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मुस्कान – वह नन्ही कोरोना योद्धा

(यह सच्ची घटना है। कोविड-19 से प्रभावित या भयभीत स्वास्थ्यचर्या से जुड़े सभी पेशेवर लोगों के लिए उपयोगी।)

नन्हीं सी बच्ची-जाने कब से फूट-फूट कर रो रही थी। पास में खड़ा उसका पिता, बार-बार फरियाद कर रहा था कि मुझे बेटी के साथ आइसोलेशन सेंटर के अंदर जाने की इजाजत दो। बहुत ही दर्दनाक दृश्य था। मुझे भी अपने आंसू रोक पाना मुश्किल हो गया था । सरकारी नीति के अनुसार आइसोलेशन की जगहों में केवल कोविड-पॉजिटिव लोग ही भर्ती किए जा सकते हैं। मुस्कान जहां पॉजिटिव थी, वहीं उसका पिता निगेटिव था। मैने बाप-बेटी दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की कि दो हफ्ते तक अलग रहना तुम्हारे ही हित में है। उधर, तैनात सुरक्षा कर्मियों के सब्र का पैमाना छलका जा रहा। फुल वॉडी प्रोटेक्टिव सूट पहिने एक सुरक्षाकर्मी ने इसी बीच मुस्कान का हाथ पकड़ा और हौले से सेंटर के भीतर ले जाने लगा।

मुस्कान का दाहिना पैर पूरा का पूरा फूला और पट्टियों से भरा हुआ था। उसकी की लंगड़ाती चाल देख अंदाज लगाना कठिन नहीं था कि अब शायद उसमें बगैर सहारे के चलने की ताकत ही नहीं बची है। ‘पापा को आने दो, प्लीज। मैं उनके बिना नहीं रह सकती’, बरसती आंखों से हाथ जोड़कर उसकी बार-बार की जाने वाली यह फरियाद इतने दिनों बाद भी मुझे याद है। मैं बिलकुल मूक, जड़ सा बना वहां खड़ा था। समझ से परे था कि उसे आखिर, समझाऊं तो समझाऊं कैसे। मैने यह कहकर दिलासा देने की कोशिश की कि मैं उसे दिन में दो बार मिलने आऊंगा और वह जब चाहे मुझे मेरे मोबाइल पर कॉल कर सकती है। मेरी बातों का उसपर कोई असर नहीं दिखा। आखिरकार उसे अपने पिता से अलग होना ही पड़ा।

पिता गुस्सा हो गया था और बुरी तरह चीख-चिल्ला रहा था। बेटी के उसके पास रहने से, उसके भी वायरस का कैरियर होने के खतरे से सावधानीवश मुझे उससे सुरक्षित दूरी बनाए रखने की कोशिश करनी पड़ रही थी। ऐसे में कब बैरिकेड फलांग कर वह फफकते हुए मेरे पैरों पर गिर पड़ा पता भी नहीं चला। मेरे बोलने की शक्ति अब जैसे गायब हो गई थी। हिम्मत ही नहीं बची थी कि उससे दूर भाग जाऊं।

मुस्कान 14 साल की अबोध बच्ची है-घुटने की हड्डी के ऑस्टियो सार्कोमा से पीड़ित। दो हफ्ते पहले मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में उनकी मेजर सर्जरी हुई, जो नौ घंटे चली। सर्जरी में घुटने को जोड़ हटा देने पड़े, जिसकी जगह उसे लगाया गया 14 इंच लंबा धातु का कृत्रिम अंग। इससे उसके पैर पर 20 सेंटीमीटर का एक लंबा घाव स्पष्ट दिखता था। सर्जरी से चंगा होकर वह घर जाने के इंतजार में ही थी कि उसे कोविड-19 की वजह से बुखार हो आया। पूरा परिवार इससे व्याकुल हो गया। मुस्कान झारखंड के एक गांव से आई है, जहां छोटे भाई की देखभाल के ‌लिए उसकी मां को रहने की मजबूरी है। टाटा हॉस्पिटल में वह अपने पिता के साथ रहती है। दिक्कत यह है कि कोविड की वजह से उसे जिस आइसोलेशन केंद्र में भेजा जाना है वह हॉस्पिटल से 20 किलोमीटर दूर है, जबकि उसके पिता को दूसरी जगह क्वेरंटाइन किया जाना है। बेटी के साथ रहने की अनुमति मिल जाए इसके लिए बाप ने ममतावश हॉस्पिटल के सुरक्षा कर्मियों से झूठ बोल दिया कि वह खुद भी कोरोना पॉजिटिव है। यह झूठ ज्यादा देर टिका नहीं। उसकी पोल तब खुली, जब आइसोलेशन केंद्र के गेट पर वह गले की जांच की रिपोर्ट पेश नहीं कर पाया।

मेरी यह तंद्रा अचानक सुरक्षा कर्मियों की चिल्लाहट से टूट गई, जो इस बात से बहुत नाराज दिख रहे हैं कि मैं ऐसे हाई-रिस्क प्राणी के इतने करीब क्यों हूं। मैं उछल कर मुस्कान के पिता से दूर हो गया, जो अभी तक हाथ जोड़े जमीन पर विलाप कर रहा है। मैं उसे भरोसा दिलाता हूं कि मेरी टीम उसकी बेटी की अच्छी तरह देखभाल करेगी। दुःख भरे चेहरे के साथ आखिर वह धीरे-धीरे चला जाता है।

मिनटों बाद अपने आइसोलेशन वॉर्ड से मुझे मुस्कान का कॉल आया। वो बुरी तरह सुबकते हुए मुझसे बात कर रही थी। जाहिर है, वह डरी हुई थी और खुद को अकेला महसूस कर रही थी। उसे जिस जगह रखा गया है मुंबई का एक विशाल इनडोर स्टेडियम है (NSCI, या नैशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया), जिसे 500 शय्याओं वाले एक विशाल आइसोलेशन सेंटर में बदल ‌दिया गया है। कोविड-19 को पूरी तरह समर्पित इस केंद्र में 75 शय्याएं कैंसर मरीजों के लिए भी हैं। मुंबई महानगरपालिका इस केंद्र का बहुत कुशलता से संचालन कर रही है।

टाटा हॉस्पिटल के इन कैंसर मरीजों में मुस्कान अकेली बच्ची थी। फोन पर मैं उसे पुचकारता रहा। अपने परिवार और अपनी बेटी के बारे में जानकारी दिया और बताया कि मैं अपनी बेटी को कितना प्यार करता हूं। 20 मिनट की बातचीत में उसे बार-बार बताता हूं कि मैं तुम्हारी देख-भाल अपनी बेटी की तरह ही करूंगा। मकसद सिर्फ यही था कि किसी तरह उसका ध्यान अकेलेपन के डर अपने पिता से अलगाव से दूर हो जाए। पर, मुस्कान है कि एक शब्द बोले बिना रोये जा रही थी। जाहिर है, मेरे ढाढ़स का उसपर कोई असर नहीं दिख रहा था। फोन कानों से हटते ही झार-झार मेरे आंसू भी बहने लगे हैं।

घर आकर मैंने पत्नी को पूरा वाकया सुनाया। रात को हम दोनों मुसकान से विडियो कॉल पर बातें करते हैं। वह मुश्किल से कुछ शब्द बोल पाई। निराशा जैसे उसके चेहरे पर लिखी थी। वो रात का खाना खाए बिना ही सो गई। मुझे रात भर नींद नहीं आई। पूरी रात मैं मुस्कान के बारे में ही सोचता रहा। अगली सुबह मैं जल्द से जल्द उससे मिलना चाहता था, पर वह फोन पर जवाब नहीं दे रही थी। उसका पिता भी फोन करके बताता है कि बिटिया फोन नहीं उठा रही। नर्स को बुलाकर पूछता हूं तो पता चलता है मुस्कान बेड से लापता है। मेरा दिल डूबने लगता है। NSCI पहुंचकर लगभग दौड़ते हुए मरीजों के प्रतीक्षा क्षेत्र में पहुंचता हूं, तो ताज्जुब से देखता हूं मुस्कान वहां पांच बूढ़ी औरतों-जो खुद भी टाटा से ही आई कैंसर मरीज हैं-के साथ बैठी हुई है। ये औरतें ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं। मुस्कान सुबह से ही उनकी पर्सनल असिस्टेंट बनी हुई थी। इस दौरान उसने रिश्तेदारों से इन मरीजों की बातें कराने, दवाएं लेने की तरीके, नर्सों को उनकी परेशानियां समझाने जैसे कितने ही काम कर दिए थे और लगातार उनका हौसला बढ़ाने में लगी हुई थी। मुझे जैसे अपनी आंखों पर ही विश्वास नहीं होता। और मुस्कान! उसे तो जैसे मुझसे बातें करने की फुरसत ही नहीं थी। मेरे आंखों में एक बार फिर आंसू थे, पर इस बार खुशी के। मेरी यह दत्तक बिटिया जैसे एक ही रात में भी सयानी हो गई थी!

दोपहर तक मुझे मुस्कान के कई फोन कॉल आये , जिनमें कोई भी उसके खुद के बारे में नहीं थे। वह सिर्फ और सिर्फ दूसरे मरीजों की मदद के बारे में बातें कर रही थी । जब देखो किसी मरीज का हाथ पकड़कर नर्स को टेस्टिंग के लिए उसका ब्लड निकालने में मदद कर रही थी, फीडिंग पाइप के सहारे किसी को खाना खिला रही थी और छोटे बच्चों के के लिए बेबी सिटर बनी हुई थी। मैने सुना, ऑक्सिजन सिलेंडर लगाए एक गंभीर मरीज का हाथ पकड़े बीती रात उसने भगवान से उनकी जिंदगी के लिए प्रार्थना करते गुजारे। व्हील चेयर पर एक बहुत बूढ़ी महिला को घुमाने में मदद के लिए एक नर्स से झिड़की भी खाई। NSCI के स्टॉफ और मरीजों में वह इतने ही समय में बहुत पॉप्युलर हो गई है।

दो दिन मुस्कान मुझे रोजाना चार बार फोन करती रही। फिर इन कॉल्स की संख्या घटकर दिन में एक बार रह गई। हर कॉल में वह मुझे पूरा दिन कैसे गुजरा उसके बारे में डिटेल से बताती थी। मैं चोरी-छिपे उसके लिए बिस्कुट, फल और केक भिजवाया करता। वह साथ दो ही जोड़ी कपड़े लेकर आई थी, इसलिए मेरी पत्नी ने उसके लिए मुझे नए कपड़े दिए। केमोथिरैपी से उसके बाल चले गए थे, सो मुझे लगता था इसे लेकर वह बहुत शर्मीली होगी। पर नहीं। मैने सिर पर लगाने को उसे टोपी दी, जो उसने कभी नहीं पहिनी। 10 दिनों के इस ठहराव में मेरा उससे भावुक नाता हो गया था। इस दौरान मैं कभी वह वादा नहीं भूला, जो मैने उसके पिता से किया था। पिता से अलगाव के इन दिनों आखिर, मैं ही तो उसका पिता था!

10 दिनों बाद मुस्कान का जब फिर से टेस्ट हुआ तो उसका वॉयरल इन्फेक्शन बना हुआ था। लिहाजा, आइसोलेशन सेंटर में उसकी भर्ती सात दिन के ‌लिए और बढ़ा दिया गया था। पल भर की निराशा को छोड़कर उसके चेहरे पर मलाल का कोई चिह्न नहीं आया। मुस्कान अपनी परेशानियां भूल चली थी और उसे अपना नया अवतार भाने लगा था। ऐसी हालत में जब उसकी हालत का कोई दूसरा बच्चा अस्पताल की बेड पर बैठा होता, खुद के पैरों के घाव और दर्द को भूलकर यह बच्ची दूसरे मरीजों का दुःख-दर्द बांटने में लगी थी। मानव व्यवहार कैसी पहेली है। मुस्कान इसकी बेहतरीन मिसाल है। सेंटर पर नर्स और दूसरा स्टॉफ जब पीपीई की सुरक्षा से लैस अपने काम में लगा था दूसरों की मदद में उनकी ही तरह व्यस्त मुस्कान का एकमात्र कवच था चेहरे की उसकी मुस्कान। पीपीई में नर्सिंग केयर मरीजों को रास नहीं आती। मुस्कान ने इस तरह की किसी बाधा से परे सभी को यही केयर दी और सभी की लाडली बन गई।

सात दिन बाद मुस्कान की स्वाब टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई। एकबारगी मुझे समझ में नही आया कि खुश होऊं, या दुःखी। खुशी इस बात कि नन्हीं बच्ची पर मंडराता मौत का खतरा खत्म हो गया है। दुःख इस बात का कि अब वह मुझसे दूर होकर अपने पिता के पास चली जाएगी। नर्स भी ऐसे मददगार को खोकर निराश थीं। मरीज अलग दुःखी थे कि मुस्कान की खिदमत उन्हें अब नहीं मिलेगी। प्रेमिल स्पर्श से बगैर पीपीई ऐसी साज-संभाल करने वाला अटेंडेंट उन्हें कहां मिलेगा। पिता के साथ मुस्कान जब सेंटर से बाहर निकल रही थी, तब उसके पीछे मरीजों के हुजूम में ऐसे कई दुःखी चेहरे मैने देखे। इंफेक्शन के नियंत्रण की नीति है-आइसोलेशन से बाहर निकलने वाले लोगों के पास हमारा जाना मना है। मैं मुस्कान के रास्ते से तीन मीटर दूर खड़ा था-उसे मना करता हुआ कि मेरे पास मत आओ। नम आंखों से उसने इच्छा जाहिर की कि आदर के तौर पर वह मेरा पैर छूना चाहती है। मैं उसे मना नहीं कर पाया। मैं कैसा पिता हुआ जो उसे ऐसा करने से रोकता! वह मेरे पास आई तो मैने उसे अपने पांव छूने से रोक दिया। उल्टे मैने उसके पैर छू लिये। और घबराकर वह पिता के पास हो ली।

मुस्कान ने मुझे जिंदगी की एक बड़ी सीख दी है। तुम अगर खुद दुःखी हो तो अपने इर्द‌-गिर्द खुशियां बांटो। खुद का दुःख भूलने का इससे बड़ा साधन और कुछ नहीं है। संतोष क्या है? अपेक्षाओं और उपलब्धताओं की एक निरंतर जंग है! जीतता वही है, जो अपनी अपेक्षाओं को न्यूनतम कर सकता है। मुस्कान की यह कहानी स्वास्थ्यचर्या में लगे सभी लोगों के लिए संदेश बनकर आई है क‌ि वे अपने कोविड संक्रमण को पीपीई के बगैर काम करने का ईश्वरप्रदत्त अवसर समझें। सफलता क्या है? चुनौती को अवसर में बदलना ही तो! खुशी की राह भी यही है।

मेरी मुस्कान चली गई । साथ में कोरोना का डर भी चला गया।

Brief Introduction-
*Prof. Pankaj Chaturvedi is Deputy Director, Center for Cancer Epidemiology, Tata Memorial Center, Mumbai & Professor in Department of Head & Neck Surgery, Tata Memorial Hospital, Mumbai*

प्रो. पंकज चतुर्वेदी के ब्लॉग से साभार प्रस्तुत

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