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श्रीकृष्ण, गोपी और महारास: एक विमर्श

सन्दर्भ : शरद पूर्णिमा ………..

यद्यपि सभी धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य में प्रतीकों का, मानको को प्रयोग किया गया है किन्तु भारतीय आध्यात्मिक चिंतन परंपरा में और धर्म साहित्य में यह विशेष और वृहद् है, प्रचुरमात्रा में है।

श्रीमद्भागवत भारतीय धर्म साहित्य का कल्पवृक्ष माना जाता है और यह महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित 18 पुराणों मेंअंतिम है, निष्कर्ष रूप में है और सर्वाधिक प्रिय एवं प्रसिद्ध भी है।

भागवत के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओ का वर्णन है उन्ही में एक महारास भी है। आज इसी महारास लीला पर चर्चा, विचार करेंगे । यह महारास “शरद पूर्णिमा” के दिन रचा गया था।

“महारास” एक वृत्ताकार मंडल है और इस मंडल में प्रत्येक गोपी के सापेक्ष एक एक श्रीकृष्ण है और इस श्रीकृष्ण की दूरी सभी गोपियों से समान ही है।

वस्तुतः यह महारास सृष्टि के चक्र का एक प्रतीकात्मक चित्रण है।

सृष्टि के केंद्र में एक शक्ति है जिसे “ब्रह्म” कहते हैं,परमात्मा कहते है और श्रीकृष्ण इस परम सत्ता के पूर्ण प्रतीक है अतः केंद्र में है। “गोपियो” को ब्रह्म की सृजनात्मक शक्ति का प्रतिरूप माना जाता है। सृजेता की यह शक्ति “वृत्त की परिधि” है और इस परिधि की केंद्र से दूरी सदैव समान है,सम है, बराबर है भले ही परिधि के दो बिंदु परस्पर कितनी ही दूरी पर क्यों न हो, वह केंद्र से सदैव बराबर दूरी पर है।

परिधि पर असंख्य बिंदु (गोपी) संभव है किन्तु सबका केंद्र एक (श्रीकृष्ण) ही है और यह केंद्र (परमात्मा) हरेक बिंदु से “सम दूरी” पर है, बराबर दूरी पर है।

महारास एक “परफेक्ट सर्किल” है कँही कोई भेद नहीं है। प्रभु यानि श्रीकृष्ण सभी के साथ है इसलिए हरेक गोपी के साथ एक – एक श्रीकृष्ण को महारास में संयोजित किया गया है।

महारास का वृत्त परमात्मा और आत्मा के स्थिर और सम समबन्ध का प्रतिबिम्ब है।

एक अन्य सत्य को महारास के प्रतीक से चित्रित किया गया है वह है “जीवन”।

भारतीय चिंतन परम्परा में जीवन को चक्र माना गया है यानि जीवन वृत्ताकार है और जीवन मरण का यह चक्र जब तक परिधि पर गतिमान रहेगा यह अनवरत रूप से चलता रहेगा कभी भी यह यात्रा पूर्ण हो नहीं सकती है।

महारास के माध्यम से यह बतलाने की चेष्टा है कि व्यक्ति जीवन के रस में सतत सुख की कामना कर सकता है उसे प्राप्त भी कर सकता है और रास रंग में डूबा रह सकता है अगर वह रास के इस विकल्प को चुनता है तब उसकी यात्रा अनवरत रूप से जारी रहेगी, कभी ख़त्म नहीं हो सकती है यद्यपि यह सुखकर हो सकती है, हर्षकारी भी किन्तु यह लक्ष नहीं हो सकती है,यह अंतिम नहीं है।

दूसरा विकल्प है कि परिधि से केंद्र की तरफ चला जाए तब मंजिल निश्चित है और दूरी भी निश्चित है, परमात्मा सदैव उपस्थित है, उपलब्ध है किन्तु मार्ग के चयन के लिए वह (परमात्मा) न कोई सलाह देगा,न ही सहायता करेगा। निर्णय एवम क्रियान्वयन का उत्तरदायित्व हमारा अपना है।

श्रीकृष्ण द्वैपायन वेद व्यास ने महारास के माध्यम से जीवन के इन दोनों विकल्प को एकसाथ प्रस्तुत कर दिया है यही इसका सौंदर्य है और मन्तव्य भी।

इस रास मण्डल में श्रीकृष्ण परमात्मा है, हम स्वयं गोपियाँ है और जीवन महारास का वर्गाकार मण्डल है। हम जीवन की “वृत्त परिधि”पर ही चलते रहे या फिर “परिधि से केंन्द्र” की तरफ चलें ?

यह चुनाव हमें करना है और यात्रा भी हमें ही करनी है।

(लेखक भारतीय संस्कृति के अध्येता हैं)

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