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निजाम को नाकों चने चबवाने वाले शहीद अर्जुन सिंह जी

आर्य समाज के योध्दाओँ ने अपने विगत सवा सौ वर्ष से थोड़ा सा अधिक काल के इतिहास में ही अपने शहीदों का एक तांता सा लगा दिया| विश्व इतिहास साक्षी है कि जिस प्रकार अत्यधिक संख्या में मानो पंक्ति बद्ध हो आर्यों ने बलिदान दिए, विश्व की अन्य किसी संस्था ने इतने अल्प समय में इतने बलिदान नहीं दिए| आर्य समाज के शहीदों की कभी न समाप्त होने वाली पंक्ति इतनी लम्बी हो गई कि आज इन सब शहीदों की गिनती कर पाना भी असंभव हो गया है| इस बलिदानी परम्परा का आरम्भ इस संस्था के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने स्वयं अपना बलिदान देकर किया| आगे चलकर उनके शिष्यों ने इस बलिदानी परम्परा को निरंतर बनाए रखा| इस बलिदानी धारा के बहाव में कहीं भी अवरोध नहीं आने दिया|यह ही वह कारण था कि आर्य समाज का विस्तार न केवल भारत में ही अपितु विश्व के अन्य देशों में भी बड़ी तीव्र गति से हुआ| एक एक बलिदान अनेक वीरों को उत्साहित करते हुए उन्हें बलि के इस मारग के लिए तैयार करता है| इस सब का यह परिणाम हुआ कि आर्य समाज का विस्तार थोड़े समय में ही विश्व के अनेक देशों में हो गया|

आर्य समाज के इस प्रकार के त्यागी, तपस्वी और बलिदानी रत्नों में शूरता की शान वीरवर अर्जुन सिंह जी भी एक थे| अर्जुनसिंह जी का जन्म जिला ओरंगाबाद (वर्त्तमान महाराष्ट्र) के कन्नड़ तालुके में हुआ था| बालक का भविष्य तो उसके बचपन में ही दिखाई देने लगता है| इस का साक्षात् आपके बचपन में ही मिलने लगा था| अर्जुनसिंह जी बचपन से ही निर्भीक,साहसी तथा बेजोड़ जुझारू और सेवाभाव रख्नने वाले आर्य नररत्न थे, जो प्रतिक्षण आर्य समाज की सेवा के कार्यों को करना अपने लिए सौभाग्य समझते थे| जहां कहीं भी संकट दिखाई देता, आर्यों की रक्षा के लिए सबसे आगे दिखाई देते थे| आर्य समाज की आपने अभूतपूर्व सेवा की| इस प्रकार आपने स्वयं को स्वामी दयानंद सरसवती का सच्चा अनुवर्ती तथा आर्य समाज का सच्चा सेवक सिद्ध कर दिया| आपकी इन सेवाओं के कारण आपको हैदराबाद के “महर्षि मुक्ति दल” का दलपति नियुक्त किया गया|

हम सब जानते हैं कि हैदराबाद अपने निजाम राज्य का उस समय केंद्र था| यहाँ आर्यों तथा हिन्दुओं के साथ प्रतिदिन किसी न किसी रूप में छेड़छाड़ तथा अत्याचार होते ही रहते थे| यहाँ के मुसलमान स्वयं को सत्ताधारी मानते थे| इस अवस्था में वह अन्य धर्मावलम्बियों विशेष रूप से आर्यों और हिन्दुओं को परेशान करना, उनका अपमान करना, उनके धर्म को प्रताड़ित करना तथा उनके साथ सब प्रकार के अन्याय करना अपना अधिकार समझते थे| इस अवस्था के कारण हैदराबाद की निजामी रियासत के आर्यों को प्रतिदिन अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता था| दोष चाहे किसी का भी होता, यहाँ संघर्ष करने वाले आर्यों को अकारण ही दण्डित किया जाता था| आर्यों को जहां अनेक बार अकारण ही जेल जाना पड़ता था तो अनेक बार वहां के मुसलमानों के कोप का भाजन भी बनना पड़ता था| वहां के आर्यों को प्रातिदिन तथा प्रतिक्षण अपमानित भी होना पडता था| उन्हें मुसलमानों के अकारण आक्रमणों का भी शिकार होना पड़ता था, यहाँ तक कि अनेक बार तो मुसलमानों के इन आक्रमणों के कारण शहीद भी होना पड़ता था|

इस प्रकार की घोर विपत्तिपूर्ण अवस्था में एक बार हमारे कथानायक अर्जुन सिंह जी जंगली विठोवा जी की यात्रा की व्यवस्था करके वापिस लौट रहे थे कि मार्ग में घात लगाकर बैठे सशस्र मुसलमानों ने अवसर पाकर उन पर आक्रमण कर दिया| एक तरफ अनेक सशस्त्र मुसलमान तथा दूसरी ओर अकेले निहत्थे आर्य वीर अर्जुनसिंह जी किन्तु हिम्मत न हारी, जमकर मुसलमानों का मुकाबला किया| अकेला वीर कहाँ तक लड़ता| अत: मुसलमान उन्हें क्षतांग करके वहां से भाग गए| घटना का पता चलते ही आर्यों द्वारा उन्हें तत्काल सहायता देते हुए अस्पताल पहुंचाया गया, किन्तु आर्यों का दुर्भाग्य ही कहें कि उन्हें बचाया नहीं जा सका| इतने गहरे घावों के कारण वह वीरगति को प्राप्त हो गए|

इस प्रकार हैदराबाद के निजाम की रियासत में आर्यों ने बलि के पथ को अपनाया, उसके कारण आर्य समाज की ख्याति अल्पकाल में ही दूर दूर तक चली गई| परिणाम स्वरूप विश्व भर में इन बलिदानी वीरों की गौरव से भरपुर गाथाओं को सुन सुनकर अनेक बलिदानी वीर आर्य समाज को मिले, जिन्होंने देश, धर्म तथा जाति की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कार दिया| आज आवश्यकता है इन बलिदानियों की याद को ताजा रखते हुए नया उत्साह नया जोश तथा नई उमंगों के साथ इन शहीदों का अनुसरण करते हुए बलिदानी पंडित लेख राम के आदेश को स्वीकार करते हुए नित्य स्वाध्याय करने की| स्वाध्याय के मार्ग को कभी अवरुद्ध न होने दें| अपने बलिदानी परम्परा को भुला कर तथा स्वाध्याय से विरत होकर अधोगति का मार्ग सामने आ जाया करता है| इस आधोगति से बचने के लिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम अपनी संस्था की बलिदानी परम्परा को सदा स्मरण रखें, इसे अनवरत बनाए रखें और अपने पूर्वजों की विरासत को जीवित रखने के लिए स्वयं जागृत होंते हुए हमारी बलिदानी परम्परा और नित्य स्वाध्याय की आदत को अक्षुण बनाए रखें| इस सब को निरंतर आगे बढाने के लिए पुरुषार्थ करें| इस में ही हम सबकी भालाई है तथा यह ही सफलता का मार्ग है| यह ही सुख का मार्ग है और यह ही कल्याण का मार्ग है|

डॉ.. अशोक आर्य
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