कांग्रेस में नई जान फूंकने की कोशिश में सोनिया

सोनिया गांधी कोई खतरा मोल नही लेना चाहती। उन्होंने मजबूत नेता की शैली में पार्टी को नई शक्ल देना शुरू कर दिया है। वे बीमार हैं, लेकिन उन्हें पता है कि कांग्रेस चलाना उनकी जिम्मेदारी भी है और मजबूरी भी। क्योंकि उनसे मजबूत नेता पार्टी में कोई और नहीं है और राहुल गांधी के लिए सीढ़ी उन्हें ही बनानी होगी।

कांग्रेस के पास श्रीमती सोनिया गांधी से बड़ा और पार्टी की गरिमा बढ़ानेवाला कोई दूसरा धीर गंभीर नेता नहीं है, और जाहिर है कि वे अपनी इस महिमा को अच्छी तरह समझती भी हैं। इसलिए उन्होंने बीमार होने और विदेश जाने की तैयारी में होने के बावजूद बहुत तेजी से उन सारों के पर कतर दिए हैं, जो पार्टी को आंख दिखाते रहे हैं और जिनकी वजह से पार्टी को विवादों में आना पड़ा है। इसीलिए राजस्थान के दो नेताओं का राजनीतिक कद बड़ा करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती गांधी ने 11 सितंबर की रात को पार्टी के समर्पित नेताओं को हैसियत बख्श दी, तो कई नेताओं को उनकी औकात दिखा दी। किसी को नई जिम्मेदारी सौंपी, तो पुनर्गठन में महत्वपूर्ण पदों पर राहुल गांधी के विश्वस्त नेताओं को अहमियत देकर संदेश भी दे दिया कि अब चलेगी तो उन्हीं की।

कांग्रेस संगठन में ताजा फेरबदल में यह बिल्कुल साफ है कि कांग्रेस की चिट्ठी गैंग के पर कतर दिए गए हैं और बगावत करनेवालों को बाहर ही इंतजार करते रहने के संकेत दिए गए हैं। राजस्थान से कांग्रेस नेता भंवर जितेंद्र सिंह को महासचिव और पूर्व मंत्री रघुवीर सिंह मीणा को कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य के रूप में लिया गया है। लेकिन पार्टी की सरकार गिराने की कोशिश करनेवाले सचिन पायलट सहित चिट्ठी लिखनेवालों में से ज्यादातर को संगठन फिलहाल दूर ही रखा गया है। यह सोनिया गांधी की अपनी शैली है, और वे कोई खतरा मोल नही लेना चाहती।

वैसे भी सोनिया गांधी को ऐसे लोग शुरू से ही पसंद नहीं है, जिनकी व्यक्तिगत निष्ठा पार्टी की परंपरा से ऊपर हो। इसीलिए, सचिन पायलट स्वयं को भले ही राहुल गांधी के नजदीकी प्रचारित करते रहे हैं। लेकिन राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने के प्रयास में असफल रहने के बाद सोनिया गांधी की नजरों में उनके प्रति स्नेह भी कम हो गया। हालांकि सचिन के वापस पार्टी के साथ आ जाने के कारण, माना जा रहा था कि उनको संगठन में कहीं समाहित किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजस्थान से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खासमखास रघुवीर सिंह मीणा को कार्यसमिति में लिया गया है, और दूसरा पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह को महासचिव के रूप में अत्यधिक महत्व मिलने से साफ है कि पायलट को अब फिलहाल कुछ भी नहीं मिलनेवाला। खबर है कि राहुल गांधी वैसे भी पायलट से बेहद नाराज हैं। क्योंकि उन्होंने किस तरह से भाजपा से सांठगांठ करके राजस्थान में कांग्रेस की सरकार को गिराने के लिए कोशिशें की, उसके पुख्ता सबूत भी राहुल गांधी के पास हैं।

दरअसल, सोनिया गांधी वर्तमान में रहने, सोचने, समझने और जीने की राजनीतिक ललित कला सीख गई है।इसीलिए उन्होंने भंवर जितेंद्र सिंह को महासचिव बनाया और रघुवीर सिंह मीणा को केंद्रीय संगठन में फिर से लिया। उनके इस कदम को पायलट के लिए फिलहाल दरवाजा बंद होने के संकेत के रूप में देखा जा रहा हैं। वैसे भी, राहुल ने अपने विश्वस्त रणदीप सुरजेवाला को पायलट पर नकेल कसने के लिए राजस्थान भेजा था और सुरजेवाला ने ही पायलट को प्रदेश अध्यक्ष पद से बर्खास्त करने की घोषणा की थी। रघुवीर सिंह मीणा के बारे में कहा जाता है कि गोविंद सिंह डोटासरा को अध्यक्ष नियुक्त करने की घोषणा के कुछ पल पहले तक मीणा का नाम तय था। लेकिन, जातिगत समीकरण के तहत बदलाव किया गया। तभी से माना जा रहा था कि मीणा आनेवाले दिनों में किसी बड़े पद पर लौटेंगे। मीणा गहलोत के विश्वासपात्र हैं और भंवर जितेंद्र राहुल गांधी के, दोनों ही कांग्रेस के लिए हमेशा से समर्पित रहे हैं। दोनों नेता पायलट की तरह अतिमहत्वाकांक्षी कभी नहीं रहे। सोनिया गांधी का मानना सिर्फ यह है कि पार्टी के हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए।

सोनिया गांधी इन दिनों सभी मुसीबतों का निदान निकालते हुए एक तीर से कई निशाने साध लेती है। इसीलिए, मुख्यमंत्री के रूप में अशोक गहलोत द्वारा बहुमत साबित किए जाने के बावजूद पायलट का राजस्थान में अपनी हरकतों से बाज नहीं आना उन्हें रास नहीं आ रहा था। श्रीमती गांधी की नजर में यह भी है कि पायलट संगठन को अपनी ताकत दिखाने का प्रयास करते रहे हैं। केंद्रीय नेताओं की राय में पायलट को अगर संगठन या सत्ता में कुछ चाहिए, तो वे शांत रहकर अपनी विश्वसनियता साबित करते हुए समर्पित भाव से पार्टी को मजबूत करने में समय लगाते। लेकिन हाल ही में अपने जन्म दिन पर प्रदेश के हर जिले में आयोजन करने की कोशिश करके पायलट ने केंद्रीय संगठन को अपने जो तेवर दिखाए, सोनिया गांधी उससे खुश नहीं है। फिर, उनकी बगावत से कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचा है। पायलट को इसीलिए संगठन में भी कहीं भी समाहित नहीं किया गया है, ऐसा माना जा रहा है।

कांग्रेस भी जानती है कि पार्टी में भले ही पुराने साथियों की कमी खल रही हो, लेकिन किसी की भी उद्धंडता को स्वीकार करके नहीं चला जा सकता। ताजा फेरबदल से साफ है कि पार्टी की कमान अब पूरी तरह से राहुल गांधी के हाथ फिर से आती हुई दिख रही है। क्योंकि कुल नौ महासचिवों में से मुकुल वासनिक को छोड़ बाकी सभी को राहुल गांधी का विश्वासपात्र माना जा सकता है। महासचिव के रूप में सबसे बड़ा प्रमोशन मिला है भंवर जितेंद्र सिंह और रणदीप सुरजेवाला को, जिन्हें राहुल गांधी का सबसे खास सिपहसालार माना जाता है। दोनों के बारे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जो निर्णय लिया है, वह संगठन के लिए ठीक माना जा रहा है। और रही बात पार्टी में राहुल गांधी के लोगों को प्रमुखता देकर एक मां द्वारा बेटे के शिखर की दावेदारी की फिर से तैयारी करने की, तो इस पर किसी को भी ऐतराज भी क्यों होना चाहिए। क्योंकि न केवल आनुवांशिक आरक्षण की तर्ज पर राहुल गांधी को अगला अध्यक्ष बनाने की बात की जानी चाहिए, बल्कि इसलिए भी कि वे उस वंश के वारिस हैं जिसने देश को अब तक चार प्रधानमंत्री दिए हैं और वे पहले भी अध्यक्ष रहे हैं। और इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि अध्यक्ष पद के असली दावेदार भी वे ही हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)