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उन शिक्षकों को धिक्कार है जो शिक्षा के नाम पर राजनीति करते हैं – डॉ. प्रेमपाल शर्मा

नई दिल्ली। शिक्षक दिवस के पावन पर्व पर “नई पीढ़ी के नव निर्माण में शिक्षकों की भूमिका” विषयक आनलाइन परिचर्चा “नई पीढ़ी” समाचार पत्र/पत्रिका तथा राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन (वाजा इंडिया) दिल्ली प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में गत दिनों कुशलता पूर्वक संपन्न हुई । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शिक्षा मामलों के विशेषज्ञ तथा प्रख्यात रचनाकार डॉ प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि शिक्षकों को राजनीति से दूर रहना चाहिए!उन सभी शिक्षकों को धिक्कार है जो शिक्षा के नाम पर राजनीति करते हैं! शिक्षा पूरे देश को बदल सकती है और इस बदलाव में शिक्षकों की बड़ी भूमिका है!

कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के रिसर्च एंड डेवलपमेंट विभाग के डायरेक्टर प्रवीण कुमार वर्मा ने कहा कि पहली बात कि पुराने समय में ऋषि परंपरा में जिस तरह से तक्षशिला और नालंदा जैसे भूभाग में शिक्षा का विस्तार किया गया उससे हम सभी आज भी गौरवान्वित महसूस करते हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में हम उससे सीख सकते हैं, दूसरा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का समय है जिसमें शिक्षा में बहुत उतार-चढ़ाव हुए हैं, कुल मिलाकर ऐसे समय में हमारी शिक्षा व्यवस्था एक खिचड़ी बन गई। शिक्षा का व्यवसायीकरण हुआ है और नई पीढ़ी को जो संस्कार दिए जाने चाहिए वह चीज नहीं हो पाई है, इस बारे में गहन विचार-विमर्श होना चाहिए। तीसरी जो महत्वपूर्ण बात है वह करो ना काल के दौरान की शिक्षा जो डिजिटलीकरण के दौर में प्रवेश कर गई ।

विषय प्रवेश के दौरान अपना संबोधन व्यक्त करते हुए राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन वाजा इंडिया दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष तथा राज्यसभा टीवी के पूर्व संपादक अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि ठीक है नई पीढ़ी के बहुत सारे ऐसे सवाल हैं जो आज हमारे पास नहीं हैं, इसलिए जरूरत है कि नई पीढ़ी के बीच में काम कर उनके सवालों को लेकर उनका निराकरण किया जाए ।
परिचर्चा में बतौर वक्ता अपनी बात रखते हुए इंडिया टुडे के पूर्व संपादक तथा आउटलुक के संपादक अजीत कुमार झा ने कहा कि वर्ष 1950 में हमारे देश के अंदर 28 विश्वविद्यालय थे, आज विश्वविद्यालयों की संख्या 1000 के ऊपर पहुंच चुकी है! उस समय जहां 578 कॉलेज थे आज 52627 कॉलेज हो चुके हैं ऐसे में यह एक अच्छा समय है,कोरोना काल के दौरान डिजिटल एजुकेशन में काफी प्रगति हुई है! इन सब के बावजूद जो चिंता का विषय है वह यह है कि विश्व के 100 बड़े विश्वविद्यालयों में चाइना के 20 विश्व विश्वविद्यालय हैं जबकि उनमें भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है।

अगले क्रम में अपने वक्तव्य के दौरान केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो की वरिष्ठ अनुवाद अधिकारी भावना सक्सेना ने कहा कि ज्यादातर स्कूलों में आज नैतिक शिक्षा नहीं दी जा रही है, नैतिकता को दरकिनार किया जा रहा है यह चिंतनीय विषय है उन्होंने आगे कहा कि डिजिटल एजुकेशन कितनी भी अच्छी हो लेकिन प्रत्यक्ष क्लास का स्थान नहीं ले सकती । भावना सक्सेना के अनुसार शिक्षकों को चाहिए कि वह अच्छे परामर्शदाता बनें ।

वक्तव्य के अगले क्रम में बीआईटीएस पिलानी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ मनोज कुमार सोनी ने कहा कि आज की पीढ़ी में धैर्य की कमी है उन्होंने वीडियो के माध्यम से अपनी बात रखी और बताया कि हमें बच्चों को किस तरह से एजुकेशन देनी चाहिए कि उनके अंदर सोशल रिस्पांसिबिलिटी की भावना का उदय हो, उन्होंने आगे कहा कि गुरु सिर्फ गुरु ना बने बच्चों को रचनाशील बनाए ।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए देश के प्रख्यात रचनाकार तथा वेस्टइंडीज विश्वविद्यालय के पूर्व अतिथि प्रोफेसर डॉ प्रेम जनमेजय ने कहा कि शिक्षक के लिए यह जरूरी है कि वह गोताखोर के रूप में नई पीढ़ी का नवनिर्माण करें, हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली एक चूहा दौड़ सदृश्य हो गई है,। आज नई पीढ़ी को यह बताने की जरूरत है कि तुम्हारी प्रतियोगिता खुद तुमसे ही है! उन्होंने आगे कहा कि हमें अपने बच्चों से संगीत की बात करनी चाहिए, खेल की बात करनी चाहिए, अगर हम ऐसा करेंगे नहीं करेंगे तो वह डिप्रेशन में चले जाएंगे । श्री प्रेम जनमेजय के अनुसार शिक्षक जब खुद संस्कारित होंगे तभी नई पीढ़ी को संस्कारित कर पाएंगे।

कार्यक्रम का संचालन नई पीढ़ी फाउंडेशन महिला शाखा की दिल्ली की प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर दर्शनी प्रिय ने बहुत ही खूबसूरत तरीके से किया! तथा कार्यक्रम के अंत में राइटर्स ररही एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन (वाजा) के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अरविंद कुमार सिंह ने अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया! कार्यक्रम का प्रस्तावना वक्तव्य “नई पीढ़ी” के संस्थापक शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी ने द्वारा किया गया ।

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