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उग्रवाद से ग्रसित था श्री राम का बचपन

आज मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चित्र तथा उनकी मूर्तियों की धड़ल्ले से पूजा की जा रही है किन्तु उनके जीवन में क्या क्या समस्याएं आईं और उन समस्याओं का किस किस प्रकार उन्होंने निराकरण किया, उनके जीवन में कौन कौन से गुण थे जो आज हमें सुमार्ग पर चला कर कुपथ से हमें बचा सकते हैं, इस ओर किसी भी उस राम पूजक का ध्यान ही नहीं जा रहा, जो श्री राम की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा को ही अपना धर्म समझ रहे हैं| आज के युग में उनकी मूर्ति की पूजा करें या न करें किन्तु उनके चरित्र को, उनकी योजनाओं को और उग्रवाद का मुकाबला करने के लिए उनकी नीतियों को अपनाने की महती आवश्यकता है|

अत: आज हम उनके बाल्यकाल से यौवन काल तक जो जो समस्याएं उनके सामने आईं और उन समस्याओं का उन्होंने किस धैर्य, साहस और वीरता से मुकाबला करते हुए उन सब समस्याओं का निराकरण किया, इस प्रकार की घटनाओं को हम आपके सामने रखने का यत्न करते हैं, जिन से प्रेरणा लेकर आज हमें भी आवश्यकता है कि आज देश में कुछ उस प्रकार की ही अशांत, उग्र अवस्था बनी हुई है, जिसके समाधान के लिए श्री राम के समान ही हम और हमारी आज की सरकार कदम उठाये इसकी आज अत्यधिक आवश्यकता है|

आज हमें मूर्ति में बस रहे श्री राम की नहीं उस राम की आवश्यकता है, जिसने पिता के एक शब्द को ही अपना ध्येय बनाकर चोदह वर्ष तक जंगल में निवास को अपना कर्तव्य मान लिया, जबकि यह आदेश पिता दशरथ ने उन्हें कभी दिया ही नहीं था| यह तो माता कैकेयी ने श्री राम को मात्र बताया ही था कि मैंने तेरे पिता से यह वचन मांगे थे| मात्र इतना सुनकर ही श्रीराम ने वनगमन किया| श्री राम वन जा रहे हैं तो उनकी सहधर्मिणी माता सीता जी ने भी महलों के सुख त्याग कर अपने पति के साथ रहने का निर्णय भी तत्काल ही ले लिया| अनुज लक्षमण, जिन्होंने पहले से ही श्रीराम की सेवा का संकल्प ले रखा था, उन्होंने भी कभी यह नहीं सोचा कि भाई मरता है तो मरे मुझे क्या लेना? नहीं उन्होंने ऐसा नहीं किया और जंगलों के अभूतपूर्व कष्टों को महलों की सुख सुविधा से कहीं अधिक उत्तम मानते हुए उनके साथ जाने को ही अधिमान दिया और इसे ही अपना धर्म माना|

यदि उस समय राजकुमार भरत और शत्रुघ्न भी अयोध्या में होते तो वह भी अवश्य ही उनके साथ वनों में चले गए होते| इस प्रकार के माता और पिता के सच्चे अर्थों में भक्त श्री राम का प्रेरणा दायक जीवन था, जिसे आज संसार को केवल अपनाने से अथवा केवल उनकी पूजा मात्र से कुछ भी नहीं मिलेगा अपितु उनके जीवन के समान अपने आपको बनाने का प्रयास करने से ही कुछ संभव हो पावेगा तथा माता पिता को वृद्धाश्रम जाने से बचावेगा| अत: आओ हम सब मिलकर श्री राम के सामने समय समय पर आईं कुछ समस्याओं को जानने का प्रयास करते हुये, यह भी जाने कि उन्होंने किस प्रकार इन समस्याओं से पार पाया|

आज भी हमारे देश की कुछ उस काल जैसी ही अवस्था बन रही है, विदेशी आँखें दिखा रहे हैं और घर के अन्दर के लोग भी हमारे शत्रु बने बैठे हैं| इस अवस्था में हम श्री राम चन्द्र जी के जीवन से कुछ सीखते हुये इन सब परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति अपने अन्दर पैदा करें| इसके लिये पहले हमें उनके पिता राजा दशरथ के समय की राजनीतिक परिस्थितियों पर भी विचार करते हुये इस बात पर विचार भी करें कि क्या श्री राम को केवल भरत को राज्य देने के लिये ही जंगलों में भेजा गया होगा?, या फिर इस के पीछे कोई राजनीति या कोई रणनीति भी छुपी हुई थी| इस प्रकार का विचार करने पर जो तथ्य निकल कर सामने आते हैं, वह इस प्रकार हैं| लंका के राजा रावण की आँखें भारत के लगभग सब राज्यों पर और विशेष रुप से अयोध्या के राज्य पर थी, जो उस समय एक बूढे राजा दशरथ के अधिपत्य में था तो भी देश का सबसे बड़ा और सबसे सुदृढ़ राज्य था| रावण एक अत्यधिक कुटिल राजा तथा नवीनतम शस्त्रों का स्वामी था | वह अपनी प्रत्येक नीति में साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति को अपनाता था| उसके नेतृत्व में भारत के प्राय: सब क्षेत्रों में उसके भेजे हुये उग्रवादी कार्यशील थे, जिस प्रकार विगत दिनों में हमारे आज के भारत में पाकिस्तान के उग्रवादी आकर उग्रवाद के कार्य करते रहे हैं और आज भी इस प्रकर का ही प्रयास कर रहे हैं|

जिस प्रकार आज काशमीर में तथा इस से पूर्व तक भारत के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में बम फ़टते रहे हैं| यहाँ के लोगों से लूटपाट, उनकी मारकाट होती रही है| इसके लिये किसी प्रकार का सीधा युद्ध कभी भी फ़लदायी नहीं होता | इसके लिये कुछ नीतियाँ बनानी होती हैं, कुछ नीतियाँ लम्बे समय के लिये ओर कुछ नीतियाँ छोटे समय के लिये| इन नीतियों पर चलते हुये ही कुछ फ़ल मिला करता है|

दशरथ इस समय तक निसन्तान था| इसने भी कुछ अत्यन्त दीर्घकालीन नीतियां बनाईं| इन नीतियों पर कुछ कार्य भी आरम्भ हुआ कि अयोध्या का सौभागय ही कहें कि इस राजा की तीन रानियों से लगभग एक साथ ही चार सन्तानें हुईं और वह भी चारों पुत्र | कहा तो यह भी जाता है कि इन चार भाइयों की एक बहिन भी थी, जिसका नाम शकुन्तला था तथा उसका विवाह एक ॠषि के साथ हुआ था| खैर चार पुत्र सन्तानों के होने से इस राज्य को कुछ शक्ति मिली और इन सन्तानों को बडे योजना पूर्ण ढंग के साथ शस्त्र विद्या के साथ ही साथ नीति की शिक्षा भी दी गई| इस प्रकार की उत्तम शिक्षा दी गई कि यह राजकुमार छोटी आयु में ही बडे बडे महारथियों के साथ मुकाबला करते हुये विजय प्राप्त कर सकें| इनके गुरु लोग भी अपने समय के अद्वीतीय गुरु थे|

उस समय गुरु विश्वामित्र एक बहुत बडे ॠषि( वैज्ञानिक) थे| यह ॠषि नित्य यज्ञ( अनुसंधान) करते थे| इनके यज्ञ का अर्थ केवल आज के अग्निहोत्र तक सीमित नहीं था अपितु सब प्रकर की विद्याओं, जिसमें शस्त्र विद्याओं को भी समाहित किया जावे, शस्त्र बनाने तथा शस्त्र प्रयोग करने, दोनों में ही वह अपने काल के अद्वितीय ॠषि थे| अयोध्याधीश ने इस ॠषि से शिक्षा अपने बच्चों को दिलवानी चाही किन्तु यदि वह सीधे रूप से बच्चों को उनके पास भेजते तो सम्भव था उस समय के उग्रवादियों के नेता रावण को अच्छा न लगता ओर ऐसा न होने देता| भले ही इस समय तक इन भाईयों ने अत्यधिक शस्त्र विद्या तो प्राप्त कर ही ली थी किन्तु कुछ अत्यधिक उपयोगी विद्यायें इस प्रकार की थीं कि जिन्हें केवल गुरु विश्वामित्र ही दे सकते थे| सम्भवतया इस उद्देश्य को लेकर कोई योजना बनाई गई हो ओर उस योजना के अन्तर्गत ॠषि विश्वामित्र जी उन दो बालकों को शिक्षित करने के लिये यह बहाना लेकर अयोध्या आये हों कि उनके यहाँ यज्ञ करने का राक्षस लोग विरोध करते हैं और यज्ञ( शोधशाला, जहाँ बम आदि शस्त्र बनाए जाते थे) भंग कर देते हैं| उन राक्षसों से रक्षा के लिये यह दो बालक उनके साथ भेज दिये जावें|

सम्भवतया दशरथ द्वारा राम लक्ष्मण को उनके साथ भेजने से इन्कार भी उनकी योजना का ही एक भाग रहे होंगे, जो बाद मे स्वीकारते हुये दोनों भाइयों को उनके साथ भेज देते हैं| यह दोनों बालक जब अयोध्या से ऋषि आश्रम ( जो जनक पुरी के निकट था) की और जा रहे थे तो मार्ग में ही गुरु ने शिष्यों की परिक्षा लेने के लिए कहा कि यहाँ से उनके आश्रम को जाने के लिए दो मार्ग हैं, एक मार्ग तो बहुत लंबा किन्तु संकट विहीन है तो दूसरा मार्ग छोटा तो है किन्तु संकटों से भरा हुआ है क्योंकि इस क्षेत्र में रावण की बहिन ताड़का रहती है, जो बहुत ही उग्रता के साथ आक्रमण करके यहाँ से निकलने वालों को समाप्त कर देती है| उसके साथ उसका एक बेटा और एक भतीजा भी( खर और दूषण) इस क्षत्र में ही आतंक मचाते रहते हैं| वीर बालकों ने इसे अपनी परीक्षा का ही एक उत्तम अवसर मानते हुए इस छोटे मार्ग को ही अपनाना स्वीकार किया और कहा की हम मार्ग में आने वाले इन दुष्टों को भी तो देखना चाहते हैं| परिणाम स्वरूप इस मार्ग से ही वह आगे बढ़े और इस मार्ग में ही उन्होंने ताड़का और उनके भतीजों से मुकाबला करते हुए उन्हें मार्ग से खदेड़ दिया और सफलता पूर्वक बिना किसी हानि के ही आश्रम में पहुँच गए|

दूसरे दिन से जब इन ऋषियों ने पुन: अनुसंधानात्मक यज्ञ आरम्भ किया तो यह तीनों दुष्ट फिर से मार्ग का रोड़ा बन गए| इस यज्ञ के रक्षक के रूप में अपने धनुष( उस समय संभवतया विनाशक शस्त्रों को धनुष बाण कहते होंगे| जिस प्रकार आजकल राकेट अथवा भयंकर शस्त्र किसी विशेष साधन से चलाये जाते हैं, इस प्रकार ही जिस साधन से शस्त्र छोड़ा जाता था, उसे संभव है धनुष कहा जाता हो और जो शस्त्र अथवा बम छोड़ा जाता था उसे बाण कहते हों| जयपुर के जयगढ़ दुर्ग के अन्दर एक तोप पड़ी है, इस तोप को आज भी जय बाण के नाम से जाना जाता है| यह मेरे इस कथन की संतुति करता है|) बाण लेकर तैयार खड़े थे क्योंकि इन दो बालकों को बालक मात्र समझते हुए एक दिन पूर्व ही उनसे यह दुष्ट पराजित हो चुके थे, इस कारण उनसे डर भी रहे थे और उनसे लोहा भी लेते हुए उन्हें हराना भी चाहते थे| इस कारण इस शोद्धषाला रूपी यज्ञ को ध्वस्त करने के लिए वह छुप छुप कर आक्रमण कर रहे थे किन्तु राम और लक्षमण के शस्त्र उन्हें कुछ भी कराने नहीं दे रहे थे| संभव है यह अवस्था अनेक दिन तक अनवरत रूप से चलती रही हो और अंत में एक दिन ऐसा आया कि एक एक करके इन तीनों का दोनों भाइयों ने अंत कर दिया| इस प्रकार अब यहाँ निवास कर रहे शोधार्थी ॠषियों को निर्विघ्न अपने शोध रूपी यज्ञ को संपन्न करने का अवसर मिल गया|

संकट काल में जब कोई वीर राज्य का राजकुमार किसी अन्य शक्तिशाली राज्य से सम्बन्ध बना लेता है तो उसकी शक्ति दोगुणा हो जाती है, उसके सामने कोई भी दुष्ट टिक पाने का साहस नहीं कर पाता| गुरु विशवामित्र जी का यज्ञ तो निर्विघ्न चलने लगा था किन्तु देश के दूसरे भागों में अभी भी यह संकट बना हुआ था| इस कारण अयोध्या को और भी अधिक बलशाली बनाने की आवश्यकता का इस मुनि ने अनुभव किया और इन दोनों बालकों को लेकर जनकपुरी में हो रहे स्वयंवर में ले गया| जब सव्यंवर में किसी भी देश का राजा शर्त पूरी करने में सफल नहीं हुआ तो गुरु आज्ञा से श्री राम चन्द्र जी ने अपनी परीक्षा दी और इस परीक्षा के लिए रखे गए पुराने धनुष को तोड़ कर सीता से विवाह कर लिया| इसके साथ ही राजा दशरथ की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए सीता की दूसरी बहिन और चचा की दोनों बेटियों का विवाह भी दशरथ के अन्य तीनों पुत्रों के साथ करके एक न टूटने वाला बंधन अयोध्या और जनकपुरी में बन गया| इन दोनों के मिलने से अयोध्या की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई इसके साथ ही जनकपुरी का भी दूर दूर तक कोई शत्रु नहीं रहा|

हम अनुमान लगाते हैं कि अयोध्या को सुरक्षित करते हुए दानवों से अयोध्या अथवा भारत को बचाने के लिए इन दोनों महाशक्तियों के मध्य होने वाले युद्ध को भारत से बाहर ले जाने का प्रयास अयोध्या का रहा होगा जबकि रावण की भी यह ही इच्छा थी कि युद्ध हो तो लंका में हो ताकि अयोध्या की सेना को न तो ठीक से खाने को ही कुछ मिल सके और न ही शस्त्रास्त्रों की ही यथा समय आपूर्ति हो पावे और अयोध्या की सेना यहाँ पर ही भूख से और शस्त्रों के अभाव से दफ़न हो जावे| इस योजना को बहुत समय पूर्व ही बना लिया गया होगा| इस योजना के अनुसार ही राजा दशरथ का विवाह जब रानी केकई से हुआ तो उसके साथ एक दासी भी भेज दी गई ताकि समय समय पर बनाई जा रही योजनाओं को पूरा करने के लिए वह अपनी रानी को विवश करती रहे| इस योजना के एक अंग रूप में ही सम्भवतया जब राम को राज्य देने की घोषणा की गई तो इस दासी ने कैकेयी को अपने पति से लिए गए दो वचनों को आज माँगने का उत्तम समय बताते हुए कहा कि वह एक वचन में अपने बेटे भरत को राज्य दिलावे तथा दूसरे वचन में राम को एक दो नहीं अपितु पूरे चोदह वर्ष तक के लिए वनों में रहने के लिए कहें| इससे यह लक्षित होगा की राक्षस लोग समझेंगे कि अयोध्या के राजकुल में टूट हो गई है और अब अयोध्या को वह सरलता से झपट सकते हैं|

परिणाम स्वरूप श्रीराम अपनी पत्नी सीता तथा भाई लक्ष्मण के साथ वनों को गए| इस समाचार को सुनकर विदेशी दुष्टों के आनंद की कोई सीमा न रही किन्तु वह इस बात को नहीं जानते थे कि वनों में भी प्रत्येक कदम पर अयोध्या की सेना वेश बदल कर श्री राम चन्द्र जी का सहयोग कर रही थी|(ठीक उस प्रकार जिस परकर पूर्वी पाकिस्तान के अन्दर १९७१ में भारतीय सेनाओं ने बंगला देश की सेनाओं का वेश बनाकर वहां पर पाकिस्तान की सेना के साथ युद्ध करते हुए मुजीबुरहमान तथा उसके साथियों की रक्षा की और पाकिस्तान की सेना के एक लाख सैनिकों को बंदी बनाकर भारत ले आये तथा बंगलादेश को पाकिस्तान के चंगुल से निकाल कर एक आजाद देश बना दिया) चाहे बाली को हटाना हो, चाहे सुग्रीव की सहायता की घटना हो, हनुमान से मिलना हो, यह सब अयोध्या की योजना से ही हो रहा था और अयोध्या में फूट का दिखावा करते हुए वनों में श्री राम को निरंतर अयोध्या की और से सहयोग मिल रहा था, जिन कारणों से अपने प्रत्येक प्रयास में सफल होते हुए श्री राम निरंतर रावण के निवास लंका की और बढ़ रहे थे|

लंका का राजा रावण इस बात को अंत तक नहीं जान पाया होगा कि यह अयोध्या का एक षडयंत्र है, जो उसके विनाश के लिए रचा गया होगा| इस कारण रावण इन दोनों भाइयों पर वनमार्ग में लगातार कुटिलता करता रहा और यह दोनों भाई रावण की इन कुटिल चालों को ध्वस्त करते हुए निरंतर आगे ही बढ़ते चले गए| इस समय तक वह अपने योजना के अनुसार जो जो भी गुप्त निर्णय लेकर आये थे, उन सब को बड़ी सूझ बूझ से सफल करते हुए आगे बढ़ रहे थे| इन चरणों में ही रावण के एक बेटे तथा बहनोई सुबाहु आदि का भी श्री राम ने मुकाबला किया और उनकी विशाल तथा विनाशक सेना में से एक सैनिक को भी जीवित नहीं छोड़ा और इन दोनों को भी नरक में भेज दिया| इसके पश्चात् इन दोनों भाइयों के सामने रावण की बहिन सूर्पनखा आती है| उसके पति की तो मृत्यु हो चुकी थी और राक्षसों में यह परम्परा उन दिनों चलती थी की एक विधवा स्त्री पुन: विवाह कर सकती है| इस कारण उसने पहले श्री राम और फिर श्री लक्ष्मण को लुभाने का भरसक प्रयास किया| राम और लक्षमण नहीं चाहते थे कि एक महिला पर शस्त्र उठाये जावें, इस कारण वह उसे समझाते रहे किन्तु जब वह किसी भी प्रकार मान नहीं रही थी तो लक्ष्मण ने उसे इतना बुरा भला कहा कि वह इस अपमान के घूंट को पीकर अपने भाई रावण के पास गई और उसे कहा कि उन दोनों भाइयों ने उन्हें इतना अपमानित किया कि वह उस अपमान को कभी भूल नहीं सकती और बदले की आग में तड़प रही है| इस अपमान के लिए आज भी बहुत सी महिलायें अपनी पुत्रवधु अथवा बच्चों की किसी भयंकर गलती पर कहती है कि क्या नाक कटवा ली है तूने| इस प्रकार इस अपमान का आर्थ ही नाक कटवाना था| भाव यह है कि सुरपनखा को इतना अपमानित किया गया कि वह इसे अपने नाक कटाने के समान समझने लगी|

हम जानते हैं कि रावण की इच्छा थी कि युद्ध को लंका में ले जाया जावे और अयोध्या भी इस इच्छा को ही अपने अन्दर संजोये हुए था| इस लक्ष्य के कारण ही अब अयोधया को अपनी अंतिम इच्छा पूर्ण करने का अवसर दिखाई दिया, जिसके लिए वह सीता को साथ लेकर आये थे| आज से लगभग पचास वर्ष पहले भारत में प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका जिसका नाम सरिता है, में एक लेख प्रकाशित हुआ था| इस लेख में लिखा था कि श्री राम चाहते थे कि रावण उनकी पत्नी को उठाकर लंका में ले जावे ताकि उन्हें लंका पर आक्रमण करने का बहाना मिल जावे| रामानंद सागर ने भी रामायण पर एक धारावाहिक बनाया था, जिसे आज कोविड के इन दिनों में अनेक चेनलों पर दिखाया गया और दिखाया जा रहा है| इस धारावाहिक में भी एक अवसर पर दिखाया गया है कि श्री राम ने सीता को महाराजा अग्निदेव के पास गुप्त रूप से छोड़ दिया और उसके बदले में सीता जी की शक्ल की ही एक अन्य महिला को रख लिया ताकि रावण इसे अपहरण कर लंका ले जावे और इसे वह यह कहते हुए कि रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है| इसलिए वह लंका के साथ युद्ध करना चाहते हैं| इस बात की भनक तो उन्होंने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भी नहीं लगने दी|

जैसा की अयोधया तथा श्री राम का अनुमान था ठीक वैसे ही हुआ| रावण ने मारीच नामक एक व्यक्ति को कुटिल वेश में सोने का हिरन के रूप में श्री राम की कुतिया के आसपास कुलाचें भरने के लिए भेजा ताकि वह श्रीराम और लक्षमण को वहां से दूर ले जावे और फिर वह सरलता से सीता का हरण कर ले| हुआ भी ठीक इस प्रकार ही| स्वर्ण मृग कुतिया के पास कुलाचें भरने लगा, इसे देखकर सीता जी ने इस हिरन को पकड़ने के लिए अपने पति को कहा|

राम जानते थे कि सोने का मृग नहीं होता तो भी वह समझ गए की आज उनकी बनाई हुई योजना पूर्ण होने जा रही है, बस फिर क्या था उन्होंने अपना धनुष और तुणीर उठाया और हिरण के पीछे हो लिए| कुछ दूर जाने पर एक तीर हिरण के लगा और वह घायल हो गया| इस अवस्था में भी रावण के कपा से बचने के लिए चिल्लाया“ हाय लक्षण भ्राता! मुझे अचाओ|” इस वात को आप भी सब लोग सरलता से समझ सकते हैं और उस समय के लक्ष्मण, सीता और यहाँ तक कि श्री रामचंद्र भी समझते थे| जब वह इस प्रकार चिल्लाया तो यह आवाज उनकी कुटिया तक पहुँचती हैै, जिसमे उस समय लक्ष्मण और सीता रुके हुए थे| यह समझ सकते थे कि जब इस प्रकार की आवाज उन तक पहुँच सकती है तो वह प्रत्युत्तर में यह भी चिल्लाते हुए पूछ सकते थे कि भ्राता राम क्या हुआ है| मैं सहायता के लिए माता सीता जी को अकेले छोड़ कर आऊ क्या? उधर श्री राम भी समझ सकते थे कि इस आवाज को सुनकर सीता जी निश्चय ही सहायता के लिए लक्ष्मण को भेज देगी| यह कुटिलता है, इससे बचने के लिए वह भी चिल्ला कर कह सकते थे कि मुझे कुछ नहीं हुआ लक्ष्मण इधर सीता को अकेले छोड़ कर मत आना| परिणाम स्वरूप लक्ष्मण अयोधया की बनाई गई योजना के अनुसार वहां से राम की सहायता के लिए चला जाता है और फिर रावण के लिए सीता हरण का मार्ग साफ़ हो जाता है|

उन दिनों जँगलों में निवास करने वाली एक जाति होती थी, जिसे गिद्ध कहा जाता था| इस जाति के राजा का नाम जटायु था| जिस प्रकार रावण के पास वायु मार्ग से जाने के लिए विमान था उस प्रकार ही इस राजा के पास भी एक विमान था| इस विमान से वह जा रहा था कि उसने सीता के चिल्लाने की आवाज सुनी और उसने देखा कि रावण एक महिला को लिए वायुमार्ग से भागा जा रहा है| उसने इस दुष्ट को ललकारा, उसके साथ इस महिला को छुडाने के लिए उससे युद्ध भी किया किन्तु इस युद्ध में वह बुरी प्रकार से घायल हो गया| इसे सौभाग्य ही कहें कि जब राम और लक्ष्मण सीता जी की खोज करते हुए उधर से निकले तो घायल पड़े जटायु ने उन्हें बताया कि सीता का अपहरण कर लंका का राजा रावण लंका ले गया है| इस समय एक विशाल सेना का इन दोनों भाइयों को साथ मिलता है| यह सेना जंगल के लोगों की थी| इस जाति के लोगों को वानर कहा जाता था | मैं तो यह भी मानता हूँ कि इस सेना का एक बड़ा भाग अयोध्या से गुप्त रूप में आई सेना का ही रहा होगा| इस सेना की सहायता से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए आठ योजन की दूरी का पुल केवल आठ दिन में त्यार कर दिया गया और इतना मजबूत कि लगभग ग्यारह लाख वर्ष बीतने के पश्चात् भी यह पुल रामेश्वरम् से श्रीलंका तक आज भी ज्यों का त्यों खडा हुआ है| इस से शत्रु दल में भय पैदा हो गया|

कहा जाता है कि शत्रु को भयभीत कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना लाभदायक होता है| इस नीति के लिए ही हनुमान जी लंका गए | जहाँ उन्होंने सीता जी को सांत्वना दी ,वहां दो कार्य और भी कर दिये| एक तो यह कि रावण के भाई विभिक्षण जी के मन में श्रीराम के प्रति आस्था का बीज बो दिया तो दूसरे यह कि लंका के लोगों में आपसी कटुता भर दी जिसे आग लगाना कहा जाता है| इस प्रकार लंका दो गुटों में बँट गई तथा कुछ समय बाद रावण का यह भाई भी रावण की दुष्टता के कारण उसका साथ छोड़ कर श्री राम के साथ आ मिला| इस प्रकार लंका पूरी तरह से बाँट दी गई और उसकी शक्ति बहुत कम हो गई|

युद्ध हुआ, शत्रु दल ने खूब कुचालें चलीं किन्तु राम और उनकी सेना के सामने उनकी एक न चली | विभीषण को श्री राम ने अपने भाई के साथ युद्ध लड़ने की अनुमति तो नहीं दी किन्तु समय समय पर आवश्यकता अनुसार विभीषण से सलाह अवश्य लेते रहे | इस सब का यह परिणाम हुआ कि रावण युग का अंत हो गया और अब लंका पर श्री राम ने विभीषण को राज्य पर आसीन किया और स्वयं वहां से एक विमान लेकर अयोध्या के लिए रवाना हो गए क्योंकि अब चोदह वर्ष पूर्ण होने के लिए केवल एक दिन ही शेष रह गया था|

अयोध्या आने पर श्रीराम लक्ष्मण और श्रीमती सीता जी का भव्य स्वागत हुआ| जिस सुरुपनखा के कारण राम रावण में यह युद्ध हुआ था. वह महिला लंका से रावण का अधिपत्य समाप्त होने पर फिर से बदले की आग में जलते हुए अयोध्या में ही रूप बदल कर रहने लगी थी और नित्यप्रति कुटिलता से राम राज्य में तोड़ पैदा करने का प्रयास कर रही थी| अपने इस प्रयास में उसे सफलता भी मिल रही थी क्योंकि बहुत से नगर सेठ उसकी कुचालों का भाग बन चुके थे| इन कुचालों के परिणाम स्वरूप श्री सीता जी को एक बार फिर से वनों की और मुंह करना पडा| जहां उसने दो सन्तानों को जन्म दिया और इन सन्तानों का लालन पालन इस प्रकार किया कि यह दोनों बालक भी अपने पिता के समान बाल्यकाल में ही अद्वीतीय योद्धा बन गए तथा रावण की मृत्यु के पश्चात् जो कुछ आतंकवादी उसके साथी बचे थे वह इस देश में एक बार फिर से आतंक का वाता वरण बना रहे थे| इन दोनों बालकों ने एक एक कर इन आतंकियों का नाश करना आरम्भ कर दिया| अंत में यह सुरपनखा को भी समाप्त करने में सफल हुए और इस प्रकार अयोध्या में पूर्ण शान्ति ठीक उस प्रकार स्थापित हो गई जिस प्रकर पंजाब के पूर्व राज्यपाल सुरेन्द्र कुमार( सुपुत्र बलिदानी महाशय राजपाल) तथा उनके मार्ग पर आगे बढ़ रहे बेअंत सिंह ने पंजाब से आतंकवादियों को चुन चुनकर मौत के घात उतारा और पंजाब में शान्ति स्थापित की|

कुछ इस प्रकार का कार्य ही हमारे आज के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी भी कर रहे हैं| आज चुन चुन कर आतंकवादियों को मारा जा रहा है| हाँ! कोई आतंकवादी दिल से अपने में सुधार करते हुए क्षमा मांगता है तो मोदी जी उस पूर्व आतंकवादी का साहस बढाते हुए उसे अपने साथ मिला कर उसके पुनर्वास की व्यवस्था भी कर रहे हैं| इसका ही परिणाम है कि आज हमारे अपने ही देश के कुछ विरोधी राजनेता सत्ता की भूख में विदेशियों के हाथों खेल रहे हैं| हमारी जनता का एक भाग भी मोदी जी के कार्यों का विरोध करता दिखाई दे रहा है किन्तु हमारे प्रधान मंत्री एक मस्त हाथी की चाल चलते हुए निरंतर आगे बढ़ रहे हैं| सेना को किसी शत्रु से दो दो हाथ करने की खुली छूट दे दी है| शत्रु के घर में घुस कर उसे मारने के कार्य करते हुए भी कोई भय नहीं अनुभव करते| इसका ही परिणाम है कि आज चाहे पाकिस्तान हो चाहे चीन हो आँखे तो दिखाते हैं किन्तु मोदी के दृढ साहस के सामने उनकी एक नहीं चल पा रही है और ठीक उस प्रकर ही दुनिया भर में मोदी मोदी हो रही है, जिस प्रकार सब और श्री राम जी की जय के नारे लगते ही रहते हैं|

इस सब से यह संकेत ही जाता है कि शत्रु को विजय के लिए यह आवश्यक है कि शत्रु की शकि्त को समझिये, उस शक्ति को क्षीण करने के उपाय करो| शत्रु को विभाजित कर दो| उसे निरुत्साहित कर दो| उसमे फूट का बीज डाल दो| इसके साथ ही साथ अपने साथियों को एक बनाए रखो तथा अपनी सैन्य शक्ति को भी लगातार बढाते हुए विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेना बनाओ और विदेश में भी अपना प्रभाव बढाओ और शत्रु का प्रभाव कम करो| ऐसा करने से ही उग्रवाद का नाश होगा और शत्रु देश हमारे सामने अपना सर झुकाने में बाध्य होगा| यही ही सफलता का एकमेव रहस्य है|

यह जो कुछ मैंने लिखा है यह सत्य है या नहीं मैं नहीं जानता किन्तु मेरा मन यह मानता है, मेरा अनुमान यह है कि समभ्वतया इस प्रकार की ही अवस्था रही होगी श्री राम के समय और इस प्रकार के ही प्रयास किये गए होंगे, जिस से अयोधया, उसके शासन, उसकी सेना और वहां के नागरिकों को सुरक्षा मिली और उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक निर्भय जीवन आरम्भ किया| सब लोग सुखी थे, किसी को कोई कष्ट नहीं था| समय पर वर्षा होती थी, समय पर वृक्षों पर फ़ल लगते थे और कभी किसी पिता के जीवित रहते हुए उसके बालक की मृत्यु नहीं होती थी| इस सब का कारण था कि प्रत्येक परिवार दोनों समय यज्ञ अग्निहोत्र करता था| वस का परिणाम ही था कि उस काल में वायुमंडल पूरी प्रकार से स्वच्छ था और प्रकृति का पूर्ण साथ उस समय के लोगों को मिलता था| इस कारण ही तुलसी दास जी को लिखना पडा होगा:-

दैहिक दैविक भौतिक तापा राम राज नहीं काहू ही व्यापा |
बयरु न वैर प्रीत सन कोऊ राम राज बिनु विषमता खोई||

डॉ. अशोक आर्य
पाकेट १/६१ रामप्रस्त से.७ वैशाली
२०१०१० गाजियाबाद उ. प्र. भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६ व्हट्स एप्प ९७१८५२८०६८
E Mail [email protected]

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