ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

स्व. शरद जोशी की इन पाँच लघु कथाओँ से समझिये आपातकाल क्या था !

हिंदी के जाने माने व्यंग्यकार स्व. शरद जोशी ने अपनी व्यंग्य रचनाओं से देश को झकझोर दिया था। आपतकाल में जब अखबार से लेकर फिल्मी गानों तक पर सरकारी शिंकजा कसा हुआ था, ऐसे में शरद जोशी ने अपनी धारदार कलम से आपातकाल के फरेब को जिस साहस के साथ उजागर किया, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। प्रस्तुत है उनकी ये पाँच लघु कथाएँ या व्यंग्य जो आपातकाल की काली तस्वीर पेश करती है।

लक्ष्य की रक्षा

एक था कछुआ, एक था खरगोश जैसा कि सब जानते हैं. खरगोश ने कछुए को संसद, राजनीतिक मंच और प्रेस के बयानों में चुनौती दी- अगर आगे बढ़ने का इतना ही दम है, तो हमसे पहले मंजिल पर पहुंचकर दिखाओ. रेस आरंभ हुई. खरगोश दौड़ा, कछुआ चला धीरे-धीरे अपनी चाल.

जैसा कि सब जानते हैं आगे जाकर खरगोश एक वृक्ष के नीचे आराम करने लगा. उसने संवाददाताओं को बताया कि वह राष्ट्र की समस्याओं पर गम्भीर चिंतन कर रहा है, क्योंकि उसे जल्दी ही लक्ष्य तक पहुंचना है. यह कहकर वह सो गया. कछुआ लक्ष्य तक धीरे-धीरे पहुंचने लगा.

जब खरगोश सो कर उठा, उसने देखा कि कछुआ आगे बढ़ गया है, उसके हारने और बदनामी के स्पष्ट आसार हैं. खरगोश ने तुरंत आपातकाल घोषित कर दिया

जब खरगोश सो कर उठा, उसने देखा कि कछुआ आगे बढ़ गया है, मेरे हारने और बदनामी के स्पष्ट आसार हैं. खरगोश ने तुरंत आपातकाल घोषित कर दिया. उसने अपने बयान में कहा कि प्रतिगामी पिछड़ी और कंजरवेटिव (रूढ़िवादी) ताकतें आगे बढ़ रही हैं, जिनसे देश को बचाना बहुत ज़रूरी है. और लक्ष्य छूने के पूर्व कछुआ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया.

शेर की गुफा में न्याय

जंगल में शेर के उत्पात बहुत बढ़ गए थे. जीवन असुरक्षित था और बेहिसाब मौतें हो रही थीं. शेर कहीं भी, किसी पर हमला कर देता था. इससे परेशान हो जंगल के सारे पशु इकट्ठा हो वनराज शेर से मिलने गए. शेर अपनी गुफा से बाहर निकला – कहिए क्या बात है?

उन सबने अपनी परेशानी बताई और शेर के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई. शेर ने अपने भाषण में कहा –

‘प्रशासन की नजर में जो कदम उठाने हमें जरूरी हैं, वे हम उठाएंगे. आप इन लोगों के बहकावे में न आवें जो हमारे खिलाफ हैं. अफवाहों से सावधान रहें, क्योंकि जानवरों की मौत के सही आंकड़े हमारी गुफा में हैं जिन्हें कोई भी जानवर अंदर आकर देख सकता है. फिर भी अगर कोई ऐसा मामला हो तो आप मुझे बता सकते हैं या अदालत में जा सकते हैं.’

चूंकि सारे मामले शेर के खिलाफ थे और शेर से ही उसकी शिकायत करना बेमानी था इसलिए पशुओं ने निश्चय किया कि वे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे.

जानवरों के इस निर्णय की खबर गीदड़ों द्वारा शेर तक पहुंच गई थी. उस रात शेर ने अदालत का शिकार किया. न्याय के आसन को पंजों से घसीट अपनी गुफा में ले आया.

शेर ने अपनी नई घोषणाओं में बताया – जंगल के पशुओं की सुविधा के लिए, गीदड़ मंडली के सुझावों को ध्यान में रखकर हमने अदालत को सचिवालय से जोड़ दिया है

जंगल में इमर्जेंसी घोषित कर दी गई. शेर ने अपनी नई घोषणाओं में बताया – जंगल के पशुओं की सुविधा के लिए, गीदड़ मंडली के सुझावों को ध्यान में रखकर हमने अदालत को सचिवालय से जोड़ दिया है, ताकि न्याय की गति बढ़े और व्यर्थ की ढिलाई समाप्त हो. आज से सारे मुकदमों की सुनवाई और फैसले हमारे गुफा में होंगे.

इमर्जेंसी के दौर में जो पशु न्याय की तलाश में शेर की गुफा में घुसा उसका अंतिम फैसला कितनी शीघ्रता से हुआ इसे सब जानते हैं.

क्रमश: प्रगति

खरगोश का एक जोड़ा था, जिनके पांच बच्चे थे.

एक दिन भेड़िया जीप में बैठकर आया और बोला – असामाजिक तत्वों तुम्हें पता नहीं सरकार ने तीन बच्चों का लक्ष्य रखा है. और दो बच्चे कम करके चला गया.

कुछ दिनों बाद भेड़िया फिर आया और बोला कि सरकार ने लक्ष्य बदल दिया और एक बच्चे को और कम कर चला गया. खरगोश के जोड़े ने सोचा, जो हुआ सो हुआ, अब हम शांति से रहेंगे. मगर तभी जंगल में इमर्जेंसी लग गई.

कुछ दिन बाद भेड़िये ने खरगोश के जोड़े को थाने पर बुलाया और कहा कि सुना है, तुम लोग असंतुष्ट हो सरकारी निर्णयों से और गुप्त रूप से कोई षड्यंत्र कर रहे हो? खरगोश से साफ इनकार करते हुए सफाई देनी चाही, पर तभी भेड़िये ने बताया कि इमर्जेंसी के नियमों के तहत सफाई सुनी नहीं जाएगी.

उस रोज थाने में जोड़ा कम हो गया.

दो बच्चे बचे. मूर्ख थे. मां-बाप को तलाशने खुद थाने पहुंच गए. भेड़िया उनका इंतजार कर रहा था. यदि थाने नहीं जाते तो वे इमर्जेंसी के बावजूद कुछ दिन और जीवित रह सकते थे.

कला और प्रतिबद्धता

कोयल का कंठ अच्छा था, स्वरों का ज्ञान था और राग-रागनियों की थोड़ी बहुत समझ थी. उसने निश्चय किया कि वह संगीत में अपना कैरियर बनाएगी. जाहिर है उसने शुरुआत आकाशवाणी से करनी चाही.

कोयल ने एप्लाय (आवेदन) किया. दूसरे ही दिन उसे ऑडीशन के लिए बुलावा आ गया. वे इमर्जेंसी के दिन थे और सरकारी कामकाज की गति तेज हो गई थी.

कोयल आकाशवाणी पहुंची. स्वर परीक्षा के लिए वहां तीन गिद्ध बैठे हुए थे. ‘क्या गाऊं?’ कोयल ने पूछा.

गिद्ध हंसे और बोले, ‘यह भी कोई पूछने की बात है. बीस सूत्री कार्यक्रम पर लोकगीत सुनाओ. हमें सिर्फ यही सुनने-सुनाने का आदेश है.’

गिद्ध हंसे और बोले, ‘यह भी कोई पूछने की बात है. बीस सूत्री कार्यक्रम पर लोकगीत सुनाओ. हमें सिर्फ यही सुनने-सुनाने का आदेश है.’

‘बीस सूत्री कार्यक्रम पर लोकगीत? वह तो मुझे नहीं आता. आप कोई भजन या गजल सुन सकते हैं.’ कोयल ने कहा.

गिद्ध फिर हंसे. ‘गजल या भजन? बीस सूत्री कार्यक्रम पर हो तो अवश्य सुनाइए?’

‘बीस सूत्री कार्यक्रम पर तो नहीं है.’ कोयल ने कहा. ‘तब क्षमा कीजिए, कोकिला जी. हमारे पास आपके लिए कोई स्थान नहीं है.’ गिद्धों ने कहा.

कोयल चली आई. आते हुए उसने देखा कि म्यूजिक रूम (संगीत कक्ष) में कौओं का दल बीस सूत्री कार्यक्रम पर कोरस रिकॉर्ड करवा रहा है.

कोयल ने उसके बाद संगीत में अपनी करियर बनाने का आइडिया त्याग दिया और शादी करके ससुराल चली गई.

बुद्धिजीवियों का दायित्व

लोमड़ी पेड़ के नीचे पहुंची. उसने देखा ऊपर की डाल पर एक कौवा बैठा है, जिसने मुंह में रोटी दाब रखी है. लोमड़ी ने सोचा कि अगर कौवा गलती से मुंह खोल दे तो रोटी नीचे गिर जाएगी. नीचे गिर जाए तो मैं खा लूं.

‘लोमड़ी बाई, शासन ने हम बुद्धिजीवियों को यह रोटी इसी शर्त पर दी है कि इसे मुंह में ले हम अपनी चोंच को बंद रखें. मैं जरा प्रतिबद्ध हो गया हूं आजकल’

लोमड़ी ने कौवे से कहा, ‘ भैया कौवे! तुम तो मुक्त प्राणी हो, तुम्हारी बुद्धि, वाणी और तर्क का लोहा सभी मानते हैं. मार्क्सवाद पर तुम्हारी पकड़ भी गहरी है. वर्तमान परिस्थितियों में एक बुद्धिजीवी के दायित्व पर तुम्हारे विचार जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी. यों भी तुम ऊंचाई पर बैठे हो, भाषण देकर हमें मार्गदर्शन देना तुम्हें शोभा देगा. बोलो मुंह खोले कौवे!’

इमर्जेंसी का काल था. कौवे बहुत होशियार हो गए थे. चोंच से रोटी निकाल अपने हाथ में ले धीरे से कौवे ने कहा – ‘लोमड़ी बाई, शासन ने हम बुद्धिजीवियों को यह रोटी इसी शर्त पर दी है कि इसे मुंह में ले हम अपनी चोंच को बंद रखें. मैं जरा प्रतिबद्ध हो गया हूं आजकल, क्षमा करें. यों मैं स्वतंत्र हूं, यह सही है और आश्चर्य नहीं समय आने पर मैं बोलूं भी.’

इतना कहकर कौवे ने फिर रोटी चोंच में दबा ली.



Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

Back to Top