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फिर भी हम विदेशियों की ही गुलामी करते हैं

एगो फिबोनाकी बाबा हुए.. हिंदी में जरा मुश्किल हो रही होगी इस बाबा को पहचानने में, तो इसको जरा अंग्रेजी में लिख देते है.. Fibonacci बाबा! बहुतों के दिमाग में अब आया होगा.. जो-जो साइंस ले के इंटर(मैथ) और उसके बाद की पढ़ाई किये होंगे वे बहुत अच्छे से इन्हें जानते होंगे.. इस बाबा ने एगो मैथेमैटिकल सीरीज दिया जिसे कि Fibonacci series नाम से जाना जाता है। पूरी दुनिया के मैथ्स में यही बाबा जाने जाते हैं, क्योंकि इस चोरकट बाबा ने अपने नाम इस सीरीज को पेटेंट करवा लिया था। अब इस गधे को चोरकट क्यों कहा ? कहा,क्योंकि ये था ही चोर।

भारतीय वैदिक गणित से चोरी कर अपने नाम का टैग लगा दिया। विश्वास न हो रहा तो रोथ्स्चाइल्ड और अंग्रेजों के पीठू विकिपीडिया में ही देख लो,कैसे-कैसे इसके पास ये सीरीज पहुँची।
भारतवर्ष के महानतम गणितज्ञ में से एक पिंगल (Pingala) ने इस सीरीज को छंद के माध्यम से मात्रमेरु में संकलित किया था 450BC में।

वैसे ये सीरीज इससे पहले नहीं तो कम से कम 10,000 साल पहले से ही चली आ रही थी(कैसे चली आ रही थी वो आगे पता चल जायेगा).. श्रीयंत्र का नाम तो सुने होंगे ??.. अगर नहीं सुने होंगे तो गूगल में जा के डॉउनलोड कीजिये(वैसे मेरे पोस्ट से भी कर सकते हैं)..।। ये जो श्रीयंत्र है न सब इसी में समाया हुआ है.. पूरा ब्रह्माण्ड का रहस्य।.. खैर आगे इसके बारे में जानकारी हासिल करते रहियेगा..! तो श्रीयंत्र से पिंगल ने फिबोनाकी सीरीज बनाया।

इनके इस सीरीज को विराहांक(Virahanka) 600AD ने अरब ले के गया जब भारतीय अरबियों को अंकगणित सीखा रहे थे.. भारतीय-अरबी के गणित को Liber-Abbaci में संकलित किया जा रहा था जो कि अरबी में अनुवादित होता। फिर यहीं से अरबी अनुवादित इस सूत्र को फिबोनाकी ने 1202 AD में चुराकर इटली ले गया और वहाँ अपने नाम से पेटेंट करा कर पूरी दुनिया में बाँचना शुरू कर दिया जो कि अब तक चलता आ रहा है। और भारत के बड़े-बड़े मैथ के पीएचडी होल्डर मास्टर और स्टूडेंट्स लोग भी फिबोनाकी को बड़का मैथेमेटिसियन बताते चलते हैं और बुझते भी है।

इस बीच भारत में ही गोपाल(1135 AD) और हेमचंद्र(1150AD) ने इस सीरीज को अपने बुक्स में संग्रहित किया।

खैर, ई रहा इस सीरीज का इतिहास.. अब ई सीरीज कहीं भी गया लेकिन रहा तो सेम ही.. क्योंकि गणित और विज्ञान के सूत्र सार्वभौमिक होते हैं, कहीं कोई चेंजेस नहीं।

तो फिबोनाकी सीरीज कुछ इस तरह रहा
1, 1, 2, 3, 5, 8, 13, 21, 34, 55, 89, 144, 233, 377, 610, 987, 1597, 2584, 4181…
मने प्रत्येक नम्बर पहले दो नम्बर का जोड़ है, i,e
(each number is the sum of the previous two).
इसको सूत्र में कुछ इस तरह लिख सकते
Fn = Fn-1 + Fn-2 .

अब इसी में से एगो बड़ा तगड़ा चीज बाहर निकला जिसे दुनिया गोल्डन सेक्शन (Golden Section/Ratio) के नाम से जानती है
और इस गोल्डन सेक्शन का वैल्यू होता है ..
1.618033989
मने Golden Section = 1.618033989
(The ratio of successive pairs)
अब इसके बारे में और ज्यादा जानना हो तो किसी गणित के मास्टर को पकड़िये और पूरा कन्सेप्ट क्लियर कीजिये।

फिलहाल मुझे इस Golden Section के वैल्यू तक पहुंचना था तो पहुँच गया.. ये मुख्य पोस्ट नहीं है.. मुख्य पोस्ट बहुत लांग हो जाता इसलिए इसे छोटा कर केवल गोल्डन सेक्शन तक ही पहुँचना ही सही लगा।

अब इसके बाद ही मजा है.. मने की जबराट मिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड !! अब बहुत कोई पढ़े भी होंगे लेकिन रहस्योद्घाटन न कीजियेगा। मैं खुद ही बताऊंगा गंगवा इस्टाइल में।
सो कीप इन टच।

एक चीज मैं बारंबार दोहराता रहा हूँ और सभी परिचित भी है कि आप ग्लोब लीजिये और भारत में पेंसिल घुसाइये फिर देखिये कि पेंसिल ग्लोब के दूसरे साइड कहाँ निकलती है ? पेंसिल मेक्सिको, पेरू में निकलेगी।
ये तो खैर ग्लोब के अंदर से हो गई। अगर ग्लोब के बाहर से मार्कर ले के लाइन खीचेंगे तो ??
तो वो स्ट्रेट लाइन बनेगी। फिर कमाल देखिये कि इस स्ट्रेट लाइन में कौन-कौन सी जगहें आती हैं?? लगे तो ग्लोब के चारों ओर घुमा दीजिये,फिर अवलोकन कीजिये।

प्राचीन समय के सबसे रहस्यमयी जगहें कौन-कौन सी है जो अब तक मॉडर्न साइंस के लिए चुनौती बनी हुई है और लगातार नए नए रिसर्च हो रहे हैं??
चलिये कुछ जगह हम यहां मेंशन कर देते हैं..
भारत का मोहनजोदड़ो, मिस्र के पिरामिड,नाज्का (Nazca)पेरू के ड्रॉइंग्स और माचूपिकउ के पिरामिड,ईस्टर आइसलैंड और कम्बोडिया का अंगकोरवाट मन्दिर।
ये मुख्य जगहें हैं ध्यानाकर्षण के लिए।
लेकिन इन सब के बीच में भी कुछ जगहें और जोड़ लेते हैं..
Paratuari, Tassili N’Ajjer,Siwa,Petra,Khajuraho,Pyay,Sukhothai,Preah Vihear
इन सब को आप गूगल में पढ़ सकते हैं।
लेकिन ऊपर जो उल्लेख किया मने मोहनजोदड़ो, गिज्जा,नाज़का, माचूपिकउ,ईस्टर और अंगकोरवाट,
इन सब में कॉमन क्या है ?

तो इन सब में कॉमन ये है कि ये सभी एक ही लाइन में हैं जो पूरे ग्लोब के चारो ओर है। मने कि एक ही Equator में मने कि भूमध्य रेखा में। हाऊ इंटरेस्टिंग न ?!
और ऊपर जो अन्य नाम लिखे हैं न वो भी इसी इक्वेटर में आते हैं। वेरी इंटरेस्टिंग।
अब इन जगहों में और क्या खास बात है वो आगे बताते हैं।
कल आपने Fibonacci series का गोल्डन रेशियो का मान जाने थे जो कि 1.618 होता है। अब इन सब का इन सभी जगहों से क्या लेना देना ??

तो देखिये क्या लेना देना होता है सो..
अब इन सब के बीच एक जगह बतलाना भूल गया.. जैसे-जैसे आइस मेल्ट हो रही है वैसे वैसे कई रहस्य बाहर आ रहे हैं.. और इसी रहस्य में से और एक नाम जुड़ गया अलास्का के पिरामिड! ये जगह North Pole मने उत्तरी ध्रुव के पास का इलाका(साउथ ईस्ट)।
अब अभी सब कम्प्लीट हुए..

चलिये अब ज्योमेट्री और मैथेमेटिक्स खेलते हैं।

अलास्का को सेंटर मानकर एक सर्कल बनाते हैं। डिवाइडर का एक पॉइंट अलास्का पे रखिये और पेंसिल वाला पॉइंट ऊपर दिए किसी भी जगह रखिये, सपोज गिज्जा पे रख दिये.. और अब डिवाइडर को घुमाइए.. देखिये पेंसिल सर्कल बनाते हुए कौन-कौन सी जगहों को कट करते हुए पास हो रही है!?
अब इसी सर्कल में सभी जगह आ जाएंगे। भेरी एक्साइटिंग न !!
अंगकोर वाट मन्दिर और नाज़का एक दूसरे के जस्ट अपोज़िट साइड मने कि परफेक्टली इन 180°. इसी तरह मोहनजोदड़ो और ईस्टर आइलैंड एक दूसरे के 180°.
अब एक पॉइंट पकड़िये अंगकोरवाट को फिर आप क्लॉकवाइज घूमिये.. अंगकोरवाट से गिज्जा की दूरी 4,754 मील। ओके। अब इस वैल्यू को गोल्डन नम्बर 1.618 से मल्टीप्लाय कीजिये .. द रिजल्ट इज 7,692 ! दैट इज द एग्जेक्ट डिस्टेंस बिटवीन गिज्जा एंड नाज़का.. मने कि गिज्जा और नाज़का/माचूपिकउ के बीच की दूरी 7,692 मील।
अब इस 7,692 मील को फिर से गोल्डन रेशियो 1.618 से मल्टीप्लाय कीजिये! द रिजल्ट इज 12,446 मील! और ये दूरी एग्जेक्टली बनती है नाज़का और अंगकोरवाट के बीच। और अब आपका सर्किल खत्म मने आप जहां से(अंगकोर) चले थे वहाँ वापिस पहुँच गए।

फिबोनाकी सीरीज क्या कहता है कि each number is the sum of the previous two .. तो यहाँ क्या हुआ कि जो रिजल्ट याने 12,446 आया वो प्रीवियस दो नम्बर का योग होना चाहिए, यही न ?
अब इसके प्रीवियस दो नम्बर जोड़िए .. मने 4,754 और 7,692 को.. याने
4,754+7,692 = 12,446
और 7,682×1.618 = 12,446
अमेजिंग!! हाऊ इट इज पॉसिबल??
ये सरवा न्यूटन का बप्पा बतायेगा क्या ? साले चोरकट लोग!

अब और एक काम कीजिये..
अलास्का को Apex मानिए और लाइन्स खींचिए.. अलास्का से गिज्जा एक लाइन और दूसरा लाइन अलास्का से नाज़का ! अब इसको मिलाइए.. एक त्रिभुज बनेगा.. अब इस त्रिभुज का एंगल निकालिए.. एंगल बनेगा 51 degrees 49 minutes 38.25 seconds!और ये सेम टू सेम एंगल बनता है गिज्जा के पिरामिड का।। और ये सेम टू सेम एंगल बनता है श्रीयंत्र में भी।। और जब श्रीयंत्र भारत में बना तो पिरामिड फिर कौन बना के दिया?? और पृथ्वी के लोकेशन पे एग्जेक्ट श्रीयंत्र के रेशियो पे दूरी कौन सेट किया ??

क्या पृथ्वी पे पैदल चल चल के और एग्जेक्ट दूरी और इक्वेटर पे ऐसे मोनुमेंट बना पाना सम्भव है ??
कल को आये जोल्हा और हलेलुइया बताते कि पृथ्वी तो चपटी है! तो स्योर इन ढक्कनों ने तो बनाये ही नहीं है। और जब हम विमानों की बात रामायण काल से करते आये है तो ये कोई मजाक नहीं है। विमानशास्त्र में मरक्यूरी का ईंधन के रूप में प्रयोग होना भी कोई मजाक नहीं है। और पिरामिडों में मरक्यूरी का मिलना भी कोई संयोग नहीं है। बिना हवा में उड़े मने एक ऊंचाई पे पहुँचे बिना ऐसा प्लान हो ही नहीं सकता है। नाज़का के रेगिस्तान के ड्राइंग जब देखेंगे तो बिना ऊंचाई में पहुँचे आपको एग्जेक्ट चित्र नहीं दिखाई देंगे. जमीन पे लगेगा कि जैसे आड़ी तिरछी लाइन खीच दी गई है। नाज़का के जितने भी फोटोग्राफ्स निकाले गए हैं वो सब हवाई जहाज से ही निकाले गए हैं। आज जब हम ऊँचाई से देखते हैं तब पता चलता है तो तब क्या बिना ऊंचाई में पहुँचे हुए ही प्लान हो गया होगा ? कतई नहीं।

और जब विमान की बात है हमारे यहां तो ये कोरी बकवास भी नहीं है। पिरामिडों में बने विभिन्न प्रकार के हवाई जहाज के उकेरे गए चित्र भी इस चीज को पुख्ता प्रमाणित करते हैं।

गिज्जा के पिरामिड कौन बनाया.? वैष्णव संत ने। ललाट, बांह में U शेप्ड टीका। और कहां के लोग लगाते हैं ऐसा तिलक,टीका भाई ?

मय दानव जो माया आर्किटेक्चर का खिलाड़ी था वो भारत से पेरू,मेक्सिको गया और माया सभ्यता की नींव रखी। वो उसी इक्वेटर लाइन से आना जाना करता था। विभिन्न प्रकार के विमान बनाये थे इन्होंने।

अब जब टेक्नोलॉजी विकसित हो रही है और आकाश में उड़ के पृथ्वी को एक ऑब्जेक्ट की तरह लेकर स्टडी किये जा रहे हैं तो ये सब तब बिना आकाश में उड़े हुए ही हो गया होगा क्या ? और प्राचीन विमान की बात भारत को छोड़कर कहीं होता ही नहीं है और न कहीं जिक्र होता हैं। भला हो मिट्टी की परतें हट रही है और भारतीय शास्त्रों को कोरा और बकवास बताने वालों के मुंह में तमाचा पड़ रहा है।

भागोगे कहाँ, आना तो तुम्हें इधर ही पड़ेगा।
(ये गोरे गोरे लड़के लड़कियां होती हैं न जो यहाँ आ के अब भी हमारे साधुओं के शरण में रह के कुछ सनातन सीखने का ढोंग करते हैं न यही साले मलेक्ष हैं, पहले चोरी करते हैं फिर सीना जोरी भी करते हैं।)



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