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श्रीलंका और बाइडेन की भावी विदेश नीति

श्रीलंका जैसे देशों में चीन को एक आक्रामक शक्ति के तौर पर देखा जाता है और यह तथ्य अमेरिका और उसके मित्र देशों के लिए चिंता का विषय है.

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने श्रीलंका की जनता को तानाशाही की बजाए लोकतंत्र का रास्ता अपनाने का संदेश दिया था. बहरहाल अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए हाल ही में हुए चुनावों के बाद जो माहौल है उसके मद्देनज़र पॉम्पियो की इस अपील का कोई खास मतलब नहीं जान पड़ता. पॉम्पियो की कही गई बात को उनके ही हारे हुए नेता ने झुठला दिया है. चुनावों के बाद से ही लगातार ट्रंप अमेरिका के लोकतांत्रिक मूल्यों और तौर-तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं. साथ ही सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण और पेंटागन पर अपना अधिकार छोड़ने से भी इनकार कर रहे हैं. ऐसा जान पड़ता है कि राष्ट्रपति बाइडेन को पद संभालते ही सबसे पहले व्हाइट हाउस की गरिमा और अखंडता बहाल करनी होगी.

बाइडेन के सामने दो प्रमुख चुनौतियां होंगी- पहला ध्रुवीकरण के शिकार समाज में शांति स्थापित करना और दूसरा अमेरिका को दोबारा विश्व बिरादरी के नेता के रूप में स्थापित करना.

पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका मानो रास्ता भटक गया है और उसके ही नेताओं के सहयोग से बनाए गए बहुपक्षीय संगठनों से अलग होता या कटता चला गया है. इस दौरान घरेलू राजनीति में घातक नस्लवाद, विदेशियों से घृणा और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दे हावी रहे और इन सबने समाज में तेज़ी से ध्रुवीकरण का माहौल बनाया. अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति के समक्ष एक ही भूगोल में निवास करने और परस्पर विरोधी मानसिकता वाले लोगों के दिलों में आए दरार को पाटने का बड़ा कठिन दायित्व है. बाइडेन के शुरुआती संदेशों में घावों पर मरहम लगाने, दिलों को बांटने की बजाए जोड़ने और अपने विरोधियों को दुश्मन समझना बंद करने की बातें थीं.

बाइडेन भली-भांति ये समझतें हैं कि अभी भी लाखों लोग ऐसे हैं जो ट्रंप की बातों पर यकीन रखते हैं और आने वाले सालों में ट्रंप के रिटायरमेंट लेने की भी लगभग कोई संभावना नहीं है. बाइडेन 78 वर्ष की आयु में सत्ता संभाल रहे हैं और अगर ट्रंप 2024 का चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बनते हैं तो वो भी तब 78 के होंगे. बाइडेन के सामने दो प्रमुख चुनौतियां होंगी- पहला ध्रुवीकरण के शिकार समाज में शांति स्थापित करना और दूसरा अमेरिका को दोबारा विश्व बिरादरी के नेता के रूप में स्थापित करना. हालांकि, घरेलू मोर्चे पर एक सकारात्मक पक्ष भी सामने आया है. अमेरिकी राजनीतिक इतिहास में उपराष्ट्रपति कमला हैरिस इस पद पर पहुंचने वाली दक्षिण एशियाई-अमेरिकी मूल की पहली महिला हैं. वो ट्रंप के शासन काल में अमेरिकी समाज में आए खटास को मिटाकर नस्लीय भाईचारा और विविधता में एकता को फिर से कायम कर सकती हैं.

ट्रंप की दोषपूर्ण नीतियों के ख़तरों की ओर इशारा करते हुए अमेरिका के पूर्व रक्षा मंत्री ने विस्तार से बताया है कि ट्रंप की एकतरफ़ा विदेश नीति के मकड़जाल से निकलने का तरीका ये है कि साझा फायदे के लिए इसे दोतरफा बनाया जाए. ट्रंप की ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ नीति से अमेरिका के लिए अलगाव और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उदारवादी मूल्यों में गिरावट देखने को मिली. श्रीकांत कोंडापिल्लई ने इसका विश्लेषण करते हुए लिखा है कि ‘ट्रंप के ढांचागत विघटनकारी नीतियों, अमेरिका फर्स्ट, अलगाववादी विदेश और सुरक्षा नीतियों ने चीन को विस्तार का मौका दिया’. चीन ने इसका फायदा उठाते हुए अमेरिका के मित्र देशों के साथ अपने संबंध मज़बूत किए. व्यापार के मोर्चे पर छिड़ी जंग का लाभ उठाते हुए चीन ने ट्रंप की नीतियों के चलते अलग-थलग पड़े देशों के साथ अपने रिश्ते मज़बूत कर डाले. यूरोपीय देशों ने इसे लेकर अपनी चिंताएं भी जताई थीं. ट्रंप की लचर विदेश नीति से क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी संकट खड़ा हो गया. ये कुछ कुछ इतिहास के उन पलों जैसा था जब शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य सिंगापुर जैसे अपने मित्र देशों को जापानी अधिपत्य के समय सुरक्षित रख पाने में नाकाम रहा था.

ट्रंप की दोषपूर्ण नीतियों के ख़तरों की ओर इशारा करते हुए अमेरिका के पूर्व रक्षा मंत्री ने विस्तार से बताया है कि ट्रंप की एकतरफ़ा विदेश नीति के मकड़जाल से निकलने का तरीका ये है कि साझा फायदे के लिए इसे दोतरफा बनाया जाए.

बाइडेन की विदेश नीति और श्रीलंका
साल 2020 की शुरुआत ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के साथ हुई थी, उसके बाद एक ऐसा वायरस सामने आया जिसने न सिर्फ पूरी वैश्विक भू-राजनीति को बदलकर रख दिया बल्कि अमेरिका और चीन के बीच शीत युद्ध को भी जन्म दिया. इसके साथ ही अप्रत्याशित आर्थिक उथल-पुथल का भी माहौल बना. ट्रंप प्रशासन में अमेरिकी विदेश नीति में नाटकीय मोड़ आया. पहले से चली आ रही नीतियों में आमूलचूल बदलाव देखे गए. चाहे वो ईरान के साथ परमाणु समझौते से बाहर निकलने की बात हो, या फिर टीपीपी, यूएनएचआरसी, पेरिस जलवायु समझौता सब में बड़े बदलाव देखे गए.

दक्षिण एशिया में चीनी प्रभाव को देखते हुए अमेरिका की भावी विदेश नीति में इस क्षेत्र का स्वाभाविक रूप से अहम स्थान होगा. अमेरिका के एक प्रतिस्पर्धी के तौर पर ट्रंप प्रशासन के दौरान चीन को एक आक्रामक ताकत के तौर पर देखा गया. दक्षिण एशिया के आठ देशों पर चीन के भू-राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए अमेरिका इस क्षेत्र को चाह कर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. श्रीलंका जैसे देशों में चीन को एक आक्रामक शक्ति के तौर पर देखा जाता है और यह तथ्य अमेरिका और उसके मित्र देशों के लिए चिंता का विषय है. दक्षिण एशिया में ट्रंप प्रशासन की ओर से आखिरी उच्चस्तरीय समझौता भारत के साथ किया गया. दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों के बीच बेहतर द्विपक्षीय सुरक्षा और भूस्थानिक संबंधों के लिए बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौते पर दस्तख़त किए गए. बाइडेन प्रशासन में भारत से अच्छे संबंधों के लिए विदेश नीति और भी मज़बूत होने की पूरी उम्मीद है. तानाशाही सत्ता वाले देशों के साथ दो-दो हाथ करने के मकसद से बाइडेन अपने कार्यकाल के शुरुआती वर्ष में ही ‘प्रजातांत्रिक देशों का सम्मेलन’ बुलाने का मन बना चुके हैं. चीन की क़रीबी माने जाने वाली श्रीलंका की मौजूदा सरकार को नए बाइडेन प्रशासन के साथ भू-राजनीति के परिप्रेक्ष्य में विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा. तीन प्रमुख क्षेत्र ऐसे हैं जिनका श्रीलंका की विदेश नीति पर सीधे तौर पर असर होगा.

पहला, बाइडेन बहुपक्षीय संगठनों के साथ फिर से मज़बूती से संबंध कायम करेंगे और उनमें अमेरिकी भूमिका और क्रियाकलापों को विस्तार देंगे. 2015 में अमेरिका और उस समय की श्रीलंका सरकार द्वारा सह-प्रायोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव को घरेलू दबाव के चलते ठीक से लागू नहीं किया गया और आगे चलकर उसे वापस भी ले लिया गया था. श्रीलंका की सरकार द्वारा सह-प्रायोजित प्रस्ताव से बाहर जाने वाली गोटाभाया राजपक्षे की सरकार को नए अमेरिकी प्रशासन के भारी दबाव का सामना करना पड़ेगा. चुनाव प्रचार के दौरान उपराष्ट्रपति कमला हैरिस कश्मीर में मानवाधिकारों के मुद्दे पर मुखर होकर बोलती रही हैं. चूंकि वो ख़ुद तमिल मूल की हैं लिहाजा इस बात के पूरे आसार हैं कि पद संभालने के बाद वो श्रीलंकाई तमिलों की समस्याओं पर अपना ध्यान टिकाएं. पिछले लोकसभा चुनावों में मोदी की पार्टी तमिलनाडु में एक भी सीट जीत पाने में विफल रही थी. ऐसे में इस बात की संभावनाएं बढ़ जाती हैं कि तमिलनाडु से कमला हैरिस पर तमिलों की आवाज़ उठाने के लिए दबाव बढ़े. हालांकि अतीत में भारत की केंद्र सरकार कोलंबो के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसी कोशिशों को लगातार नाकाम करती रही है. 2009 में श्रीलंकाई युद्ध की समाप्ति के बाद से ही समस्या के स्थाई समाधान के लिए अधिकारों के हस्तांतरण जैसे उपाय अपनाने की कोशिशें कई बार हुईं लेकिन हर बार इस पर ठोस निर्णय लेने से पहले वहां की सरकारें पीछे हट गईं. प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के बीच द्विपक्षीय वार्ताओं के दौरान भारत भले ही अधिकारों के हस्तांतरण की बातें करता रहा लेकिन श्रीलंका ने कभी इस पर अपना मुंह नहीं खोला.

चीन की क़रीबी माने जाने वाली श्रीलंका की मौजूदा सरकार को नए बाइडेन प्रशासन के साथ भू-राजनीति के परिप्रेक्ष्य में विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा.

दूसरा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र और चीन के मामलों में अमेरिकी नीति का श्रीलंका की विदेश नीति पर सीधा असर होगा. कई विद्वानों का आकलन है कि अमेरिका में चीन के प्रति नीति को लेकर सभी राजनीतिक दलों में सर्वसहमति है. बाइडेन चीन के मामलों में ट्रंप की नीतियों को ही आगे बढ़ाएंगे. व्यापार, महामारी, तकनीकी हस्तांतरण, ताइवान, दक्षिण चीन सागर, आर्थिक तकनीकी जासूसी और उत्तर कोरिया जैसे मुद्दों पर पुरानी नीतियां ही चलती रहेंगी. हालांकि कोविड-19 के चलते अमेरिका में चीन के खिलाफ भावनाएं प्रबल हो गई है, लेकिन फिर भी 2021 में बाइडेन प्रशासन के समक्ष चीन के साथ शीत युद्ध 2.0 से परे हटकर एक नई शुरुआत करने का मौका हो सकता है. आक्रामकता को छोड़कर शांतिपूर्ण राजनयिक प्रयासों और आपसी सहयोग की कोशिशें देखने को मिल सकती हैं. अभी हाल ही में संपन्न एससीओ समिट के दौरान बहुपक्षीय सहयोग के महत्व को रेखांकित करते हुए राष्ट्रपति शी ने ठीक ही कहा था “हमें इतिहास को आईने के तौर पर देखना चाहिए. बहुपक्षीय सहयोग के रास्ते पर चलना चाहिए. वैश्विक शासन-विधि को सुधारते हुए आपसी विचार विमर्श का सिद्धांत अपनाना चाहिए. हमें आपसी सहयोग से लाभ उठाते हुए एक ऐसा शासन तंत्र विकसित करना चाहिए जिससे सभी देश साझा विकास से लाभान्वित हो सकें.” ये तमाम बातें भारत-चीन सीमा पर तनाव कम करने और शांतिपूर्ण सहयोग का वातावरण बनाने में भी मददगार साबित हो सकती हैं.

तीसरा, राष्ट्रपति पद का चुनाव हारने के बाद ट्रंप ने 12 नवंबर को चीन के खिलाफ एक कार्यपालक आदेश जारी किया था जो 11 जनवरी 2021 से प्रभावी होगा. ‘अमेरिका की धनसंपदा का इस्तेमाल चीन की फौज, खुफ़िया तंत्र और दूसरे सुरक्षा उपक्रमों के विकास और आधुनिकीकरण के लिए करने’ के चलते 31 चीनी कंपनियों को निशाने पर लिया गया. ट्रंप की रणनीति यह है कि जिस तरह उन्होंने अमेरिका की विस्तृत राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से चीन पर नकेल कसी है बाइडेन पर भी ऐसी ही नीति आगे बढ़ाने का दबाव बना रहे. बहरहाल अमेरिका में वीटो-आधारित शासन पद्धति के चलते कई कार्यपालक आदेश लागू ही नहीं हो पाते. जैसे टिकटॉक पर लगी पाबंदी को वाणिज्य विभाग ने अटकाकर रखा. दूसरे, चीनी कंपनियों पर अमेरिकी पाबंदी का असर श्रीलंका जैसे देशों में चल रहे चीनी परियोजनाओं पर पड़ना तय है. चीन की 24 सरकारी कंपनियां और उनके सहयोगी उपक्रम जैसे चीनी दूरसंचार निर्माण कंपनी (सीसीसीसी) आदि कोलंबो में पोर्ट सिटी के निर्माण और बीआरआई से जुड़ी परियोजनाओं में लगे हैं. इन सब पर ट्रंप प्रशासन का भारी दबाव रहा है. यहां सवाल उठता है कि क्या इन कंपनियों पर बाइडेन प्रशासन के दौरान भी पाबंदियां बरकरार रहेंगी और अगर रहती हैं तो कितनी मात्रा में? इसमें हुआवेई का 5जी नेटवर्क भी शामिल है जिसे पूर्ववर्ती सिरिसेना सरकार के दौरान लॉन्च किया जाना था लेकिन आखिरकार इस परियोजना को मंज़ूरी ही नहीं मिल पाई. वैसे बीजिंग के साथ कोलंबो के क़रीबी रिश्तों के मद्देनज़र और हाल ही में हुआवेई की प्रभावकारी नीतियों और रणनीतिक तौरतरीकों के कारण ऐसा लगता है कि जल्दी ही ये परियोजना मंज़ूर कर ली जाएगी. बहरहाल जिस कठोर तरीके से भारत ने टिकटॉक पर पाबंदी लगाई है और अमेरिका चीनी कंपनियों के बारे में अपनी सुरक्षा चिंताएं जता चुका है ऐसे में चीन की कंपनियों के साथ सहयोग की श्रीलंका की नीति कैसे आगे बढ़ेगी? ये कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिनपर सोच विचार की दरकार है.

इस महीने राष्ट्रपति गोटाभाया अपने कार्यकाल का पहला साल पूरा करने जा रहे हैं, ऐसे में उन्हें चीनी उत्पादों पर अमेरिकी पाबंदियों के मद्देनज़र ऐसी मज़बूत विदेश नीति पर विचार करना चाहिए जो श्रीलंका के हितों को साध सके.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का सेमीनार श्रीलंका के लिए एक अनोखी घटना थी. हाल ही में कोलंबो में सीपीसी और एसएलपीपी (श्रीलंका पोडजुना पेरामुना) राजनीतिक दल का सेमीनार हुआ था. यह सम्मेलन एसएलपीपी राजनीतिक दल के संस्थापक बासिल राजपक्षे द्वारा जुलाई में की गई उस टिप्पणी के बाद हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘विकास को लेकर एसएलपीपी पार्टी का दर्शन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) से मिलता जुलता है.’ इस स्वीकारोक्ति से स्पष्ट है कि श्रीलंका में चीन के विकास मॉडल को पसंद किया जा रहा है. चीन के साथ अपने रिश्तों का लाभ उठाने वाले श्रीलंका को भी बाइडेन के प्रजातांत्रिक सम्मेलन का हिस्सा बनना चाहिए. ऐसा कर श्रीलंका अपने प्रजातांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ा सकेगा और तानाशाही के जो थोड़े बहुत उभार वहां गाहे-बगाहे दिखते हैं उनको भी कुंद कर सकेगा. साथ ही साथ राजपक्षे परिवार के तीसरे भाई का संसद से सामना भी होगा जिससे सत्ता के केंद्रों की एक तिकड़ी तैयार हो सकेगी. इस बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि चीन पर नकेल कसने या चीन के रास्ते में बाधाएं खड़ी करने के लिए श्रीलंका अमेरिका या उसके मित्र देशों के साथ हाथ मिलाए. भारत के संदर्भ में शशि थरूर ने भी ऐसी ही नीति की वकालत की है जो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और नियम आधारित व्यवस्था पर खड़ी हो.

इस महीने राष्ट्रपति गोटाभाया अपने कार्यकाल का पहला साल पूरा करने जा रहे हैं, ऐसे में उन्हें चीनी उत्पादों पर अमेरिकी पाबंदियों के मद्देनज़र ऐसी मज़बूत विदेश नीति पर विचार करना चाहिए जो श्रीलंका के हितों को साध सके. 2021 की शुरुआत राष्ट्रों के लिए परस्पर विरोधी दबावों के बीच होगी. फिर चाहे वो बीआरआई का मामला हो, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बात हो या फिर साइबर प्रणाली हो. दुनिया की दो आर्थिक ताक़तों- अमेरिका और चीन का दबाव सभी राष्ट्रों पर होगा और उन्हें परस्पर विरोधी इन दो शक्तियों के बीच अपने रास्ते तलाशने होंगे. उम्मीद की जानी चाहिए की बाइडेन के राष्ट्रपति कार्यकाल में चीन के साथ तनाव कम होगा और आपसी सहयोग और तालमेल के मूल्यों की तलाश होगी. ये एक ‘दोतरफा रास्ता’ होगा जिससे समूचे दक्षिण एशियाई क्षेत्र को लाभ पहुंचेगा.

साभार- https://www.orfonline.org/ से

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