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चुनाव और श्राध्दः एक अध्यात्मिक चिंतन

हमारे देश में दो चीजों का बड़ा महत्व है चुनाव और श्राध्द का। चुनाव तो गाहे बगाहे साल में एक बार या कई बार दो दो बार भी आ जाते हैं लेकिन श्राध्द तो साल में एक बार ही आते हैं। लेकिन दोनों में गजब की समानता है। श्राध्द में गृह्स्थ ब्राह्मणों और कौओं को भोजन कराने के लिए परेशान होता रहता है। कभी ब्राह्मण नहीं मिलते तो कभी कौए नहीं मिलते। चुनाव में पार्टियों के बड़े बड़े नेता कार्यकर्ताओं को भोजन से लेकर तमाम साधन सुविधाएँ देने के लिए भटकते रहते हैं लेकिन कार्यकर्ता हाथ में ही नहीं आते।

एक जमाना था जब श्राध्द के दिनों में कोई भी गृहस्थ अपनी छत पर जाकर काव काव करता था और खीर और पूड़ी डालता था तो कौए झपट्टा मारकर खीर और पूड़ी ले उड़ते थे। लेकिन अब तो ये हालत है कि छत तो दूर गली मोहल्ला और झाड़ झंखाड़ सब दूर सिर मारो तो भी कौए महाराज के दर्शन नहीं होते। लोग हाथ में खीर पूड़ी लिए डगर डगर भटकते रहते हैं मगर कौए महाराज के दर्शन ही दुर्लभ हो जाते हैं। यही हाल नेताओँ और पार्टियों का हो गया है। पहले चुनाव आते ही नेताओं के समर्पित कार्यकर्ता और आम लोग तक नेताओं के साथ चुनाव का काम करने के लिए जी जान से भिड़ जाते थे। अब हालत ये है कि कौए की तरह कार्यकर्ता भी गायब हो गए हैं।

नेता कार्यकर्ताओं के लिए तमाम तरह के जतन करने लगे हैं। चुनावों में कार्यकर्ताओं का रुतबा वही हो गया है जो शादी में दुल्हे राजा का होता है। कार्यकर्ता को घर से लाने-ले जाने और चुनाव क्षेत्र में घूमने के लिए गाड़ी के साथ ही दिन भर खाने पीने की व्यवस्था के साथ ही ऊपर का पैसा भी दिया जाता है ताकि वो मतदाता रुपी कौओं को खीर पूड़ी दिखाकर नेताजी और पार्टी की नैया पार लगा सके।

चुनाव के मौसम में सुबह उठते ही कार्यकर्ता अपने घर के आंगन में ऐसे बैठ जाता है जैसे पशु मेले में नीलाम के लिए लाए गए पशुओं का मालिक अपने पशुओं को बिठाता है। कार्यकर्ता के पास अलग अलग पार्टियों के नेता, उनके चमचे और चमचों के चमचे आकर उसका मोल-भाव तय करते हैं और कार्यकर्ता भी अपनी उचित बोली लगने पर एक दिन के लिए उस नेता और पार्टी के लिए काम करने को राज़ी हो जाता है। दूसरे दिन वह किसी और पार्टी का कार्यकर्ता बनकर उसके साथ चला जाता है। जबकि पहले के चुनावों में कार्यकर्ता पूरे चुनाव तो क्या पूरी जिंदगी एक ही नेता और पार्टी के प्रति समर्पित होकर बगैर पैसे के काम करता था।

इस संबंध में चर्चा करने पर एक घाघ कार्यकर्ता ने बताया कि आजकल तो हमारे नेताओं का भी भरोसा नहीं कि वो कब किस पार्टी के साथ हो जाए। कोई नेता पाँच साल तक जिस पार्टी को गाली देता रहता है वही चुनाव आने पर उसी पार्टी का उम्मीदवार हो जाता है। ऐसे में जो कार्यकर्ता उसके साथ रहकर एक पार्टी के प्रति निष्ठावान हो जाता है उसे अपने मोहल्ले में और गली में लोगों के सामने मुँह छुपाना पड़ता है। लेकिन अब जब हम पैसे लेकर किसी नेता या पार्टी के लिए काम करते हैं तो हम डंके की चोट पर कहते हैं कि हम तो कांट्रेक्ट पर काम कर रहे हैं जो ज्यादा पैसे देते हे उसके साथ काम करते हैं। इसका फायदा भी होता है –एक तो मार्केट में हमारी माँग बनी रहती है और दूसरे सुबह आप किसी और पार्टी की रैली में जाकर शाम को दूसरी पार्टी की रैली में उसका झंडा उठाकर घूम सकते हो। इसमें दोनों ही पार्टियों को बुरा नहीं लगता, क्यों कि उनको तो भीड़ से मतलब है और भीड़ में भी सब पैसे से ही आते हैं। चुनाव की वजह से कई कार्यकर्ता अपने साल भर के राशन पानी तक का इंतजाम कर लेते हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर नेता सात पीढ़ियों का इंतजाम कर लेते हैं तो हम भी एक साल की व्यवस्था तो करें।

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