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ऐसी होली तो अब इतिहास हो गई

प्रसिद्ध लेखक उपन्यासकार अमृतलाल नागर की सुपुत्री श्रीमती अचला नागर, जो स्वयं भी निकाह, बाबुल, आखिर क्यों, बागबां जैसी चर्चित फिल्मों और साथिया जैसे सुपरहिट धारावाहिक की लेखिका हैं, से इस बारे में बात की, तो वे हंसते हुए बोलीं, ‘जिस घर में हर दिन होली मनती हो, उस घर के बारे में क्या बताऊं। बाबू जी (नागर जी) हर सुबह शाम ठंडाई बनाते थे। वह भी पूरे समारंभ के साथ। खुद सिल पर भांग, बादाम, मुनक्के और केसर डालकर पीसते थे। फिर बा (उनकी पत्नी) उनके सामने बड़ा सा छन्ना लेकर बैठती थीं और वे दोनों मिलकर कभी दूध और कभी आम के रस में छानते थे। शाम का समय हुआ तो बाबू जी के कोई ना कोई साहित्यिक मित्र भी इस आयोजन का भाग बन जाते थे। होली पर तो लखनऊ की साहित्यिक बिरादरी जमा होती थी। बा उस दिन स्वयं श्रीखंड बनाती थीं और साथ में बनती थी खत्रियों की प्रसिद्ध खस्ता कचौरियां। इन छोटी-छोटी मोयनवाली कचौरियों में दाल की पिट्ठी नहीं, तले हुए आलू के लच्छे भरे होते थे। घर में कितनी ही दिक्कत क्यों ना हो, बा अतिथि सत्कार और बाबूजी की साहित्य साधना में भंग नहीं पड़ने देती थीं। बाबूजी कहते थे मैं तो एक चौथाई हूं, तीन चौथाई अमृतलाल नागर तो तेरी बा है।’

हर दिन होली मनाने वाले इन बाबूजी और बा की प्रेमकहानी भी अद्भुत थी। बा के परिवार की महिलाओं को वैभव तो भरपूर मिला था, पर सिंदूर बहुत कम। बा की मां (अचला जी की नानी) जब सत्रह साल की थीं तो विधवा हो गई थीं। उनकी मां तब पेट में थीं। अचला जी की परदादी भी उसी तरह छोटी उम्र में विधवा हो गई थीं। परिवार में कोई पुरुष नहीं था। सिर्फ दो सास- बहू और उनकी नन्ही सी परी प्रतिभा ।

प्रतिभा जी बहुत सुंदर और स्वरूपवान थीं। आगरा के गोपालपुरा मोहल्ले में ये लोग रहते थे। पास ही अमृतलाल जी की भी ननिहाल थी। एक बार वे अपनी नानी और बा अपनी दादी के साथ आगरा के मंदिर में आए हुए थे। दोनों परस्पर परिचित थीं, सो बातें करने लगीं। नन्ही प्रतिभा ने एक दरवाजे को हाथ लगाया तो कोलतार हाथ में लग गया। गोरे हाथ में लगी कालिख को वे जितना छुड़ाने का प्रयास करतीं वह उतनी ही फैलती जा रही थी। उन्हें परेशान देख छोटे से नागर जी भी उनकी मदद करने लगे। कोलतार उनके हाथ में भी लग गया। दोनों बच्चों को साथ-साथ देख दोनों स्त्रियों के मन में एक ही विचार आया। कितने प्यारे लग रहे हैं। कैसी सुंदर जोड़ी है। क्यों ना इनकी शादी कर दें। नागर जी तब सात साल के थे और प्रतिभाजी तब पांच वर्ष की थीं।

बात तो पक्की हो गई थी, पर जब चार बरस गुजरने पर (यानी प्रतिभा जी के नौ वर्ष का होने पर) भी नागर जी के घर से विवाह का कोई संदेस नहीं आया तो मां और दादी चिंताग्रस्त हो गईं। लगा शायद बात मजाक में कही गई थी और उन्होंने और रिश्ते तलाशने शुरू कर दिए। प्रतिभा जी यह जानकर बहुत दुखी हो गईं। ननिहाल आते-जाते नागर जी को तो वे देखती रहती थीं। उनकी छवि वे मन में बसा चुकी थीं। अपनी एक सहेली से उन्होंने कहा, ‘मैं उनसे प्यार करती हूं और उन्हीं से विवाह करना चाहती हूं। सहेली की सलाह थी कि निकट के मंदिर में शिव-पार्वती को रोज 108 चावल चढ़ाओ, तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। दृढ़ निश्चय प्रतिभा जी ने यही किया और उनकी तपस्या रंग लाई।’

नागर जी के घर से रिश्ता भी आया और वो उनकी अर्धांगिनी भी बनीं। महज 19 साल की उम्र में नागर जी ने उनसे कह दिया था कि मैं केवल साहित्य साधना करूंगा और उनका जवाब था कि मैं हमेशा तुम्हारा साथ दूंगी। यह वचन उन्होंने आजीवन निभाया। नागर जी ने आठ-दस बरस बम्बई में धनोपार्जन किया भी। पर यह शहर उन्हें रास नहीं आया। और फिल्मों में सफल होने के बावजूद वे यहां से गए तो फिर पलटे नहीं। अचला जी बताती हैं कि नानी के पास बहुत सोना था। हमारे घर की हर जरूरत पर वे सोना बेच देती थीं और बा गृहस्थी की गाड़ी खींचती रहतीं। नागर जी से ना उन्होंने कभी असंतोष जाहिर किया ना खीज।

बा की एक ही इच्छा थी सुहागिन प्राण छोड़ने की। अचला जी बताती हैं कि वे बार-बार हमें अपनी उस चुनरी, मांग टीके और चूड़ियों के बारे में बताती रहती थीं, जिसमें सज कर उनकी अंतिम यात्रा निकली। उनके साथ हर दिन होली मनाने वाले नागर जी की वह अंतिम होली थी।

साभार- https://www.livehindustan.com/ से



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