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उच्च शिक्षा में अब बेहतर विद्यार्थियों के पास हैं विकल्प – डॉ.चंद्रकुमार जैन

राजनांदगांव। दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर डॉ.चंद्रकुमार जैन ने कहा है कि देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का मसला इन दिनों कुछ ज्यादा चर्चा में है। निजी प्रबंधन संस्थान और इंजीनियरिंग कॉलेज जहां 4 लाख विद्यार्थी उत्तीर्ण हो रहे हैं, वहीं हर वर्ष प्रबंधन संस्थानों से निकलने वाले विद्यार्थियों की संख्या 3 लाख है। इस दौरान रोजगार में भी एक तरह की स्थिरता है। आगे यह हो सकता है कि गुणवत्ता में सुधार के लिए दबाव बने क्योंकि संस्थानों के बीच बेहतरीन विश्व स्तर के विश्वविद्यालयों की तर्ज पर अच्छे विद्यार्थियों के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाएगी।

वेब परिचर्चा में प्रभावशाली भागीदारी करते हुए डॉ. जैन ने कहा कि उच्च शिक्षा में अब बेहतर विद्यार्थियों के पास विकल्प है और वंचित वर्ग के बच्चे भी पेशेवर शिक्षा हासिल कर सकते हैं। लेकिन वे शायद ऊंचे शुल्क का बोझ सहन न कर पाएं। दरअसल समय आ गया है कि अब केवल आपूर्ति से गुणवत्ता की ओर ध्यान केंद्रित किया जाए। डॉ. जैन ने कहा संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो भारत की उच्चतर शिक्षा व्यवस्था अमरीका और चीन के बाद तीसरे नंबर पर आती है लेकिन जहाँ तक गुणवत्ता की बात है दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। यह मुद्दा सोच और सरोकार को पुख्ता करने आहूत कर रहा है।

डॉ. जैन ने आंकड़ों के हवाले से कहा कि स्कूल की पढ़ाई करने वाले नौ छात्रों में से एक ही कॉलेज पहुँच पाता है. भारत में उच्च शिक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वाले छात्रों का अनुपात दुनिया में सबसे कम यानी सिर्फ़ 11 फ़ीसदी है. अमरीका में ये अनुपात 83 फ़ीसदी है.इस अनुपात को 15 फ़ीसदी तक ले जाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को 2,26,410 करोड़ रुपए का निवेश करना होगा जबकि 11वीं योजना में इसके लिए सिर्फ़ 77,933 करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया गया था। हाल ही में नैसकॉम और मैकिन्से के शोध के अनुसार मानविकी में 10 में से एक और इंजीनियरिंग में डिग्री ले चुके चार में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य हैं।

डॉ. जैन ने राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद यानी नैक के शोध का ज़िक्र करते हुए बताया कि भारत के 90 फ़ीसदी कॉलेजों और 70 फ़ीसदी विश्वविद्यालयों का स्तर बहुत कमज़ोर है। आईआईटी जैसे शिक्षण संस्थान भी वैश्विक स्तर पर जगह नहीं बना पाते। भारतीय शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की कमी का आलम ये है कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी 15 से 25 फ़ीसदी शिक्षकों की कमी है। भारतीय विश्वविद्यालय औसतन हर पांचवें से दसवें वर्ष में अपना पाठ्यक्रम बदलते हैं लेकिन तब भी ये मूल उद्देश्य को पूरा करने में विफल रहते हैं। आज़ादी के पहले 50 सालों में सिर्फ़ 44 निजी संस्थाओं को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। पिछले 16 वर्षों में 69 और निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दी गई।

इसी तरह डॉ.चंद्रकुमार जैन ने यह भी बताया कि अच्छे शिक्षण संस्थानों की कमी की वजह से अच्छे कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए कट ऑफ़ प्रतिशत असामान्य हद तक बढ़ जाता है। इस साल श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कामर्स के बी कॉम ऑनर्स कोर्स में दाखिला लेने के लिए कट ऑफ़ 99 फ़ीसदी था। अध्ययन बताता है कि सेकेंड्री स्कूल में अच्छे अंक लाने के दबाव से छात्रों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए हर साल सात अरब डॉलर यानी करीब 43 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च करते हैं क्योंकि भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का स्तर अनुकूल नहीं है.

डॉ. जैन ने मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर के डेढ़ दशक पहले के ऐलान की याद दिलायी कि आने वाले दिनों में ज्ञान का समाज दुनिया के किसी भी समाज से ज़्यादा प्रतिस्पर्धात्मक समाज बन जाएगा। दुनिया में गरीब देश शायद समाप्त हो जाएं लेकिन किसी देश की समृद्धि का स्तर इस बात से आंका जाएगा कि वहाँ की शिक्षा का स्तर किस तरह का है। डॉ. जैन ने कहा कि इस पहलू पर नए सिरे से विमर्श और पहल समय की बड़ी मांग है।

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