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श्रेयांस : जीवंत रहेंगी निश्छल मुस्कान की निर्मल यादें

श्रध्दांजलि

श्रेयांस : जीवंत रहेंगी निश्छल मुस्कान की निर्मल यादें

डॉ. चन्द्रकुमार जैन

प्रभावित होना और प्रभावित करना जीवंतता का लक्षण है । कुछ लोग हैं जो प्रभावित होने को दुर्बलता मानते हैं । मैं इससे सहमत नहीं हूँ क्योंकि जो सहज से, सुंदर से, शालीन से, साधारण में छुपे निश्छल और निर्दम्भ असाधारण से प्रभावित नहीं होते, उन्हें संवेदनहीन कहना उचित है । जो जाग रहा है, वह जगत के भाव-प्रभाव से आदान-प्रदान का संबंध बनाकर ही जीवन-पथ पर आगे बढ़ता है । यही कारण है कि जिस व्यक्ति के स्वभाव और व्यवहार से अंतर समृद्ध हुआ हो, उसे बार-बार मन याद करता है । जब कभी कोई रिक्तता सताती हो, तब ऐसे व्यक्ति की यादें भी संबल व ताज़गी दे जाती हैं ।

राजनांदगांव शहर के पत्र-जगत के प्रतिष्ठित कोठारी परिवार से बहुत कम समय में ऊपर उठने वाले सूरज की तरह ऐसे ही युवा व्यक्तित्व श्रेयांस कोठारी की यादें भी गहन पीड़ा के बावजूद ऐसी मनः स्थिति को अभिव्यक्त करने का बल प्रदान कर रही हैं । सबेरा संकेत के अक्षर-पुरुष और पितामह श्री शरद कोठारी जी के पौत्र और संपादक भैया सुशील कोठारी जी और ज्योति भाभी के सुपुत्र, सी.ए. श्रीमती निकिता के जीवन साथी और मात्र डेढ़ वर्ष के नन्हें लाड़ले श्रेणिक के पिता श्रेयांस ने युवावस्था में ही 17 मई, गुरूवार को हृदय गति रुक जाने से फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया । लोग मानने तैयार नहीं थे। सब उदास, अनमने और जड़वत हो गए थे । अवसन्न हो कर बस यही कहते रह गए सब कि वक़्त से पहले ये कैसा वक़्त देखने की मज़बूरी आन पड़ी !

स्नेह वत्सला दादी माँ शीला जी कोठारी, बड़े पिता शैलेन्द्र जी कोठारी, बड़ी माँ उर्मिला जी, चाचा सुभाष जी कोठारी, चाची मधुजी, बुआ सुनीता, फूफा जी डॉ. अजय जी भंडारी सहित कोठारी और रायसोनी परिवार के अलावा असंख्य स्वजन-परिजन-आत्मीय जन निःशब्द हो गए । भ्राता शाश्वत, शिशिर, श्रीकांत कोठारी, भाभी,बहुएँ, बहनें रश्मि-नीलेश जी पारख, प्रीति-प्रसन्न जी छाजेड़, श्रुति-प्रखर जी गोलछा इस कल्पनातीत घटना से सुध-बुध खो बैठे । उधर लोगों की गहरी खामोशी, भीतर तक विदीर्ण कर देने वाली स्मृतियाँ एकबारगी लगा जैसे निष्पंद हवाओं को भी कहीं से ये संदेश लेकर आने को पुकारने लगीं कि जाओ और जा कर सभी दिशाओं को कह दो कि ये ख़बर गलत है । ऐसा नहीं हुआ। कोई बताये तो सही हम सफ़र के आगाज़ में ही अंज़ाम पर यक़ीन करें तो कैसे ?

बहरहाल, सच यही है कि श्रेयांस देहातीत हो गया है लेकिन दर्द और फर्ज़ का रिश्ता निभाने वाला लाड़ला श्रेयांस अपनी आत्मिक उपस्थिति के साथ समयातीत ही रहेगा ।

श्रद्धेय बाबू जी और नए दौर में नए अंदाज़ में आदरणीय सुशील भैया की बहुआयामी उपलब्धियों और व्यापक सरोकारों के सतत गर्व-बोध के वातावरण पले-बढ़े श्रेयांस का अवसान, कोठारी परिवार मात्र नहीं, संस्कारधानी के एक उत्साही व सेवाभावी नौजवान और होनहार चार्टर्ड अकाउंटेंट का दर्दभरा बिछोह है। वह अब स्मरण को पाथेय बनाने के लिए पुकार रहा है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।

गौरतलब है कि समाज के कार्यों के प्रति एकनिष्ठ, मित्रों के बीच सहज रूप से प्रिय और घर-आंगन में हमेशा बाल-सुलभ चंचलता के साथ अपनी प्रियकर उपस्थिति दर्ज़ करते रहे श्रेयांस का जन्म 24 नवंबर 1986 को राजनांदगांव में हुआ था । शहर के वाइडनर मेमोरियल स्कूल, युगांतर पब्लिक स्कूल से बारहवीं तक शिक्षा ग्रहण कर वह पुणे चला गया । वहाँ के नामी कालेज सिम्बियासिस से एम.कॉम करने के बाद चार्टर्ड अकाउंटेंट की कठिन परीक्षा कम समय में उत्तीर्ण कर अपनी लगन और परिश्रम को प्रमाणित कर दिखाया । मुम्बई के जाने-माने सी.ए. बंशीलाल गोलछा के समीप रहकर अपनी उपाधि को व्यवहारिक धार दी । साथ ही दिसा में कामयाबी हासिल कर बतौर सी.ए. अपनी सेवाओं को पंख दिए ।

बहुत तेजी से आगे बढ़ने और काफी ऊंचाई तक पहुंचने की असीम संभावनाओं के मद्देनजर श्रेयांस को महानगरों और बड़े शहरों से प्रैक्टिस के लिए अनेक ऑफर मिले किन्तु जन्म स्थल और संस्कारधानी से अटूट जुड़ाव के चलते श्रेयांस ने कोठारी जैन एन्ड कंपनी सी.ए. फर्म के माध्यम से अपनी व्यावसायिक यात्रा की पहचान बनायी । स्मरणीय है कि 25 जनवरी 2014 को श्रेयांस का विवाह दुर्ग के प्रतिष्ठित रायसोनी परिवार के श्री किशोर जी रायसोनी की लाड़ली बिटिया निकिता के साथ हुआ था । उधर रचनात्मक और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रसंगों में भी श्रेयांस और जीवन संगिनी निकिता दोनों कदम से कदम मिलाकर वक्तृत्व कला, एंकरिंग और गायन में भी अपनी बहुप्रशंसित प्रतिभा का परिचय देते हुए आगे बढ़ रहे थे । पति-पत्नी, मन और मंच दोनों की एकता के अनोखे उदाहरण बन गए थे । युगांतर स्कूल में पढ़ाई से लेकर तेरापंथ युवक परिषद के सचिव और उससे भी आगे सी.ए. एसोसिएशन में भी दोनों ने अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज़ की। लेकिन,नियति की निष्ठुरता के आगे श्रेयांस की साँसों से तनिक भी छोटा सौदा मुमकिन न हुआ, गोया कि किसी की नज़र लग गई कि 30-32 की दरम्यानी उम्र में भला कोई दंपत्ती इतनी नेमतें कैसे बटोर सकता है ?

बता दें कि हाल ही चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के, डॉ. रमन सिंह जी के मुख्य आतिथ्य में हुए यादगार सम्मेलन में भी श्रेयांस की प्रभावी आवाज़ गूंजी थी।मित्रों के बीच चहेते, परिवार में सबके दिलों पर राज़ करने वाले गौरवर्ण, आकर्षक डीलडौल के मनमोहक व्यक्तित्व श्रेयांस की एक-एक गतिविधि और हरेक हलचल को याद कर आँसुओं का सैलाब उमड़ रहा हो तो वह स्वाभाविक है । खैर, अब क्या कहें, ऊपर वाले को जो मंजूर था, उसके सामने कुछ भी कहना नामुनासिब है, पर इतना तो तय है कि श्रेयांस के बेवक्त जुदा होने से घर-परिवार ही नहीं शहर भी गमगीन हो गया है ।

अंत में, श्रेयांस तुम्हारे लिए बस इतना ही कि तुम्हारे चले जाने के बाद भी तुम्हारी सरल मुस्कान हमारे पास प्रार्थना की पवित्रता के साथ तुम्हारी अदम्य उपस्थिति का एहसास ज़िंदा रखेगी। छंद की तरह गूंजता रहेगा तुम्हारा भोलापन। और बहुत दूर चले जाने के बावजूद अब तुम हम सब के और ज्यादा पास रहोगे। तुम्हारी याद में कई युवाओं की ज़िंदगी रौशन हो ऎसी दुआ और कोशिश भी हम करेंगे। पर, एक बार यह भी बता कर जाते कि तुम्हारे जैसा चाहने वाला साफ़ दिल हम कहाँ से लाएंगे ? घर में सब बताते हैं कि तुम्हें दरवाज़े तक छोड़ने जाने पर भी बीच में लौट जाते थे सब कि तुम्हें जाते हुए कैसे देखें ? लेकिन, ये क्या, अब तुम्हारे कभी लौट कर न आने पर सब खुद-ब-खुद छूटे हुए और टूटे हुए महसूस कर रहे हैं। तुम्हारे घर की देहरी अब तक सब्र कर रही है कि दरवाज़े पर दस्तक देकर कोई कह दे जाने वाला कोई और था, तुम नहीं ! तुम नहीं !

(लेखक डॉ. चन्द्रकुमार जैन राजनांदगाँव के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक हैं और विभिन्न सामाजिक व साहित्यिक मुद्दों के साथ ही पर्यावरण अध्यात्म आदि विषयों पर निरंतर लिखते हैं)



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