आप यहाँ है :

हाड़ोती में शिवपुरा का शिव मंदिर

कोटा जिले के अनेक ऐतिहासिक धार्मिक और पुरातत्व स्थलों में दक्षिण भारतीय मंदिर शैली में निर्मित हांडी पलेश्वर शिव मंदिर भी महत्वपूर्ण स्थल है। प्राचीनता की दृष्टि से यह मंदिर 11वीं – 12वीं सदी का प्रतिनिधित्व करता है। आईए ! जानते है इस मंदिर के बारे में कुछ रोचक तथ्य।

हांडी पालेश्वर शिवालय कोटा जिले की इटावा पंचायत समिति की लक्ष्मीपुरा ग्राम पंचायत के अर्न्तगत हरिपुरा गांव से करीब एक किलोमीटर दूर बाणगंगा नदी के किनारे पर स्थित है। इस मार्ग से हरिपुरा स्थित यह मंदिर करीब 70 किमी दूरी पर आता है। एक दूसरा मार्ग वाया मंगरोल , बमोरी कलां होते हुए लगभग 115 किमी दूरी पर है।

इसे पाण्डवों के समय का बताया जाता है। किवंदती है कि केवल पत्थरों से बने इस मंदिर का निर्माण पाण्डवों ने एक ही रात में करवाया था। पहले यहां हांडी पाली नामक गांव था और उसी के नाम पर इसका नाम हांडी पालेश्वर हो गया। देखने में मंदिर शिखरबंद है, जिसका गगनचुंबी शिखर दूर से ही नजर आता है। मंदिर दक्षिणी भारतीय निर्माण शैली में बना है तथा शिखर पर कई उप श्रृंग भी बनाए गए हैं। मंदिर की दीवारों व ताकों में नक्काशीदार मूर्तियां दिखाई देती हैं। मंदिर का स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प देखते ही बनता है। मंदिर के गर्भगृह, द्वार, सभा मंडप व बाहरी द्वार पर भी सुंदर आकर्षक प्रतिमाएं बनी हैं।

मंदिर के गर्भगृह में दो शिवलिंगों की पूजा की जाती है, जिससे यह मंदिर विलक्षण बन गया है। यहीं पर एक ऊंची जगती पर शिव-पार्वती की युगल प्रतिमा प्रतिष्ठित है, गर्भगृह के कोने में काले रंग की नन्दी की प्राचीन प्रतिमा है। सभा मण्डप के एक कोने में दो शिवलिंग स्थापित हैं। एक शिवलिंग पर छोटी मंदरी बनी है, जबकि दूसरा शिवलिंग इसके बाहर है। सभा मंडप में ही एक पुराना धूणी स्थल बना है। यहां बाणगंगा के जल से अभिषेक किया जाता है।

मंदिर को मूर्तिशिल्प का खजाना कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। मंदिर के पूरे परिक्रमा स्थल में देवी-देवताओं, नर्तकियों, वादकों आदि की मूर्तियां तथा सूक्ष्म कारीगरीयुक्त स्तंभ बने हैं। मंदिर के बाहर भैरव और हनुमान जी की मूर्तियों के साथ-साथ अस्पष्ट लिपि का शिलालेख भी है। मंदिर की छत भी अत्यंत कारीगरीपूर्ण है। मंदिर की छत पर यक्ष,किन्नर,किचक, विद्याधर, देवी, देवता, अप्सरा, गायन, वादन की अनेक कलात्मक मूर्तियां उंकेरी गई हैं।आसपास के समूचे क्षेत्र में प्राचीन मूर्तियों बिखरी पड़ी हैं, जिनमें अनेक भग्नप्रायः हैं। मंदिर के निकट एक संत की समाधि है। यह मंदिर पुरातत्व विभाग के संरक्षित स्मारकों में शामिल है मंदिर के समीप बाणगंगा नदी के तट पर एक पवित्र जलकुण्ड बना है। कहा जाता है कि इसमें पूरे वर्ष पानी भरा रहता है और यह कुण्ड कभी सूखता नहीं है। मान्यता है कि इस कुण्ड में स्नान करने से चर्म रोग से मुक्ति मिलती है। शिव भक्तों की इस मंदिर के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा है।

इसी जगह के निवासी विजय महेश्वरी बताते हैं असल में वहाँ एक पाली गाँव था जिसकी हांडियाँ प्रसिद्ध रही होंगी। इस लिए गाँव का नाम हाँडी पाली हो गया। हांडी पाली गाँव कालान्तर में उजङ गया (कारण मालूम नहीं) पाली गाँव के समीप होने से महादेव जी का पालेश्वर नाम ही उस इलाके में प्रचलित है। मेरे पैतृक गाँव बमोरी कलाँ (जिला बाराँ) से यह स्थान दो किलोमीटर की दूरी पर ही। बचपन से वहाँ अनेकों बार गया हूं। आजकल जाना नहीं हो रहा। माता पिता भी नहीं रहे इसलिए गाँव भी यदाकदा ही जाता हूं। इस मन्दिर के पास ही शिवरात्रि पर तीन दिवसीय मेला लगता है जिसमें बाराँ और कोटा जिले के निकटवर्ती स्थानो के साथ साथ श्योपुर जिले के श्रद्धालु भी यहाँ आते हैं।

उन्होंने लगभग 35 वर्ष पूर्व पुरातत्व विभाग के अधिकारियों के पास वहाँ के पते के साथ फोटो भिजवाये थे। उसके बाद पुरातत्व विभाग ने वहाँ संरक्षित स्मारक का बोर्ड तो लगवा दिया है। कुछ मरम्मत कार्य भी हुआ है, लेकिन पत्थर की टूटी हुई जाली या दीवार की जगह पत्थर रेत ओर चूने से मरम्मत करवा दी गई जिससे ऐसा लगता है जैसे रेशम के कपङे पर टाट का पैबन्द लगा दिया हो।

वे बताते हैं आठ – नौ साल पहले जब प्रमोद भाया सार्वजनिक निर्माण मंत्री थे तब मंदिर के बगल से बह रही बाणगंगा नदी पर रपट बनवा दी गई और बमोरी कलाँ से बडौदा होकर श्योपुर जाने वाली मुख्य सड़क से मन्दिर तक लगभग एक किलोमीटर सम्पर्क सड़क भी बनवा दी गई है। इसलिए आजकल पूरे साल ही वहाँ देखने वालों का जाना आना होता रहता है।

( फोटो सौजन्य : विजय महेश्वरी)
—–

image_pdfimage_print


Get in Touch

Back to Top