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सुधीर चौधरी ने पोल खोली सचिन तेंदुलकर को हीरो बनाने की मुहिम चला रहे मीडिया की

ज़ी मीडिया के लोकप्रिय कार्यक्रम डीएनए में सुधीर चौधरी ने मंगलवार, 3 अप्रैल को सचिन तेंदुलकर द्वारा राज्यसभा के सदस्य के रुप में मात्र 8 प्रतिशत उपस्थिति देने और राज्यसभा सांसद को मिलने वाली राशि से कश्मीर के एक स्कूल को दान देने से लेकर अपना 6 साल का वेतन प्रधान मंत्री राहत कोष में देने की घोषणा पर मीडिया में झूठी वाहवाही लूटने वाले क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर और उनकी उपलब्धियों की ज़बर्दस्त चीर-फाड़ की।

सुधीर चौधरी ने कहा, क्रिकेट से संन्यास लेने से पहले सचिन तेंदुलकर जब बैटिंग करते हुए चौके छक्के लगा रहे थे.. तो बहुत से लोगों ने उनके इस खेल को ही देशहित समझ लिया था. लोग उनकी बैटिंग इसी भाव से देखते थे जैसे सचिन देश के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं. लेकिन जब असलियत में देश के लिए कुछ करने का मौका आया तो सचिन तेंदुलकर अदृश्य हो गये.

अगर अपने ऑफिस में आपकी उपस्थिति सिर्फ 8 प्रतिशत हो, तो क्या आप ये उम्मीद कर सकते हैं कि आपको पूरी सैलरी मिलेगी? ज़ाहिर है आपको ऐसी सुविधा कभी नहीं मिलेगी. लेकिन राज्यसभा के सांसद सचिन तेंदुलकर को सिर्फ 8 प्रतिशत Attendance के बावजूद पूरी सैलरी मिली. और इसके बाद उन्होंने इस पूरी सैलरी को दान कर दिया. अब सचिन तेंदुलकर की इस दानवीरता की तारीफ़ हो रही हैं. उन्हें परोपकार की मूर्ति के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन हमें लगता है कि ये ठीक नहीं है. हम आपके मन से इस भ्रम को हटाना चाहते हैं. इसलिए आज हमने सचिन तेंदुलकर के सैलरी वाले दान-पुण्य का DNA टेस्ट किया है.

सबसे पहले राज्यसभा सांसद सचिन तेंदुलकर का 6 साल का सैलरी ब्रेक-अप समझ लीजिए. 6 वर्ष में उन्हें 1 लाख 25 हज़ार रूपये प्रतिमहीने के हिसाब से वेतन मिला. यानी उन्हें कुल मिलाकर करीब 90 लाख रुपये मिले. लेकिन उनकी Attendance सिर्फ़ 8 प्रतिशत थी. अब आप खुद ही सोचिए कि इतनी कम उपस्थिति के बाद कितनी सैलरी मिलनी चाहिए ? आपके मन में ये बात आएगी कि ऐसे कर्मचारी को कोई वेतन नहीं मिलना चाहिए. और अगर तनख्वाह देनी ही है तो कुल वेतन का 8 प्रतिशत हिस्सा ही देना चाहिए.

अगर 90 लाख रुपये की सैलरी का 8 फीसदी हिस्सा निकाला जाए तो 7 लाख 20 हज़ार रुपये बनते हैं. लेकिन सचिन तेंदुलकर को पूरे 90 लाख रुपये मिले. और उन्होंने यही रकम कथित रूप से दान कर दी. और इसी बात के लिए सचिन तेंदुलकर को दानवीर कहा जा रहा है. उनकी तारीफों के कसीदे पढ़े जा रहे हैं. उनके पक्ष में माहौल बनाने के लिए ख़बरें छप रही हैं.

राज्यसभा में अपने 6 साल के कार्यकाल में सचिन तेंदुलकर ने किसी भी चर्चा में हिस्सा नहीं लिया. उन्होंने पूरे कार्यकाल में सिर्फ 22 सवाल पूछे जबकि राज्यसभा में एक सांसद औसतन 331 सवाल पूछता है. इसके अलावा सचिन तेंदुलकर ने सांसद निधि में आवंटित 30 करोड़ रूपये में से सिर्फ़ 7 करोड़ 40 लाख रूपये ही जनकल्याण की योजनाओं में खर्च किए हैं . लेकिन जब भी वो अपने सांसद फंड का इस्तेमाल करते हैं तो अखबारों की हेडलाईऩ बन जाती है. 5 दिन पहले 29 मार्च को सचिन तेंदुलकर ने एमपी लैड (Members of Parliament Local Area Development Scheme) के तहत जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा के एक स्कूल को 40 लाख रूपये आवंटित किये थे. और इस ख़बर की हेडलाइन ऐसी बनाई गई, जैसे सचिन तेंदुलकर ने जम्मू-कश्मीर के स्कूली बच्चों को कोई बहुत बड़ा तोहफा दे दिया हो.जबकि असलियत ये है कि जिस पैसे को दान और तोहफे की तरह पेश किया जा रहा है. वो पैसा सचिन तेंदुलकर का है ही नहीं. ये वो रकम है जो देश की जनता ने टैक्स के रूप में दी थी. देश के प्रति ईमानदार रहना और जनता के द्वारा TAX के रूप में मिले पैसे का जनता के हित में इस्तेमाल करना, एक सांसद का कर्तव्य होता है. लेकिन इसे सचिन तेंदुलकर की ज़िम्मेदारी के बजाए उनकी दरियादिली के तौर पर पेश किया गया.

क्रिकेट से संन्यास लेने से पहले सचिन तेंदुलकर जब बैटिंग करते हुए चौके छक्के लगा रहे थे.. तो बहुत से लोगों ने उनके इस खेल को ही देशहित समझ लिया था. लोग उनकी बैटिंग इसी भाव से देखते थे जैसे सचिन देश के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं. लेकिन जब असलियत में देश के लिए कुछ करने का मौका आया तो सचिन तेंदुलकर अदृश्य हो गये. और संसद में उनकी उपस्थिति इसका सबसे बड़ा सबूत है. हेडलाइन्स में दिखने वाली सचिन तेंदलुकर की दानवीरता के पीछे, 8% उपस्थिति वाले एक सांसद का अपराध बोध दिखाई देता है.

एक सांसद के रूप में देशसेवा की पिच पर सचिन तेंदुलकर क्लीन बोल्ड हो गये हैं.. हालांकि दान के शतक से उन्होंने अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को ख़ामोश करने की कोशिश की है . इसमे कोई शक नहीं है कि क्रिकेट के क्षेत्र में सचिन तेंदुलकर का योगदान और उनका कद बहुत बड़ा है . क्रिकेट की पिच पर उनकी यादगार पारियों को देश कभी भूल नहीं पाएगा. लेकिन राजनीति की पिच पर उनकी सांसद वाली पारी भी भूलने लायक नहीं है. उनके विश्व कीर्तिमान के साथ साथ उनका राज्यसभा वाला रिकॉर्ड भी लोगों को याद रहेगा.

हम सचिन तेंदुलकर का पूरा सम्मान करते हैं. लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि सम्मान के साथ साथ जिम्मेदारियां भी आती हैं. और हमें लगता है कि सांसद के तौर पर सचिन तेंदुलकर ने अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभाया. हमारी राजनीतिक पार्टियों की ये ज़िम्मेदारी है कि वो राज्य सभा सांसद के रूप में ऐसे लोगों का चुनाव करें, जो देश की समस्याओं के प्रति संवेदनशील हों और देश के लोगों के मुद्दे उठा सकें .



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