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‘शिप्रा’ ने की नर्मदा की परिक्रमा

इंदौर। स्लीपिंग बैग में दो जोड़ी कपड़े, कुछ जरूरी गोलियां एक थैली में रखकर मुंबई से शिप्रा ने ओंकारेश्वर की ट्रेन पकड़ी। उन्होंने इंटरनेट पर नर्मदा परिक्रमा के बारे में कभी पढ़ा था। 37 साल की युवती का हठ था कि उसे नर्मदा परिक्रमा पैदल और अकेले ही करना है। पता था कि माता-पिता इसके लिए राजी नहीं होंगे, इसलिए ओंकारेश्वर से परिक्रमा शुरू करने के बाद परिवार वालों को बताया।

80 दिनों में शिप्रा पाठक ने 2800 किलोमीटर की परिक्रमा पूरी कर ली है। सोमवार को उनका पड़ाव जबलपुर था। अगले महीने नर्मदा जयंती तक उनकी परिक्रमा पूरी हो जाएगी। महेश्वर, राजघाट, भरुच (गुजरात), डिंडोरी, अमरकंटक सहित अन्य इलाकों से गुजरने के दौरान शिप्रा को कई अच्छे और बुरे अनुभवों से भी दो-चार होना पड़ा।

शिप्रा बताती हैं कि कुछ आश्रमों में अकेली होने के कारण उन्हें कमरा देने से मना कर दिया। पूछा जाता था कि क्या घर से भागकर आई हो? परिवार अकेली लड़की को परिक्रमा करने के लिए छोड़ता है क्या भला? जहां भी मुझे कमरा देने से मना किया गया, वहां मैंने उनका ‘ब्रेन वॉश” किया जिससे कभी दूसरी युवती परिक्रमा के लिए आए तो उसे इन शंका भरे सवालों से जुझना नहीं पड़े। कई बार तो आश्रम वालों की मम्मी-पापा से फोन पर बात भी कराई।

बकौल शिप्रा इस यात्रा ने सिखाया कि जो लोग आपको जानते नहीं हैं, वे भी आपसे प्रेम करते हैं। हाथों से खाना खिलाते हैं, पैरों को धोने लगते हैं। सुबह जब दंड उठाकर चलती हूं तो यह पता नहीं रहता कि रात का पड़ाव कहां होगा? कब भोजन मिलेगा? लेकिन सारी व्यवस्था हो जाती है। परिक्रमा की शुरुआत में यह सोचती थी कि जल्दी से इसे पूरा करना है। लेकिन अब कई बार तो इसलिए भी कम चलती हूं कि बची परिक्रमा के लिए ज्यादा दिन मिल जाएं और मुझे नर्मदा मैया से दूर नहीं होना पड़े।

शिप्रा ने बताया कि अमरकंटक में उससे मिलने माता-पिता आए थे। मां अपने साथ मेरे लिए कई चीजें लाई थी, लेकिन मैंने सब यह कहकर लौटा दी कि मां यदि तुमने मेरी चिंता की तो फिर नर्मदा मैया मेरी चिंता नहीं करेंगी। मुझे उसके हवाले छोड़ दो।

शिप्रा ने बताया कि परिक्रमा शुरू करने के बाद माता-पिता की नाराजगी दूर करना पड़ी। मैंने उनसे कहा कि इवेंट के सिलसिले में आप मुझे विदेश जाने देते थे, अनजान लोगों के साथ रहना पड़ता था, तब आप चिंता नहीं करते थे तो अब भी न करें। शिप्रा मूलत: उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के दातागंज की निवासी हैं, लेकिन वे बीते कुछ वर्षों से मुबंई में खुद की इवेंट एजेंसी संचालित करती हैं। परिक्रमा शुरू करने से पहले वह अपना काम समेट कर आई थीं।

साभार- https://naidunia.jagran.com/ से



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