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इतना सब कुछ, मगर फिर भी मुस्लिम असुरक्षित

अभी मजलिसे इत्तेहाद मुसलमीन के नेता ओवैसी जूनियर ने हिन्दू जनता और भारत सरकार का मजाक उड़ाया। समाजवादी नेता आजम खान ने भी हमारी सेना पर घृणित टिप्पणी की। इन्होंने पहले भी मंत्री पद से संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखा था कि यहाँ मुस्लिमों पर जुल्म हो रहा है। इन की भाषा, भंगिमा ऐसी रहती है मानो वे भारत से अलग, ऊपर कोई विदेशी हों। जबकि ये भारत की ही दी हुई तमाम सुख-सुविधाओं, शक्तियों का उपभोग करते रहे हैं! सोचें, कौन किस के साथ जुल्म कर रहा है?

गत सौ साल से यहाँ अधिकांश मुस्लिम नेता अलगाव, आक्रामकता और शिकायत की राजनीति करते रहे हैं। यह मुसलमानों में पीड़ित होने का और हिन्दुओं में अपराध/हीन भाव भरती है। फलतः हिन्दू और मुसलमान समुदाय दूर-दूर, संदेहग्रस्त रहे हैं। यह मुस्लिम नेताओं की देन है। पहले भी और आज भी।

आजम खान की गैर-जिम्मेदार बयानबाजियों के बाद भी अखिलेश या मुलायम ने उन्हें न मंत्रिपद से हटाया, न फटकारा। इसी से यहाँ मुस्लिमों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट है! उन के नेता देश-विरोधी, उग्र बयानबाजी, गैर-कानूनी आचरण करके भी राजकीय सुख-सुविधा भोगते रहे हैं। आजम की तरह ही फारुख, मुफ्ती, शहाबुद्दीन, बड़े ओवैसी, आदि अनेक नेताओं ने मंत्री, मुख्य मंत्री, सांसद आदि पदों से बेसिर-पैर बातें की हैं।

इस प्रवृत्ति में ताकत का घमंड है, किसी ‘अल्पसंख्यक’ की दुर्बलता नहीं। मुस्लिम नेता खुद को अल्पसंख्यक, पीड़ित, आदि कहते भी नहीं थे। वे खुद को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, इसलिए बहुसंख्यक, ताकतवर मानते रहे हैं और आज भी मानते हैं। उन की सारी राजनीति ताकत के अहसास पर केंद्रित है। सिद्धांत व्यवहार, दोनों में वे मुस्लिमों को लड़ाकू, शासक परंपरा का मानते हैं जिन के सामने हिन्दू कुछ नहीं। गत सौ सालों में मौलाना अकबर शाह खान से लेकर आजम खान तक इस सोच में कुछ नहीं बदला। यह केवल नेताओं तक सीमित नहीं है। एक्टर सैफ अली खान का अपने बेटे का नाम तैमूर रखना भी वही चीज है।

यह तो नेहरूवाद और मार्क्सवादियों ने अपनी ओर से दुष्प्रचार शुरू किया कि भारत में मुस्लिम बेचारे हैं, अल्पसंख्यक हैं, उन्हें हिन्दू संप्रदायवाद सताता है, आदि। इसलिए उन्हें विशेष सुविधा, अधिकार, आदि होने चाहिए। समय के साथ इस बिलुकल झूठी दलील का मुस्लिम नेताओं ने भी एक और मुफीद हथियार सा इस्तेमाल शुरू कर दिया। इस का उपयोग अज्ञानी हिन्दुओं को बरगलाने में होता रहा है। वे इस्लाम से उत्पीड़ित होकर भी अपराध-भाव में रहते हैं। पूरे भारत में हिन्दू परिवारों में जन्मे ऐसे हजारों सेक्यूलर, प्रगतिशील, बुद्धिजीवी, कलाकार, पत्रकार, आदि मिल जाएंगे, जो जिहादी आतंकवाद की जीती मक्खी निगल कर ‘हिन्दू फासिज्म’ पर घंटों आक्रोश दिखा सकते हैं।

उन्हीं वामपंथियों, कांग्रेसियों से सीख कर यहाँ मुस्लिम नेता देश-विदेश में शिकायतें करते रहते हैं। नोट करें, वही नेता दूसरी साँस में देश के प्रधानमंत्री, न्यायालय, पुलिस समेत सब को धमकियाँ भी देते रहते हैं। शिकायत को उन्होंने केवल हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है।

इस राजनीति को डॉ. अंबेदकर ने एक नाम भी दिया था – ग्रवेमन राजनीति। इस का अर्थ अंबेदकर के ही शब्दों में, ‘ग्रवेमन पॉलिटिक का तात्पर्य है कि मुख्य रणनीति यह हो कि शिकायतें करके सत्ता हथियाई जाए।’ यानी यहाँ मुस्लिम राजनीति सही-गलत शिकायतें कर-करके दबाव बनाती है। यह निर्बल की आशंका का ढोंग करती है, जबकि वस्तुतः एक ताकतवर की संगठित रणनीति है। अंबेदकर ने इसे भारतीय रूपक से भी समझाया था, कि ‘मुसलमानों का माँगें हनुमानजी की पूँछ की तरह बढ़ती जाती हैं।’ यह सब डॉ. अंबेदकर ने सन् 1941 में ही लिखा था। वे कोई हिन्दू संप्रदायिक नहीं, बल्कि हिन्दू आलोचक ही थे।

इतने लंबे अनुभव के बाद भी यहाँ वही मुस्लिम राजनीति चल रही है! इस का कारण कांग्रेस और कम्युनिस्टों द्वारा जमाई गई और दूसरे दलों द्वारा भी यथावत् चलाई गई झूठी शिक्षा है। इतिहास, साहित्य, राजनीति, आदि विषयो में राजनीतिक प्रचार भर कर हिन्दुओं और मुसलमानों को भ्रमित किया गया। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने भी उस शिक्षा को नहीं बदला, बल्कि उन्होंने इस पर सिर ही नहीं खपाया (उन की सारी बुद्धि केवल चुनाव जीतने, पर-निंदा और आत्म-प्रशंसा में खर्च होती है)। इसीलिए मुस्लिम नेताओं की ग्रवेमन राजनीति बरायनाम चलती रही है।

मगर क्या इस से किसी का भला हुआ या होगा? विवेकशील मुसलमानों को सोचना चहिए। ठीक है कि मुस्लिम लीग और जिन्ना की अलगाववादी, अहंकारी, ‘डायरेक्ट एक्शन’ वाली राजनीति सफल रही। इसलिए भी स्वतंत्र भारत में भी मुस्लिम नेताओं ने फिर वही शुरू किया। कई दलों ने भी स्वार्थ-अज्ञानवश उसे छूट दी। लेकिन अब हिन्दू उतने सोए हुए नहीं हैं। वे देख रहे हैं कि मुस्लिम नेता यहाँ सेक्यूलरिज्म का दुरूपयोग केवल इस्लामी वर्चस्व के लिए करते हैं। इस तरह हिन्दुओं को दोहरा अपमानित करते हैं। तब शिकायत किसे होनी चाहिए?

जैसे अभी मोदी-भाजपा को मुसलमानों का शत्रु बताया जाता है, वैसे ही पहले गाँधीजी-कांग्रेस को बताया गया था। जैसे अभी काफी मुस्लिम ऐसे दुष्प्रचार पर विश्वास कर लेते हैं, वही पहले भी हुआ था। पर जैसे वह विशेषाधिकारी, अलगाववादी इस्लामी राजनीति का हथकंडा था, आज भी वही है।

पर वह हथकंडा फिर सफल नहीं होगा। इसलिए मुसलमानों को मिल-जुल कर, सच्ची बराबरी से रहने के रास्ते पर आना चाहिए। तैमूरी-मुगलिया घमंड, इस्लामी विशेषाधिकार, ताकत और अलगाव की भाषा छोड़नी चाहिए। अब तक उस से यहाँ या दुनिया में भी क्या मिला, यह भी देखना चाहिए। जिन्ना की राजनीति ने पाकिस्तान बने मुसलमानों को भी क्या दिया? यह बेबाकी से कहने वाला नेतृत्व उभरना चाहिए।

एक बार दिल्ली के मौलाना बुखारी ने कहा भी था कि ‘भारत में सेक्यूलरिज्म इसलिए है, क्योंकि यहाँ हिन्दू बहुमत में हैं।’ इस बयान में कई और अर्थ छिपे हैं। जैसे, मुस्लिम प्रतिशत बढ़ते ही सेक्यूलरिज्म का नाश होगा।

जैसा कश्मीर से लेकर उत्तर प्रदेश, आंध्र, केरल, मुंबई तक अनेक मुस्लिम नेता दिखाते रहते हैं, उन्हें वही कल्पना चला रही है। मुस्लिम नेता संसद में कह चुके हैं कि उन्हें भारतीय अखंडता की परवाह नहीं। यह सब भारत के हिन्दुओं को दोहरा-तिहरा जलील करना है। क्या विवेकशील मुसलमानों को सोचना नहीं चाहिए कि इस से किसे, क्या मिलेगा?

आज दुनिया वही नहीं है, जो सत्तर साल पहले थी। इस्लामी राजनीति के बारे में अब दुनिया भर के गैर-मुस्लिम काफी जानते हैं। इस राजनीति को खुली छूट देने का नतीजा भी अब सब को अधिक स्पष्ट है। सेक्यूलर, वामपंथी दुष्प्रचार की कलई खुल चुकी है। चाहे वामपंथी यहाँ और अमेरिका, यूरोप में भी कितनी भी लफ्फाजी करते रहें।

अब यहाँ पुनः विभाजन करने, कश्मीर, असम या केरल को अलग कराने, और तीसरा, चौथा मुस्लिम देश बनाने की कल्पना वाली राजनीति का कोई भविष्य नहीं है। सारी दुनिया इस्लामी उग्रवाद से परेशान है। सो इस्लाम केंद्रित राजनीति से अब कहीं कोई राह मिलने वाली नहीं है। मुसलमानों के लिए पूरी मानवता का सहज, समान अंग बनना ही उपाय है। इसलिए उन्हें अब नए रहनुमा खोजने चाहिए।

साभार- http://www.nayaindia.com/ से

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