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सुरेश प्रभु की रेल्वे सुधार की मुहिम जल्दी ही रंग लाएगी

नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में भारतीय रेलवे की असली कहानी पिछले तीन वर्षों की उपलब्धियों से नहीं बल्कि अगले दो वर्षों की कामयाबियों से तय होगी। यह रेलवे को आधारभूत ढांचे के मोर्चे पर लगातार पेश आ रही बड़ी चुनौतियों को रेखांकित करता है और साथ ही यह भी ध्यान दिलाता है कि इसका प्रदर्शन सुधारने का कोई तात्कालिक तरीका नहीं हो सकता है। रेलवे में नई परियोजनाओं की शुरुआत, निवेश में बढ़ोतरी और सांगठनिक पुनर्सुधार जैसे कदमों के परिणाम लंबे समय बाद ही देखे जा सकते हैं।

देश के पूर्वी और पश्चिमी मार्गों पर केवल माल ढुलाई के लिए बनाए जा रहे दो रेल गलियारों के निर्माण में पिछले दो वर्षों में तेजी आई है और इसके वर्ष 2019 में पूरा होने की मियाद रखी गई है। हालांकि ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि इन गलियारों का काम पूरा होने में देर हो सकती है लेकिन अगले आम चुनावों के पहले इन गलियारों के कुछ प्रमुख हिस्सों पर परिचालन शुरू होने की पूरी संभावना है। ऐसा होने पर मालगाडिय़ों की औसत रफ्तार को 24 किलोमीटर प्रति घंटे के मौजूदा स्तर से बढ़ाकर करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटे तक ले जाने का वादा हकीकत में तब्दील किया जा सकेगा।

इसी तरह जनरल इलेक्ट्रिक और अल्सटॉम के दो लोकोमोटिव कारखानों के निर्माण का काम भी शुरू हो गया है और रेलवे को वर्ष 2018 से इन कारखानों में बने डीजल एवं इलेक्ट्रिक इंजनों की आपूर्ति शुरू होने की संभावना है। इसके अलावा रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण की बहुचर्चित परियोजना भी चल रही है। इस महत्त्वाकांक्षी योजना को मूर्तरूप देने के लिए करीब 1 लाख करोड़ रुपये के निवेश की दरकार होगी। हबीबगंज और गांधीनगर स्टेशनों को आधुनिक रूप देने के लिए अनुबंध किए गए हैं और वहां पर निर्माण कार्य शुरू भी हो गया है। रेलवे इस तरह 25 अन्य स्टेशनों के आधुनिकीकरण की निविदा जारी करने की प्रक्रिया चलाए हुए है।

रेलवे ने रेल मार्गों के विद्युतीकरण और दोहरीकरण की कई परियोजनाओं, रेल नेटवर्क के विस्तार और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रेल पटरियों के नवीनीकरण के लिए मध्यम अवधि की निवेश योजना का ब्लूप्रिंट तैयार किया है। इस योजना के तहत अगले पांच वर्षों में 8.5 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं। इस तरह अगले पांच वर्षों में हरेक साल औसतन 1.7 लाख करोड़ रुपये इन रेल परियोजनाओं पर खर्च किए जाएंगे। यह रकम पिछले तीन वर्षों में रेलवे की तरफ से किए गए औसत निवेश की दोगुनी होगी।

रेलवे की वार्षिक निवेश योजना को दोगुना करने की खास बात यह है कि जरूरी संसाधनों का एक तिहाई से भी कम हिस्सा बजट प्रावधानों के जरिये आएगा। संसाधनों का लगभग 14 फीसदी हिस्सा राज्य सरकारों के साथ किए जाने वाले साझा उद्यमों के जरिये आएगा। यह रेल परियोजनाओं के निर्माण में राज्यों की अधिक सहभागिता सुनिश्चित करने में भी मददगार होगा और सहकारी संघवाद के प्रति मोदी सरकार की घोषित प्रतिबद्धता के भी अनुरूप होगा। रेलवे ने विभिन्न राज्यों में 10 संयुक्त परियोजनाओं पर काम करने का खाका तैयार किया है। इस निवेश योजना का 13 फीसदी अंशदान निजी क्षेत्र का भी होगा जबकि 15 फीसदी हिस्से की व्यवस्था रेलवे अपने अंदरूनी संसाधनों से करेगा। बाकी 28 फीसदी रकम का इंतजाम कर्ज लेकर पूरा किया जाएगा।

भारतीय रेलवे की इस निवेश योजना के दो अन्य रोचक पहलू हैं। रेलवे ने अपने कुल टर्नओवर में किराये एवं भाड़े से इतर साधनों से जुटाए जाने वाले राजस्व का हिस्सा बढ़ाकर 20 फीसदी करने की भी योजना बनाई है। पिछले साल इसने गैर-किराया स्रोतों से 10,100 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया था जो एक साल पहले की तुलना में 80 फीसदी अधिक था। इसके बावजूद कुल राजस्व में गैर-किराया राजस्व की हिस्सेदारी महज पांच फीसदी थी। वैसे तो यह काम मुश्किल होगा लेकिन इसमें रेलवे के राजस्व स्रोतों में विविधता लाने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। यह रेलवे के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।

इससे कहीं अधिक मुश्किल काम रेलवे के पुनर्गठन का होगा। रेल मंत्री सुरेश प्रभु अक्सर इस विचार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते रहे हैं। रेलवे मौजूदा समय में आधा दर्जन से अधिक सेवाएं मुहैया करा रहा है और उसमें विस्तार देखा जाता रहा है। इसका नतीजा यह होता है कि इन विभिन्न सेवाओं के बीच अक्सर सामंजस्य नहीं बैठ पाता है। इसके साथ ही समेकित दृष्टिकोण के अभाव में किसी समस्या का समाधान तलाशना या परियोजना को क्रियान्वित कर पाना भी मुश्किल हो जाता है।

हालांकि रेलवे ने अपनी कुछ सेवाओं को पहले ही एक-दूसरे में समाहित कर दिया है। अब रेलवे कैडर को भी एकीकृत करने की एक कार्ययोजना बनाई जा रही है ताकि वे एकीकृत दृष्टिकोण से काम करें और सेवाओं की बहुलता रेलवे के कामकाज पर असर न डाले। रेलवे में सुधार की कई अन्य योजनाएं भी एजेंडे में हैं। पहले ही संसद में रेल मंत्री की तरफ से अलग से रेल बजट पेश करने की परिपाटी को खत्म किया जा चुका है। उसकी जगह रेलवे के लिए किराये एवं मालभाड़े से संबंधित सुझाव देने के लिए एक नए प्राधिकरण का गठन किया गया है। अब रेलवे के खातों के इनपुट और आउटपुट के बीच संबंध स्थापित करने के लिए लेखा-संबंधी सुधार भी लाने की तैयारी है। हालांकि आज के समय रेलवे की तरफ से सबसे बड़ा संदेश यही है कि इसने भारत में यात्रियों और सामान के सबसे बड़े ट्रांसपोर्टर के कामकाज में बड़ा बदलाव लाने के लिए कई दीर्घावधि कदम उठाए हैं। लेकिन वर्ष 2019 में ही पता चल पाएगा कि इन प्रयासों की ही तरह नतीजे भी आते हैं या नहीं।

साभार-http://hindi.business-standard.com से



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