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जातिवादी जड़ता की दीवारों का खड़ा होना

मध्यप्रदेश में जातिगत भेदभाव का एक और मामला सामने आया है। जबलपुर में एक डाॅक्टर के साथ जो हुआ, वह किसी भी विकासमान कहे जाने वाले समाज के सभ्य एवं सुसंस्कृत होने पर सवालिया निशान लगाता है। यह एक विभीषिका है। इस विभीषिका को कम करने के लिए तरह-तरह के कानून बनाये गये हैं, लेकिन हम पाते हैं कि स्वतंत्र भारत में जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव की समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि गंभीर रूप से घायल मरीजों के परिजनों ने एक डाॅक्टर से इलाज कराने से इसलिए इनकार कर दिया कि वे अनुसूचित जनजाति की पृष्ठभूमि से आते हैं। जबकि एक दुर्घटना की शिकार दो महिलाओं की हालत बेहद गंभीर थी और उन्हें तत्काल चिकित्सा की जरूरत थी। उस वक्त आपात चिकित्सा कक्ष में डाॅक्टर गीतेश रात्रे ड्यूटी पर थे, जो अनुसूचित जनजाति थे। कितनी विडम्बनापूर्ण एवं दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि एक गरीब, अति पिछड़ी जाति में पैदा हुआ इंसान पहली बार पूर्ण बहुमत देश का प्रधानमंत्री बना है और उनके शासन में इस तरह की भेदभाव एवं जातिवाद की दीवारें खड़ी हो रही है।

डाॅक्टर गीतेश रात्रे ने मरीजों का इलाज शुरू किया था। लेकिन इस बीच मरीजों के परिजनों ने सवर्ण डाॅक्टर से ही इलाज कराने की विचित्र मांग रखी। यही नहीं, किसी सभ्य समाज में इसकी कल्पना भी मुश्किल है, लेकिन परिजनों को जब यह पता चला कि घायलों का उपचार कर रहे डाॅक्टर गीतेश रात्रे आदिवासी पृष्ठभूमि से हैं तो उनके साथ लोगों ने मारपीट की और उन्हें जातिबोधक अपशब्द भी कहे। सवाल यह है कि घायलों के रिश्तेदारों के दिमाग में यह बात कहां से आई कि गैर-सवर्ण पृष्ठभूमि से आने वाला कोई व्यक्ति अच्छा डाॅक्टर नहीं हो सकता।
जाति से स्वयं को ऊंचा मानने वाले जरा सोचें तो सही ऐसा कौन-सा मानव है, जिसका सृजन हाड़-मांस या रक्त से न हुआ हो? ऐसी कौन-सी माता है, जिसने बच्चे की सफाई में हरिजनत्व न स्वीकारा हो? मनुष्य अछूत नहीं होता, अछूत दुष्प्रवृत्तियां होती हैं। समझ नहीं आ रहा है कि यह क्या मखौल है? जिस घृणा को मिटाने के लिए धर्म है, उसी के नाम पर घृणा और मनुष्य जाति या विघटन! मंदिर में आप लोग हरिजनों के प्रवेश निषिद्ध कर देंगे पर यदि उन्होंने घर बैठे ही भगवान को अपने मनमंदिर में बिठा लिया तो उसे कौन रोकेगा। अस्पताल में डाॅक्टर भगवान होता है, वह अस्पृश्य कैसे हो सकता है? क्या योग्यता किसी खास जाति या जाति-वर्ग की बपौती है?

जन्म के आधार पर ही किसी को योग्य या अयोग्य मान लिया जाने जैसे जातिगत पूर्वाग्रहों को झुठलाने वाले तथ्य अक्सर सामने आते रहते हैं। यह सभी जानते हैं कि दाखिले के बाद चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई और प्रशिक्षण के हर चरण को पूरा करने और उससे संबंधित परीक्षाएं पास करने के बाद ही किसी व्यक्ति को डाॅक्टर की डिग्री मिलती है, भले वह किसी भी सामाजिक वर्ग का हो। लेकिन आरक्षण जैसी सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित करने की व्यवस्था को ठीक से नहीं समझ पाने की वजह से कुछ लोग इसे योग्यता या क्षमता के साथ समझौते के रूप में देखते हैं और यह दलील देते हैं कि आरक्षित वर्गों की वजह से सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जबकि इस सवाल पर हुए अध्ययनों में भी ये निष्कर्ष सामने आए हैं कि आरक्षण की वजह से सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है और कमियों के लिए इस व्यवस्था को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके बावजूद अगर किसी के भीतर गहरे पैठी जातिगत दुर्भावनाएं गंभीर हालत में पड़े मरीज के इलाज की जरूरत के वक्त भी हावी रहती है तो यह एक बेहद अफसोसजनक तस्वीर है। इस तरह जाति के आधार पर किसी को दीन, हीन और अस्पृश्य मानना, उसको मौलिक अधिकारों से वंचित करना, सामाजिक विषमता एवं वर्गसंघर्ष को बढ़ावा देगा। वक्त आ गया है जब अर्थों को सही शब्द दें ताकि कोई भ्रमित न हो। हम अपने तात्कालिक लाभ के लिए मनुष्य को नहीं बाँटें, सत्य को नहीं ढँके। सत्य की यह मजबूरी है कि जब तक वह जूते पहनता है, झूठ नगर का चक्कर लगा आता है।

जाहिर है, इस स्थिति के लिए वह मानसिकता जिम्मेदार है, जिसमें किसी के बारे में उसकी जाति के आधार पर राय बनायी जाती है। सामाजिक जीवन की गतिविधियों से लेकर कार्यस्थलों तक पर जातिगत भेदभाव की घटनाएं कोई छिपी हुई बात नहीं हैं। कई बार सिर्फ जाति की वजह से कमजोर तबकों को ऊंची कही जाने वाली जातियों के बर्बर व्यवहार का सामना करना पड़ता है। ऐसी घटनाएं आम हैं जिनमें अंतरजातीय प्रेम संबंधों या विवाह की स्थिति में सवर्ण माने जाने वाले लोगों ने प्रेमी जोड़ों की हत्या तक कर डालने में कोई हिचक नहीं महसूस की। जाति के आधार किसी को कमतर या उच्चतर मानने की इस मानसिकता ने अक्सर अमानवीयता के चरम अध्याय रचे हैं। दक्षिणी तमिलनाडु के पलयमकोट्टई के केंद्रीय कारागार की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे जातिगत भेदभाव का बेहद ही क्रूर तरीका अपनाया जाता है। इस जेल में बंद रहे कैदियों से पूछताछ में खुलासा हुआ है कि जेल अधिकारी कैदियों को उनकी जातियों जैसे थेवर, नाडार और दलित के आधार पर बांटते हैं और फिर उन्हें अलग-अलग ब्लॉक्स में रखते हैं। अलग-अलग रखने से इस बात के बेहद कम चांस होते हैं कि वे आपस में मिल सकें। इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि जेल की रखवाली करने वाले निचले स्तर के अधिकारी कैदियों को उनकी जातियों के आधार पर संबोधित करते हैं। ऐसा तब है जब उनके सीनियर अधिकारी इस तरह जातिगत संबोधन के लिए उन्हें कई बार चेतावनी दे चुके हैं। मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर जातिगत दुराग्रहों से लोगों को आजाद करने के मकसद से सामाजिक विकास की पहलकदमी नहीं हुई तो आधुनिकता और विकास के तमाम दावे खोखले साबित होंगे।

”अब पंक्तियां मिटें।“ किसी को पंक्ति में खड़ा न होना पड़े। सभी पंक्तियां मिटें, भेद-भाव की भी, जातिवाद की भी, ऊंच-नीच की भी। भौतिक विकास के साथ-साथ हमारा मन बदले, मस्तिष्क बदले, मनुष्य-मनुष्य बने, मात्र मशीन नहीं बने। वरना विकास बेमानी होगा। मैं अणुव्रत आन्दोलन से जुड़ा रहा हूं, ”अणुव्रत“ मनुष्य को मनुष्य बनाने की मात्र कल्पना ही नहीं, बल्कि कार्यक्रम है, आन्दोलन है। सामाजिक अन्याय मिटे। अतः आवश्यक है कि विकास की दर की तरह ”मनुष्य“ बनाने की दर में भी वृद्धि हो। नैतिक मूल्यों को वास्तविकता के नजदीक ले जाने वाले प्रयत्न हों। बहुत कहा जा चुका है, अब करने का समय है। वरना बहुत देर हो चुकी होगी।

जहां दोष एवं दुश्मन दिखाई देते हैं वहां संघर्ष आसान है। जहां ये अदृश्य हैं, वहां लड़ाई मुश्किल होती है। नीति का प्रदूषण, विचारों का प्रदूषण हटाकर प्रामाणिकता का पर्यावरण लाना होगा। आचार्य श्री तुलसी ने कितने वजन वाली बात कही थी कि ”अगर प्रेरणा देनी है, तो स्वयं प्रेरित हों। किसी को शुद्ध बनाना है, तो स्वयं शुद्ध बनो।“ हम देखें… कहीं हम स्वयं गुड़ खाकर दूसरे को गुड़ न खाने को तो नहीं कह रहे हैं। इंसान को जन्म किस जाति में लेना है, ये उसके बस में नहीं है। इंसान की जाति जन्म से नहीं कर्म से होनी चाहिए। आज समाज में इंसान इंसान का दुश्मन हो गया है। यह सही नही है। इंसान पहले भगवान की बनाई अनुपम कृति है। वह चाहे किसी भी धर्म को मानने वाला हो। उससे प्रेम करो। समाज में फैले इस जहर को भूल कर इंसान इंसान से भाईचारा कायम करे और मिलजुल कर रहें। यह बहुत शर्म की बात है कि, अब इक्कीसवीं शताब्दी में भी जबकि मानव समाज ने वैज्ञानिक तौर पर इतनी तरक्की की है कि लोग मंगल ग्रह पर भी जमीन खरीदने की योजना बना रहे हैं, भारतीय समाज तब भी जाति प्रथा जैसी त्रासद व्यवस्थाओं को ढो रहा है।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
बी-380, प्रथम तल, निर्माण विहार, दिल्ली-110092
9811051133



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