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‘देशप्रेम की धड़कन है स्वदेशी’

मुझे आज तक एक बात समझ नहीं आई कि कुछ लोगों को स्वदेशी जैसे अनुकरणीय, उदात्त और वृहद विचार का विरोध क्यों करते हैं? स्वदेशी से उन्हें क्या दिक्कत है? मुझे लगता है कि स्वदेशी का विरोध वे ही लोग करते हैं जो मानसिकरूप से अभी भी गुलाम हैं या फिर उनको विदेशी उत्पाद से गहरा लगाव है। संभव है इनमें से बहुत से लोग उन संस्थाओं और संगठनों से जुड़े हों या प्रभावित हों, जो विदेशी कंपनियों से चंदा पाते हैं। जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया है और लोकल के लिए वोकल होने के लिए कहा है, तब से ही कुछ लोग सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़ कर स्वदेशी का विरोध कर रहे हैं। आप इन्हें अच्छी तरह पहचान लीजिये, ये कौन लोग हैं जो भारत में बनी वस्तुओं और उनके उपयोग को हतोत्साहित कर रहे हैं। जबकि स्वदेशी भारत की अनेक समस्याओं का समाधान है। स्वदेशी का विचार लोगों के मन में बैठ गया तो लाखों लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा। स्थानीय प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर मिलगा। हमारे कुशल कारीगरों के हाथ मजबूत होंगे। उनके उत्पाद की मांग बढ़ेगी तो किसे लाभ होगा? भारत को, भारत के लोगों को ही उसका लाभ मिलेगा। इसलिए जो लोग स्वदेशी का विरोध कर रहे हैं, असल में वे भारत का विरोध कर रहे हैं।

स्वदेशी केवल उत्पाद से जुड़ा हुआ विषय नहीं है बल्कि यह एक विचार है। एक आन्दोलन है। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का एक प्रमुख विचार रहा है, स्वदेशी।

महात्मा गाँधी कहते थे- “स्वदेशी केवल रोटी, कपड़ा और मकान का नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवन का दृष्टिकोण है। स्वदेशी देश की प्राणवायु है, स्वराज्य और स्वाधीनता की गारंटी है। गरीबी-भुखमरी और गुलामी से मुक्ति का उपाय है यह। स्वदेशी के अभाव में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मानसिक स्वातंत्र्य सर्वथा असंभव है।”

अपने आप को महात्मा गाँधी का उत्तराधिकारी बताते वाले ‘नकली लोगों’ को महात्मा गाँधी जी को ठीक से पढ़ना चाहिए, वे स्वदेशी के बारे में क्या सोचते थे। उनका तो पूरा जीवन ही स्वदेशी को समर्पित था। चरखे से सूत कातना और खादी के कपड़े पहनना, क्या था? विदेशी कपड़ों की होली जलना और नमक क़ानून का उल्लंघन, ये सब स्वदेशी की भावना को मजबूत करने और सब प्रकार की स्वतंत्रता प्राप्त करने के महात्मा गाँधीजी के प्रयोग थे। हम गाँधीजी के स्वदेशी के विचार को कैसे भूल सकते हैं, जबकि इस वर्ष हम उनकी 50वीं जयंती माना रहे थे।

गाँधी-इरविन पैक्ट के समय चर्चा चल रही थी। दोपहर में चाय का समय था। वायसराय साहब के लिए चाय आई और महात्मा गाँधी के लिए नींबू पानी आया। वायसराय देख रहे थे कि गांधीजी क्या करते हैं? गांधीजी ने एक पुड़िया निकाली और उसे खोलकर उसमें से कुछ नींबू पानी में डाल दिया। वायसराय को समझ नहीं आया कि गाँधीजी ने क्या किया तो उन्होंने पूछा कि आपने यह क्या डाला पानी में? गांधीजी ने उत्तर दिया- “आपके नमक क़ानून का उल्लंघन कर मैंने जो नमक बनाया था, उस नमक की पुड़ी को मैंने इसमें डाला है।” इतना मजबूत और विस्तृत है स्वदेशी का विचार।

स्वदेशी क्या है, उसे और विस्तार देते हुए प्रख्यात स्वदेशी चिन्तक दत्तोपंत ठेंगडी ने कहा है- “यह मानना भूल है कि ‘स्वदेशी’ का सम्बन्ध केवल माल या सेवाओं से है। यह फौरी किस्म की सोच होगी। इसका मतलब है देश को आत्मनिर्भर बनाने की प्रबल भावना, राष्ट्र की सार्वभौमिकता और स्वतंत्रता की रक्षा तथा समानता के आधार पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग।” उनका स्पष्ट मानना था कि स्वदेशी, देशप्रेम की साकार और व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।

स्वदेशी के विरोध में दो बहुत उथले तर्क दिए जाते हैं- एक, आप अपना मोबाइल फेंक दीजिये, टीवी फोड़ दीजिये, क्योंकि वे विदेशी उत्पाद हैं। दूसर कुतर्क है, सरकार विदेशी सामान के आयत पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगा देती। पहले दूसरे कुतर्क का जवाब है कि अंतर्राष्ट्रीय नीतियों के कारण सरकार की कुछ मजबूरी हो सकती है, लेकिन हमारी क्या मजबूरी है विदेशी उत्पाद खरीदने की? हम खुद क्यों नहीं विदेशी उत्पाद से दूरी बना लेते। जब हम खरीदेंगे ही नहीं तो भविष्य में कभी वह माल बिकने के लिए यहाँ आएगा ही नहीं।

इसको एक ऐतिहासिक उदाहरण से समझिये। एक वर्ष अमेरिका में प्रचुर मात्र में संतरे का उत्पादन हुआ। जापान की महिलाओं को संतरे बहुत पसंद थे। अमेरिका ने जापान को अपने संतरे बेचने के लिए उचित बाज़ार समझा और जापान पर दबाव बनाया कि वह अमेरिका के संतरे अपने बाज़ारों में बिकने दे। पहले तो जापान ने इनकार किया, लेकिन अमेरिका की धौंस-पट्टी के कारण उसे अपने बाज़ार खोलने पड़े। लेकिन, जैसे ही जापान की महिलाओं और अन्य नागरिकों को यह ज्ञात हुआ कि हमारे बाजारों में जो संतरे की भरी आवक दिख रही है, उसके पीछे अमेरिका की धौंस-पट्टी है तो उन्होंने बहुत पसंद होने के बाद भी संतरे नहीं खरीदे। यह है स्वदेशी के प्रति नागरिक बोध। कोई भी अंतर्राष्ट्रीय नीति या दबाव नागरिकों को मजबूर नहीं कर सकता।

पहले कुतर्क का उत्तर, स्वदेशी के लिए लम्बे समय से आन्दोलन चला रहे संगठन स्वदेशी जागरण मंच का एक नारा है- ‘चाहत से देसी, जरूरत से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी’। इस नारे में ही उस कुतर्क का सटीक उत्तर छिपा है, साथ में स्पष्ट सन्देश है। इसके बाद भी स्वदेशी विरोधियों को कुछ समझ न आये तो उनको कहिये कि उनसे कुछ हो न पायेगा। वे बस विरोध करते रहें। उनका विरोध भारत के कारीगरों, कामगारों और उत्पादकों के विरोध में हैं। वे नहीं चाहते कि देश के उत्पाद आगे बढ़ें, यहाँ के कारीगर-उत्पादकों का लाभ हो।

अब जरा सोचिये, देशभक्त नागरिक होने के नाते आपको क्या करना है? बहुत सरल मंत्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिया है- “लोकल के लिए वोकल हो जाईये।” अपने बंधुओं द्वारा निर्मित स्वदेशी उत्पादों पर गर्व कीजिये। जहाँ तक संभव हो सके स्वदेशी वस्तुएं खरीदिये। स्वदेशी विचार को जीवन में उतरिये।

संपर्क :

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
बी-38, विकास भवन, प्रेस काम्प्लेक्स, महाराणा प्रताप नगर जोन-1,
भोपाल (मध्यप्रदेश) – 462011
दूरभाष : 09893072930
www.apnapanchoo.blogspot.in

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