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सुनेल की आशा रानी जैन ‘ आशु ‘, ने बनाई साहित्य में विशेष पहचान

छंद,कविता,गीत,गजल, बाल साहित्य लेखन और दूरदर्शन ,आकाशवाणी तथा साहित्यिक मंचों पर काव्यपाठ के माध्यम से झालवाड़ जिले के सुनेल निवासी श्रीमती आशा रानी जैन ‘ आशु ‘ ने हाड़ौती के साहित्यकारों के मध्य अपनी खास पहचान बनाई है। बालकाल्य से ही लिखने के शौक ने आज इन्हें श्रेष्ठ साहित्यकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। आप एक अध्यापिका के रूप में राजकीय सेवा में अध्यापन के साथ – साथ अपनी साहित्य साधना में भी निरंतर लगी हुई हैं। आप अखिल भारतीय साहित्य परिषद इकाई सुनेल की अध्यक्ष पद का दायित्व भी वहन कर रही है। 

वे कहती हैं, कविता, गजल या गीत लिखना मन की स्व अनुभूति और अंतरात्मा की आवाज़ होती है। प्रयास और अभ्यास से लिख तो सकते हैं पर अंतर्मन के उपजे भावों से जो सामने आता है उसमें एक सम्मोहन और गहराई होती हैं। चाहे प्रेम हो, विरह, प्रकृति, सौंदर्य बोध, श्रृंगार या और कोई विषय जिस पर कविता होगी वह सुनने वालों को अपने आकर्षण में बांध लेगी। 

कलम को समर्पित एक गजल के कुछ अंश की बानगी देखिए……..
किसी की आरजू और कोई मन की आस लिखती है।
 किसी के नेह का अनमोल ये विश्वास लिखती है।।
कभी आँसू हैं सीता के कभी राधा की है तड़पन।
 कभी ये वेदना गहरी कभी ये रास लिखती है।।
‘ आशू’ ये बड़ी कोमल हवा सी सबको छू लेती।
कलम हर दिल की धड़कन है ,सभी की श्वास लिखती है। 

आपने संसार में मां के महत्व और महिमा को बहुत सी सहज रूप से अपनी गजल में इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है……
तेरी मुस्कान मेरा हौसला है हिम्मत है।
तेरे आशीष की हर पल मुझे जरूरत है।।
तुझसा पाया न कोई आसरा ऐ मां मेरी।
तेरे आंचल की छांव सबसे खूबसूरत है।।
मैं तेरा कर्ज भला कैसे चुका पाऊँगा।
तूने जो मुझपे लुटाई दुआ की दौलत है।।
न जाने कितने बड़े दिल की तू है मां मेरी ।
बांटना प्यार ही तेरी रही इबादत है।।
तू है करुणा का कलशऔर क्षमा की देवी ।
तूने ही माफ की मेरी हरिक शरारत है।।
तूने नींदें गंवाईं मेरे लिये रातों की।
कभी बयाँ न किया दर्द न शिकायत है।।
‘ आशू’ ममता का हरिक फर्ज निभाया दिल से। कभी मांगी न छुट्टी और न की बगावत है।।

आपकी गजल क़ाफ़िया— किरदार ( आर की बंदिश) रदीफ़ — “मैं ” की पक्तियां इस प्रकार हैं ……..
आज करती हूं सनम इकरार मैं ।
 तुझको छूकर हो गई कचनार मैं ।।
दूरियां तुझसे गवारा अब नहीं।
 हो गई हूं इश्क में लाचार मैं ।।
प्यास अपनी मुझको बतला तो सही।
 इश्क की तुझ पर करूं बौछार मैं।।
हमसफर मुझको बना कर देख तो।
 तेरी राहों के चुनूं सब खार मैं ।।
बनके संदल तू समाया जिस्म में।
रूह की तेरी बनूं हकदार मैं।।
हर तरफ चर्चे हैं वाकिफ हैं सभी।
कैसे कर दूँ इश्क से इनकार मैं ।।
तू बने सागर तो तुझमें आ मिलूं 
‘ आशु’ इक नदिया की बन के धार मैं।।
 

इतने गहरे भावों को सहज रूप में शब्दों में पिरोने की कला में दक्ष आशा जी की कई कृतियां भी प्रकाशित हो चुकी हैं। विशेषकर *बाल साहित्य* के क्षेत्र में इन्होंने अपना विशेष स्थान बनाया है , सहज,सरल शब्दावली का प्रयोग करते हुए बालमन को छूने वाले बालगीत एवम् नन्हें मुन्ने शिशु सहजता व चाव से गाने का आनंद ले सकें ऐसे मनभावन शिशुगीत अपनी प्रकाशित पुस्तकों में लिखे हैं जो कि आंगनवाडी, प्राथमिक व उच्च प्राथमिक कक्षाओं के बालकों,अध्यापकों हेतु अत्यंत उपयोगी हैं।

प्रकाशन : इनकी पुस्तकें परवाज, साझा गजल संग्रह , काव्य प्रसून- साझा छंद एवम् गीत संग्रह , चल मुसाफिर – साझा गीत संग्रह ,चांद मुट्ठी में कर ले– साझा काव्य संग्रह, सुगंध मंजरी– साझा गीत संग्रह
,साहिल की तलाश”–साझा गजल संग्रह, 
शब्द अर्चन- साझा काव्य संग्रह और 
 भावों का आकाश-साझा दोहा संकलन 
मुख्य हैं। 

यही नहीं आपकी बाल और शिशु गीतों के संकलन पर भी गुंजन — बाल कविता संकलन , कलरव — शिशु गीत संग्रह , छू लो गगन-बाल गीत संग्रह और चीं चीं चूं चूं – शिशु गीत संग्रह का प्रकाशन किया जा चुका है। आपकी कृतियां सैलाब- गजल संग्रह और कलिकाएं- मुक्तक संग्रह प्रकाशनाधीन हैं।

आपकी एक गज़ल की भावपूर्ण चंद पंक्तियां भी गौरतलब हैं ……
जाना सभी को को इक दिन झगड़ा है फिर ये कैसा ।
इंसानियत से बढ़कर क्यों हो गया है पैसा।।
क्यूं दर्द में किसी के हम आंख फेर लेते।
क्या भाई वो हमारा अब है न पहले जैसा।।
झगड़ों को देख घायल मां भारती सिसकती।
दामन किया है बेटों ने तार तार ऐसा।।
इंसान हों सभी बस इंसानियत को पूजें।
या रब तू ही बना दे मजहब कोई तो ऐसा।।
किस मोड़ पे खड़ा है आकर ये देश मेरा।
हो जाए फिर से *आशु* यहां रामराज्य वैसा।।

सम्मान : आप साहित्य के क्षेत्र में आगे पर बताती हैं कि आदरणीय निर्मोही जी प्रेरणा हैं जिन्होंने हमारा समय – समय पर मार्गदर्शन किया और आगे बढ़ाया। इसी का परिणाम है कि आपको विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय -समय पर पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। आपको अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था *मगसम* द्वारा मिले शतकवीर सम्मान व लालबहादुर शास्त्री साहित्य रत्न सम्मान से गौरवांवित हैं। काव्यांजलि सृजन की उडान संस्थान, कोटा द्वारा गजल साधक सम्मान एवम काव्यांजलि सृजन की उडान छंद गौरव सम्मान, काव्य सृजन संस्थान, धौलपुर द्वारा साहित्य साधक सम्मान,गंगासागर साहित्य संस्थान भीलवाड़ा द्वारा काव्य साधक सम्मान, भीलवाड़ा द्वारा शब्द साधक सम्मान और साहित्य सागर सम्मान और साहित्य मंडल श्रीनाथ द्वारा – बाल साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया है। आप श्रेष्ठ गरबा नृत्य निर्देशिका भी हैं इस हेतु आपको सुनेल ग्राम गौरव सम्मान से भी नवाज़ा गया है।

परिचय : साहित्यकार आशा रानी ‘ आशु ‘ का जन्म 28 नवंबर 1961 को अजमेर में हुआ। आपने हिंदी साहित्य और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। वनस्थली विद्यापीठ से शिक्षा में बी एड किया। आप रा. उ. मा. वि. डोला, जिला झालावाड से द्वितीय श्रेणी अध्यापिका पद से सेवानिवृत्त हुई हैं। आपने कई मंचों पर काव्य पाठ किया और दूरदर्शन राजस्थान एवं आकाशवाणी झालावाड़ से आपके काव्य पाठ का कई बार प्रसारण किया गया। आपको विभिन्न संस्थाओं में मोटीवेशनल स्पीच हेतु भी आमंत्रित किया जाता है सेवानिवृति के बाद आप वर्तमान में साहित्य साधना में लगी हुई हैं।
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-डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवम स्वतंत्र पत्रकार

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