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अग्निहोत्र की सप्तम क्रिया

जब कभी भी और कोई भी कार्य आरम्भ किया जाता है तो सर्वप्रथम उसकी भूमिका अथवा कार्य की रूपरेखा तथा योजना तैयार की जाती है| कुछ योजनाएं बनाई जाती हैं| इस कार्य को कितना करना है और कहाँ तक, किस सीमा तक करना है, इसे करने के लिए आरम्भ में किस वस्तु की आवश्यकता है और फिर क्या क्या चाहिए होगा|| जहाँ तक अग्निहोत्र का सम्बन्ध है| हम अग्निहोत्र के माध्यम से प्रभु को कुछ भेंट देने जा रहे हैं| प्रभु हमारी भेंट स्वीकार करें, इस निमित्त जो तैयारी की जाती है, अग्निहोत्र में उस क्रिया को सप्तम क्रिया के नाम से जाना जाता है, इस सप्तम क्रिया को समिधाचयनम् कहते हैं|

इस सप्तम क्रिया में किसी भी प्रकार का कोई भी मन्त्र नहीं आता है बस जो कुछ हमने प्रभु की भेंट चढ़ाना होता है, यह क्रिया उस सब को व्यवस्थित करने के लिए ही होती है, यह भेंट की तैयारी के रूप में स्वीकार कर सकते हैं| हम जो कुछ भी प्रभु को भेंट करते हैं, उसमें से किसी भी वस्तु की प्रभु को अपनी किसी भी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए नहीं होती क्योंकि निराकार, सर्वव्यापी, सर्वोपरि होने के कारण वह कुछ आवशयकतायें रखता ही नहीं|
प्रभु अपने पास कुछ भी नहीं रखते

परमपिता परमात्मा निराकार है, वह ईश्वर दयालु भी है और सर्व व्यापक भी है| इस प्रकार के और भी बहुत से गुण परम पिता परमात्मा के होते हैं| मैं तो यहाँ तक कहा करता हूँ कि इस विश्व में जितने प्रकार के भी गुण हैं, वह सब प्रभु के ही गुण हैं| उस प्रभु ने ही वह सब गुण इस जगत् के प्राणियों को प्रदान भी किये हैं| निराकार प्रभु शरीर रहित होने से न तो कभी जन्म लेता है और न ही कभी मरता है तथा निराकार होने से उस का कोई शरीर ही नहीं है, इस कारण उसे कुछ भी खाने की अथवा पाने की आवश्यकता नहीं| सर्व व्यापक होने से संसार की कोई भी गतिविधि, चाहे वह बंद कमरे में ही क्यों न की जा रही हो, उसे उस की दृष्टि से बचाया नहीं जा सकता| यहां दृष्टि से भाव उसके अभिज्ञान से है क्योंकि निराकार प्रभु की तो आँख भी नहीं होती| कहा भी है“बिन पग चले सुने बिन काना” अर्थात् परमपिता परमात्मा को जिस प्रकार सुनने के लिए कान की आवश्यकाता नहीं होती, चलने के लिए पाँव की आवश्यकता नहीं होती, इस प्रकार ही उसे खाने के लिए मुंह की, देखने के लिए आँख की तथा सुनने के लिए कान की भी आवश्यकता नहीं होती| इस कारण हम जो कुछ भी परमपिता परमात्मा की भेंट करते हैं, वह सब तो क्या, इस सब में से कुछ भी वह पिता अपने पास नहीं रखता अपितु जो कुछ हम भेंट करते हैं तो वह पिता इसमें कुछ और मिला कर हमें लौटा देते हैं|
यह परम्परा सांसारिक मनुष्य में भी है

अपने पास कुछ न रखने की परम्परा इस सांसारिक मनुष्य में भी देखने को मिलती है| जब कोई परिजन अथवा मित्र अपने किसी बड़े संबंधी अथवा मित्र के पास किसी आयोजन यथा विवाह आदि के अवसर पर जाता है तो वह कुछ न कुछ भेंट के लिए अवश्य लेकर जाता है| इस भेंट को शगुन बोलते हैं| कार्याविधि सम्पन्न होने पर जब वह लौटने लगते हैं तो जो भेंट वह लेकर आये थे उसमें कुछ और मिला कर उन्हें लौटा दी जाती है| आजकल तो बालक के जन्म दिन पर भी उपहार लौटाने की परम्परा आरम्भ हो गई है| सांसारिक व्यवस्था में यह गुण परमपिता परमात्मा से मिलता हुआ गुण है, जिसे परमपिता परमात्मा से ही हम ने लिया है| कितनी उत्तम व्यवस्था का स्वरूप प्रदान किया गया है परमपिता परमात्मा ने!
परमपिता सर्वोपरी

परमपिता परमात्मा न केवल सर्वोपरी ही है अपितु सबसे बड़ा भी है| इस कारण उसे स्मरण करते हुए हम अग्निहोत्र के माध्यम से जो कुछ भी उसके नाम से, उसे भेंट करते हुए जो दो दो ग्राम की आहूतियां, स्वाहा कहते हुए डालते हैं और साथ में यह भी बोलते जाते हैं इदमनमम, जिसका भाव यह है कि यह जो कुछ आहुति रुप में हमने आपको भेंट किया है, उसमें से कुछ भी हमारा नहीं था, आप ही का दिया हुआ था, इस कारण आपका दिया आप ही को लौटा रहे हैं| इस के प्रत्युत्तर में प्रभु को जो कुछ हमने भेंट किया है, उसे हजारों गुणा करके हमें परयावरण के माध्यम से भेज देता है|

अब हम मूल बात पर आते हैं, वह है अग्निहोत्र की सप्तम क्रिया, जिसे समिधाचयनम् कहा गया है| इस क्रिया को आरम्भ करने से पूर्व अग्निहोत्र की सब तैयारियां पूर्ण कर ली जाती हैं| यज्ञकुंड स्थापित हो चुका होता है| आसन सज चुके होते हैं| चारों आसनों के सामने यथा आवश्यकता घी तथा सामग्री आदि जुटाई जा चुकी होती है| यज्ञ के लिए समिधाएँ भी एक स्थान पर लगा दी गई होती हैं| चारों आसनों पर यज्ञामान सहित निर्धारित लोग स्वयं को स्थापित कर चुके होते हैं| अब अग्नयाधान की तैयारी हो चुकी होती है और इस का प्रथम क्रम जिसे हमने अग्निहोत्र की क्रियाओं के अंतर्गत सप्तम स्थान पर रखा है, को आरम्भ करते हैं|

समिधाओं के लिए यह बताना आवश्यक है कि समिधाओं का आकार अर्थात् इनकी लम्बाई और मोटाई हवन कुंड के आकार के समान ही होती है| मुख्य रूप से हम इस सम्बन्ध में कह सकते हैं कि हवन कुंड की लम्बाई और चौड़ाई एक समान होनी चाहिए और इसकी गहराई भी इसकी एक भुजा के समान हो किन्तु नीचे से इसका आकार भुजा से एक चौथाई हो| स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में यही व्यवस्था दी है| अत: यदि हवन कुंड आठ इंच का है तो और यदि एक फुट का है तो भी और यदि इससे भी बड़ा है तो भी इसमें डाली जाने वाली प्रथम कुछ समिधा का आकार एसा हो कि इसके सब से नीचे आने वाली समिधा का आकार नीचे के तल से एक इंच के लगभग बड़ा हो और सबसे ऊपर आने वाली समिधाएँ हवन कुंड के मध्यम क्षेत्र के लगभग के आकार की हों तथा इनकी मोटाई भी इनके आकार के अनुसार बदलती रहनी चाहिए| छोटे हवन कुंड के लिए पतली और बड़े के लिए कुछ मोटी तथा मध्यम आकार के हवं कुण्ड के लिए मध्यम ताकि प्रज्वलित अग्नि बड़ी सरलता से समिधा को पकड़ सके प्रज्वलित रह सके| यह समिधाएँ भी आम, बेरी, जंड आदि इस प्रकार के वृक्षों की हों, जिन की अग्नि और धुनां रोग नाशक हो, धुनां कम हो और जलने पर कोयला न छोड़े शीघ्र रख बन जावे|

यह तो हुआ आकार के क्रम से समिधा चयन| अब हम आते हैं अग्निहोत्र के लिए जिस हवन कुंड में हमें यज्ञ की सब क्रियायें संपन्न करनी हैं, उनको सफलता पूर्वक सम्पन्न करने के लिए समिधाएँ इसके अन्दर किस प्रकार से व्यवस्थित की जावें| यह समिधायें इस प्रकार से व्यवस्थित की जावें कि अगन्याधान से लेकर सर्वं वै पूर्णं तक अग्नि निरंतर ज्वालायें देती रहे, बीच में कहीं बुझे नहीं, धुआँ नहीं करे| इसके लिए जैसे ऊपर बताया गया है, हवन कुंड के तल से एक दो इंच अधिक लम्बी दो समिधाएँ सब से नीचे दायें बायें कर लगाईं जावें| फिर दो समिधाएँ इस के उलट दिशा में दोनों ऑर रखी जावे और फिर उनके ऊपर| इस प्रकार चोकड सा बनाते हुए चार या आठ समिधायें जोड़ी जावें| इन समिधाओं के मध्य एक प्रकार से चोकोर छेद सा बन जावे और चारों और भी खाली स्थान बच जावे| बस हवन की इस क्रिया को ही हम अग्निहोत्र की सप्तम क्रिया कहते हैं| इसे समिधाचयणम् भी कहते हैं| यह ही अग्निहोत्र आरम्भ करने से पूर्व की अंतिम तैयारी होती है| इसके संपन्न होने के पश्चात् ही अग्नि प्रजव्लित की जाती है|

डॉ. अशोक आर्य
पाकेट१/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से ७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उपर,भारत
चलभाष ९७१८५२८०६८
E Mail. [email protected]

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