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गांधी सार्द्धशती पर विशेषः डॉ.चन्द्रकुमार जैन से डॉ. दिग्विजय शर्मा की खास बातचीत

सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह के त्रिवेणी संगम रूप साधु अपितु संघर्षशील व्यक्तित्व से पूरी दुनिया को कथनी और करनी के अभेद का सन्देश देने वाले राष्ट्रपिता और विश्व शांति के अग्रदूत महात्मा गांधी की 150 जयन्ती पर गांधी और विनोबा के विशेष अध्येता डॉ. चन्द्रकुमार जैन से डॉ. दिग्विजय शर्मा की यह ख़ास बातचीत हम प्रकाशित कर रहे हैं। सम्प्रति गजानन माधव मुक्तिबोध और डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे साहित्य मनीषियों की कर्मस्थली शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर ( अग्रणी) महाविद्यालय में हिंदी विभाग में प्राध्यापक डॉ. चन्द्रकुमार जैन से आगरा, उत्तरप्रदेश के डॉ. शर्मा ने यह बातचीत विक्रम विश्वविद्यालय,उज्जैन में हुए महात्मा गांधी महामंथन के दौरान की थी। प्रसंगवश हम इसे सुधी पाठकों तक पहुंचा रहे हैं।

डॉ. दिग्विजय शर्मा – सबसे पहले बात स्वदेशी से शुरू की जाए। गांधी और स्वदेशी के सम्बन्ध पर कृपया कुछ बताइए।

डॉ. चन्द्रकुमार जैन – मैं समझता हूँ गांधी और स्वदेशी का संबंध सहज स्थिति का ही नाम है। उन्होंने गांवों को बचाने और देश को आज़ाद करने में स्वदेशी को एक अहम अहिंसक अस्त्र माना। स्वदेशी का अर्थ है – अपने देश का। इस रणनीति के अन्तर्गत ब्रिटेन में बने माल का बहिष्कार करना तथा भारत में बने माल का अधिकाधिक प्रयोग करके भारत के लोगों के लिये रोज़गार सृजन करना बापू का ध्येय था।

डॉ. शर्मा – गांधी जी के लिए स्वदेशी का अर्थ क्या था ?

डॉ. जैन – गाँधी जी की दृष्टि में स्वदेशी, स्वराज की आत्मा थी । स्वदेशी एक तरह की चेतना और सन्देश का नाम भी था। उस पुकार जैसी थी कि उधार की ज़िंदगी जीने की आखिर जरूरत क्यों है, जब अपने घर की सम्पदा कहीं से कम नहीं है।

डॉ. शर्मा – स्त्रियों के अधिकारों पर गांधी जी के दृष्टिकोण पर कुछ विस्तार के साथ प्रकाश डालेंगे ?

डॉ. जैन – अवश्य। भारतीय जीवन शैली, भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गाँधी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वह एक ऐसे समाज के निर्माण का स्वप्न देखते थे जिसमें न्याय, समानता व शांति भारतीय समाज की प्रमुख धरोहर हो। गाँधी जी के अनुसार भारत में न्याय, समानता व शांति तब तक स्थापित नहीं हो सकती जब तक स्त्रियां को भी अपने अधिकार और कर्तव्यों का ज्ञान न हो। महिला अधिकारों के विषय में उनके विचार एवं योगदान इनमें से एक है। बापू ने महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए अनेक प्रयत्न किये। उनका मार्गदर्शन किया। दक्षिण अफ्रीका में अपने आंदोलन के समय से ही बापू ने महिला उत्थान पर ज़ोर दिया था। गांधी जी ने कहा – ” हमारे समाज में कोई सबसे ज्यादा हताश हुआ है तो वे स्त्री ही हैं। और इस वजह से हमारा अधःपतन हुआ है। स्त्री-पुरुष के बीच जो फर्क प्रकृति से पहले है और जिसे खुली आखों से देखा जा सकता है, उसके अलावा मैं किसी किस्म के फर्क को नहीं मानता।”

डॉ. शर्मा – महिला अधिकार पर बापू से जुड़े कुछ रोचक प्रसंग यदि बता सकें तो ख़ुशी होगी।

डॉ. जैन – क्यों नहीं, मुझे भी प्रसन्नता होगी। मसलन, राजकुमारी अमृतकौर को वर्धा से 20 अक्टूबर 1936 को लिखे गए पत्र में गांधीजी ने कहा था – ” यदि आप महिलाएं अपने सम्मान और विशेषाधिकार को समझ भर सकें और मानव जाती के लिए इसका भरपूर उपयोग करें तो आप इसे बेहतर बना सकेंगी। मगर पुरुषों ने आपको दासी बनाने में आनंद लिया है और आप इच्छुक दासियाँ साबित हुई हैं। अंत में दास-दासी मानवता के पतन के अपराध में मिलकर एक हो गए हैं। आप कह सकती हैं, बचपन से ही मेरा विशेष कार्य महिला को उसका सम्मान समझने योग्य बनाना था। कभी मैं भी दास -स्वामी था मगर ‘बा’ एक अनिच्छुक दासी सिद्ध हुईं और इस प्रकार उन्होंने मेरे मकसद के प्रति मेरी आँखें खोल दीं। ”

डॉ. शर्मा – दहेज़ को लेकर गांधी जी क्या सोचते थे ?

डॉ. जैन – भारतीय समाज में आज भी पुत्रियों से ज्यादा पुत्रों को महत्व दिया जाता है। गाँधी ने इस विचारधारा की काफी आलोचना की है। उनके अनुसार एक बेटी को किसी की संपत्ति समझा जाना सही नहीं है। इसी तरह गाँधी जी दहेज – प्रथा के खिलाफ थे। दहेज – प्रथा एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसने भारतीय – महिलाओं के जीवन के पददलित बना दिया। गाँधी इसे ‘खरीद – बिक्री’ का कारोबार मानते हैं । स्पष्ट है कि गांधी महिलाओं को स्व-विकास का पूरा अधिकार देना चाहते थे। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि महिलाओं को अपना भाग्य संवारने का उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों को। वे महिला-पुरुष समान- के पक्षधर थे।

डॉ. शर्मा – बाल विवाह पर भी तो गांधी जी ने खूब प्रहार किया था ?

डॉ. जैन – आपने सही कहा। बाल – विवाह भारतीय समाज की ऐसी कुप्रथा है जिसने लड़कियों का बचपन छीन लिया। गाँधी का एक आग्रह है कि ‘अगर बेटी बाल – विधवा हो जाए तो दूसरी शादी करा देनी चाहिए। जब कोई स्त्री पुनर्विवाह करना चाहती थी तो उसे जाति से बाहर कर दिया जाता था। किन्तु गाँधी पुनर्विवाह के पक्षधर थे। उन्होंने विभिन्न समुदायों को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘यदि कोई बाल – विधवा पुनर्विवाह की इच्छुक हो तो उसे जातिच्युत या बहिष्कृत नहीं करें।

डॉ. शर्मा – आज के युवा गांधी मार्ग पर चलने तैयार नहीं हैं ? आप क्या सोचते हैं ?

डॉ. जैन – सबसे अहम यह है कि युवाओं को गांधी मार्ग पर चलने के लिए हमें उन्हें वैचारिक रूप से मजबूत करना होगा, ताकि वे अनिश्चितता और अस्थिरता का मुकाबला करते हुए देश-समाज की दशा-दिशा बदल सकें। युवा दो चीजों से जल्दी प्रभावित होते हैं- पहला शौर्य से और दूसरा, बौद्धिक जवाब से, जो आसानी से उनकी बुद्धि में उतरे। दुनियाभर में जो कुछ भी घट रहा है, उसका विश्लेषण करके युवाओं की स्मृति में उस घटना की वास्तविकता को सही-सही तरीके से रखना बहुत जरूरी है, ताकि उनमें किसी प्रकार का द्वंद्व न पनपने पाये। जिस तरह से आधुनिकता से जन्म लेनेवाली बुराइयों के चेहरे को सामने लाया, अपने समाज और परंपराओं की मौलिकता को समझाया, वह सब गांधीजी के दौर में ही संभव हुआ।

डॉ. शर्मा – राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज चिंतन क्या है ?

डॉ. जैन – ग्राम स्वराज चिंतन आज भी हमें उन तमाम चुनौतियों से मुकाबला करने का संबल प्रदान करता है, जो आज भी मुंह बाए खड़ी हैं। हिन्द स्वराज में आधुनिक सभ्यता की समालोचना की गयी है। दुनिया एक ग्राम में बदल गयी मालूम पड़ रही है किन्तु गांधी का ग्राम स्वराज आज भी सपना है। गांधी भारत की ‘स्वदेशी आत्मा’ को जगाना कहते थे।

डॉ. शर्मा – पर्यावरण पर गांधीवादी सोच की कोई खास बात बताना चाहेंगे ?

डॉ. जैन – आज के समय में गांधी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। आज जल, जंगल, जमीन के साथ इंसान भी नफरत के शिकार हो रहे हैं। हिंसा चरम पर है। 1942 से लेकर 1945 तक का समय वैश्विक इतिहास में अहम है। दुनिया के सारे बड़े देश अपने संसाधनों को युद्ध में झोंक रहे थे। दुनिया के अगुआ नेता युद्ध को ही समाधान मान रहे थे। लेकिन उसी समय गांधी अहिंसा की अवधारणा के साथ पूरे जैव जगत के लिए करुणा की बात करते हैं। गहरायी से समझना होगा कि हिंसा सिर्फ शारीरिक नहीं होती है। यह विचारधारा के स्तर पर भी होती है।

आज परोक्ष युद्ध नहीं हो रहे हैं, लेकिन जिस तरह से पर्यावरण के साथ हिंसा हो रही है उसके शिकार नागरिक ही हो रहे हैं। आज के संदर्भ में देखें तो आपको गांधी एक पर्यावरण योद्धा भी नजर आएंगे। गांधीवाद हमें सिर्फ मानव हत्या नहीं पूरे जीव हत्या के खिलाफ खड़ा करता है।अहिंसक तरीके से खड़े होना, खुद भूखे रहकर दूसरों के कष्ट का अहसास करना, इस कष्ट के प्रति दूसरों में करुणा का भाव लाने की प्रेरणा यही तो गांधी का भाव है। अगर हम भूदान आंदोलन को देखें या खादी को आम लोगों से जोड़कर को देखें तो इन गांधीवादी मुहिमों को आप पर्यावरण के करीब ही देंखेंगे।

डॉ. शर्मा – अहिंसा और गांधी की प्रासंगिकता पर आप क्या सोचते हैं ?

डॉ. जैन – दोनों में चोली-दामन का सम्बन्ध है। जहाँ अहिंसा है, करुणा है, सहनशीलता और उदारता है, क्षमा और मैत्री भाव है, वहां गांधी हैं। गाँधी की अहिंसा अंतरराष्ट्रीय मानवीयता पर बल देती है। उसमें विश्व को एक करने की ताकत है। गांधी हिंसा की सीमा और अहिंसा की असीमता को भलीभांति आत्मसात कर चुके थे। उनकी दृष्टि में अहिंसा में प्रेम, दया और करुणा और सबकुछ समाहित है जो इंसान होने की शर्त है। भारतीय दर्शन में अहिंसा का विचार पूर्व से विद्यमान था, जिसे गाँधी ने व्यवहारिक धरातल पर उतारा। महावीर और बुद्ध के दर्शन को लोकव्यापी बनाने में गाँधी ने जो भूमिका निभायी वह अतुल्य है।

डॉ. शर्मा – बापू, आपकी नज़र में क्या हैं ?

डॉ. जैन – इसका ज़वाब देने से पहले स्पष्ट कर दूँ कि मैं उनकी चरणधूलि से अधिक कुछ भी नहीं किन्तु मेरी नज़र में गांधी की तरह सिर्फ गांधी ही हो सकते हैं। वे बेमिसाल थे, बेमिसाल हैं और बेमिसाल रहेंगे।

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