व का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इन्हें वर्ष में यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है।

वैसे तो वर्षभर कभी भी यहां आया जा सकता है पर अक्टूबर से मार्च का समय अधिक अनुकूल है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले का खजुराहो, दिल्ली,वाराणसी,आगरा एवं काठमांडू से हवाई सेवा से जुड़ा है और खजुराहो रेलवेस्टेशन दिल्ली,आगरा,जयपुर,वारणसी,उदयपुर,भोपाल,इंदौर,उज्जैन के लिये रेल सेवा उपलब्ध है। देश के कई प्रमुख शहरों से बस सेवा उपलब्ध है। ठहरने व भोजन के लिये हर बजट के होटल हैं।

(डॉ. प्रभात कुमार सिंघल वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवँ राजस्थान जनसंपर्क के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं)
संपर्क
9928076040

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