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आकाश सोनी ने खोली टीवी की बहसों की पोल

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने नोएडा में दो द्विसीय सत्रारंभ समारोह का आयोजन किया। जिसमें कई दिग्गज पत्रकारों ने वक्ता के रूप में शिरकत की और छात्रों को संबोधित किया।

इसी कड़ी में न्यूज चैनल पर होने वाली डिबेट के बारे में बोलते हुए ‘आईबीएन7’ चैनल के जाने-माने न्यूज एंकर आकाश सोनी ने कहा कई बार मैं एंकरिंग करते समय ये सोचता हूं कि डिबेट शो में होने वाली मछली बाजार जैसी बहस के बारे में जनता क्या सोचती होगी? उन्होंने कहा कि कई बार प्रोग्राम के बीच में बढ़ती बहस को कम करने के लिए गेस्ट की आवाज को दबाना पड़ता है, लेकिन हमाने कान में प्रड्यूसर लगाताकर कहता रहता है कि बहस थोड़ी बढ़ने दीजिए, आखिरकार मसला टीआरपी का भी है।

उन्होंने कहा अभी जनता को जो दिखाया जाता है वे देखते हैं लेकिन इस दिशा में तब बदलाव आएगा, जब जनता के पास च्वॉइस आ जाएगी, जब टेक्नॉलोजी अगले चरण में पहुंच जाएगी, जब जनता को खबरों को चुनने का मौका मिल जाएगा कि उसे कौन सी खबर कितने बजे और कितने समय तक देखनी है।

उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि आज समय बदल रहा है। लोगों के पास अखबार पढ़ने या टीवी देखने का समय नहीं है। ज्यादातर लोग खबरों के लिए मोबाइल ऐप या वेबसाइट का इस्तेमाल कर रहे हैं।

छात्रों के सवालों का जवाब देते हुए आकाश सोनी ने कहा कि अधिकांश चैनल किसी न किसी पार्टी से जुड़ हुए हैं। उन्होंने कहा कि जब मैं बीबीसी में काम करता था तो मेरे एक पाकिस्तानी मित्र ने मुझसे पूछा कि आपका मीडिया ज्यादा स्वतंत्र है। आप लोग तेज बोलते हो और स्टाइलिश लिखते हो। लेकिन यहां के न्यूज चैनल या मीडिया हाउसेज को कंट्रोल कौन करता है?

उन्होंने बताया कि मैंने उन्हें जवाब दिया कि अधिकांश भारतीय मीडिया को कोई न कोई इंडस्ट्री से जुड़े हुए लोग कंट्रोल करते हैं और इन इंडस्ट्रीज के जरिए ही मीडिया पर भारत सरकार की पकड़ है। उन्होंने कहा कि इस शिकंजे में गिरफ्त में भारतीय मीडिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की मीडिया है। उन्होंने कहा कि जो जितना ज्यादा विकसित देश है, वहां सच बोलने का स्पेस उतना ही कम होता जा रहा है। लेकिन यहां अच्छी चीज ये है कि अब वेबसाइट्स या ब्लॉग पर, ट्विटर या फेसबुक के जरिए अब ऐसे प्लेटफॉर्म तैयार हो गए हैं, जहां लोग अपनी बात रख सकते हैं, जो टेलिविजन पर नहीं रख पाते थे। जनता अब क्या सोचती है ये अब पत्रकारों के सामने आता है और पत्रकार और अधिक सेंसटिव होना पड़ता है। पहले पत्रकारों की शर्तों पर लोगों को सोचना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब लोग वाद-विवाद करते हैं। उन्होंने कहा कि एक पत्रकार पर कई तरह के प्रेशर होते हैं। मीडिया पर टीआरपी का भी प्रेशर होता है, लेकिन जो इन सबसे अलग होकर सच बोल पाए वही बड़ा पत्रकार होता है।

साभार- samachar4media.com/ से

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