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स्व. जसदेव सिंहः हिंदी नहीं पढ़ी मगर अपनी हिंदी से करोड़ों लोगों के दिलों में राज किया

कई पीढ़ियों को अपनी आवाज और शब्दों से झंकृत करने वाले पद्म भूषण और पद्म श्री अपनी खनकदार आवाज से हिंदी को बुलन्दियों पर पहुंचानेवाले शब्दों के जादूगर जसदेव सिंह का 87 साल की उम्र में निधन हो गया। शब्दों के जादुगर जसदेव सिंह (1933 – 25 सितंबर 2018) भारत के एक खेल-टीकाकार (कमेन्टेटर) थे। उन्हें सन् 2000 में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया था। उन्होंने आकाशवाणी में उर्दू एवं हिंदी समाचार वाचक के रूप में काम शुरू किया। बाद में जयपुर रेडियो स्टेशन में भी उद्घोषक नियुक्त किये गए, लेकिन जसदेव सिंह ने कमेंटेटर के रूप में अपनी पहचान बनाई। वे आकाशवाणी तथा दूरदर्शन पर सन् 1963 से ही स्वतन्त्रता दिवस तथा गणतन्त्र दिवस की परेडों के आधिकारिक टिप्पणीकार भी रहे हैं।

मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूं रेडिओ पर ये आवाज़ सुनते ही रेडिओ सुनने वाले आसपास बैठे लोगों को चुप कर देते थे और फिर जसदेव सिंह की ही आवाज़ गूँजती थी। ऐसे में अगर कोई बीच में बोल देता था तो जसदेव सिंह को सुनने वाले उसे वहाँ से भगा देते थे या इशारों में चुप रहने को कहते थे। जब जसदेव सिंह रेडिओ पर बोलते थे तो चारों तरफ सन्नाटा होता था और फिजाओं में उनकी आवाज़ गूँजती रहती थी, वह क्रिकेट की कमेंट्री हो, गणतंत्र की परेड हो या कोई अन्य सार्वजनिक कार्यक्रम या या किसी विशिष्ट व्यक्ति की अंतिम यात्रा।

कहा जाता है कि 1975 के हॉकी वर्ल्ड कप फाइनल की कमेंट्री सुनने के लिए इंदिरा गांधी ने संसद की कार्यवाही रुकवा दी थी. यकीनन इसमें कोई शक नहीं कि जसदेव सिंह की आवाज गूंजती थी, तो ऐसा लगता था, मानो दुनिया थम जाए. सवाई माधोपुर में जन्मे जसदेव सिंह दिल्ली और जयपुर में रहते थे. जयपुर में अमर जवान ज्योति पर हर शाम उनकी आवाज गूंजा करती है. वो आवाज सिर्फ अमर जवान ज्योति नहीं, हर उस दिल मे हमेशा गूंजती रहेगी, जिसने उनकी कमेंट्री सुनी है. वो आवाज अमर है.

बाद में जयपुर रेडियो स्टेशन में भी उद्घोषक नियुक्त किये गए, लेकिन जसदेव सिंह ने कमेंटेटर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सन् 1960 में जयपुर में फुटबॉल मैच की कमेंट्री की। सन् 1962 में 15 अगस्त के मौके पर उन्होंने शिव सागर मिश्र के साथ कमेंट्री दी। सन् 1964 में आकाशवाणी ने टोकियो ओलम्पिक कवर करने के रूप में जापान गए। जसदेव सिंह विशेषकर हॉकी कमेंट्रेटर के रूप में जाने जाते थे।

जसदेव सिंह को याद करते हुए बीबीसी हिंदी ने उनके एक पुराने साक्षात्कार का उल्लेख करते हुए उन्हें अपनी श्रध्दांजलि देते हुए कहा- जसदेव सिंह और हॉकी कमेंटरी को भारत में एक-दूसरे का पर्याय माना जाता था. वो आवाज़ अब खामोश हो गई है.

1970 और 80 के दशक में दूरदर्शन की स्पोर्ट्स कवरेज बेहतरीन होती थी. रवि चतुर्वेदी और सुशील दोशी के साथ जसदेव सिंह का नाम भी घर-घर में जाना जाता था. उन्होंने अपने करियर में नौ ओलंपिक, आठ हॉकी विश्व कप और छह एशियाई खेल कवर किए हैं. उन्हें ओलंपिक ऑर्डर का भी सम्मान मिला जो ओलंपिक का सबसे बड़ा सम्मान है.

ओलंपिक परिषद के पूर्व प्रमुख जुआन एंटोनियो समारांच ने उन्हें 1988 सियोल ओलंपिक में इन खेलों को बढ़ावा देने के लिए ‘ओलंपिक ऑडर’ से सम्मानित किया था. उन्होंने छह बार एशियाई खेलों और इतनी ही बार हॉकी विश्व कप में कमेंट्री की थी. जसदेव सिंह 1963 से 48 वर्षों तक गणतंत्र दिवस का आंखों देखा हाल सुनाया था.

बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार रेहान फ़ज़ल से 1997 में जसदेव सिंह ने बात की थी. उनसे बातचीत के कुछ अंश उन्हीं की ज़ुबानी –

1948 में जब गांधी जी की हत्या हुई थी तो उनकी अंतिम यात्रा का जो आंखों देखा विवरण था उसे मैंने रेडियो पर अंग्रेज़ी में सुना था. तब मैं दसवीं कक्षा में था.

कमेंटेटर के जो शब्द और भावनाएं थीं, वो ऐसी मेरे दिल में उतर गई कि मैंने मेरी मां से कहा कि मैं तो हिंदी में कमेंटरी करूंगा.

आपको ये भी ताज्जुब होगा कि मैंने कभी हिंदी पढ़ी ही नहीं थी. मैंने उर्दू में पढ़ाई की थी और बाद में अंग्रेज़ी में.

लेकिन कमेंटरी के शौक ने मुझे हिंदी भी सिखला दी.

1975 विश्व कप में भारत और मलेशिया का सेमीफ़ाइनल चल रहा था और मलेशिया 2-1 से आगे था. आखिरी 10 मिनट बचे थे. उस वक्त डिमेलो माइक्रोफोन पर थे.

मैंने देखा कि असलम शेर खां वार्मअप कर रहे थे. असलम को मैंने यूनिवर्सिटी में खेलते देखा था. तेहरान में खेलते देखा था. असलम में एक ललक दिखती थी.

जब मैंने उन्हें वार्मअप करते देखा तो मैंने बोला कि हो सकता है असलम को मैदान में बलबीर सिंह और कप्तान अजीत पाल बुला लें और तभी असलम कुलाचे भरते हुए मैदान में आते दिखे. अपने दाएं हाथ में हॉकी स्टिक लिए उन्होंने ऐसे छलांग लगाई जैसे हिरण लगाता है.

उन्हें देखकर मेरे मुंह से निकला कि असलम मैदान पर भारत का भाग्य बनकर आए हैं. उन्होंने अपना ताबीज़ चूमा और एक मिनट के अंदर ही भारत को पेनल्टी कॉर्नर मिल गया. असलम ने गोल किया और भारत बराबरी पर आ गया.

मुझे इसलिए भी याद रहता है क्योंकि पाकिस्तान के अख़बारों ने लिखा था कि भारतीय कमेंटेटर को ये नज़र आ गया कि असलम ने ताबीज़ को चूमा लेकिन पाकिस्तान के कमेंटेटर को नज़र नहीं आया.

फिर फाइनल में तो हम अच्छा खेले ही. पाकिस्तान ने भी अच्छा खेला लेकिन वो अवसरों को कैश नही कर पाए. हमारे अशोक कुमार ने शानदार गोल किए.

ड्रिबलिंग की बात करें तो कमेंटेटर को तारीफ़ करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. क्योंकि कमेंटेटर अगर गेंद के साथ रहेगा तो श्रोताओं को खुद ही पता चल जाएगा कि ड्रिबलिंग कौन ज़्यादा कर रहा है.

कई लोग आलोचना भी करते कि इस खिलाड़ी ने बहुत देर गेंद रख ली. मेरे हिसाब से वैसा नहीं है. मैंने जो कमेंटरी को लेकर सीखा है वो ये कि जो हो रहा है बस लोगों को वो बता दो. जो होना चाहिए था, वो बताने का हमको कोई अधिकार नहीं. जो हुआ ही नहीं, उसको कैसे बताएं. या तो मैं बहुत बड़ा खिलाड़ी रहा हूं कि उनके खेल पर बोल सकूं.

मुझे कई खिलाड़ियों ने कहा कि आप बल्ला या स्टिक लेकर आइए तब पता चलेगा. मुझे लगता है कि वो ठीक कहते हैं. मैंने भी उनसे कहा कि आप भी माइक्रोफोन पर आकर बैठो. भारत में एक ये आम शिकायत रही है कि ड्रिबलिंग ज़्यादा करते हैं क्योंकि गोल करने वाले को ज़्यादा प्रचार मिलता है. उसकी ज़्यादा तारीफ़ होती है.

आजकल के कमेंटेटर में वो बात कहां?

जो मैंने सीखा है पिछले 30-35 साल में और डिमेलो जैसे कमेंटेटर से, वो ये कि दो चीज़ें बराबर होनी चाहिए – खेल का ज्ञान और भाषा. भाषा का व्याकरण, शब्दों का चुनाव, रफ्तार और फिर जैसे आप सब्ज़ी में नमक-मिर्च डालते हैं, वैसे ही किसी मौके पर श्रोताओं को ऐसी बात बताई जाए जिससे उन्हें लगे कि हां कमेंटेटर वहां पर है.

जैसे आप लंदन से कमेंटरी कर रहे हैं तो लंदन के बारे में बताएं, यहां के लोगों के बारे में बताइए. यहां की परंपराओं के बारे में बताइए. लेकिन खेल की कीमत पर नहीं. हां, अगर खेल को दिलचस्प बनाना है तो जैसे किसी तस्वीर को आप फ्रेम कर देते हैं तो और सुंदर लगती है तस्वीर. वैसे ही इन चीज़ों को शामिल कीजिए.

वो आजकल के नौजवान कमेंटेटर नहीं कर पाते. भले ही वे ये कह लें कि गेंद फलाने ने फलां को दी. यहां पास कर दी, वहां पास कर दी.



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