स्वामी अग्निवेशः ये भी ग़ज़ब के स्वामी थे!

जब स्वामी अग्निवेश के निधन की खबर पढ़ी तो 1980 के दशक का वह समय याद आ गया जब मैं पत्रकारिता करने के लिए दिल्ली आया था। उस समय मैं राजनीति में बहुत लोगों को नहीं जानता था। स्वामी अग्निवेश उन चंद लोगों, नेताओं में से थे जो कि मुझे बातचीत करके जानकारी देने के लिए बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। उस समय दिल्ली के 7-जंतर-मंतर रोड स्थित तत्कालीन जनता पार्टी के दफ्तर के पिछले हिस्से के बारामदे में ही उनका दफ्तर था। जहां से वे अपना बंधुआ मुक्ति मोर्चा नामक संगठन चलाते थे।

यह संगठन बंधुआ मजदूरों की मुक्ति के कारण आर्य समाज के प्रचार के लिए हरियाणा में भी काफी काम कर रहा था। उस समय कैलाश सत्यार्थी उनके संगठन में होने से कर्मचारी अधिकारी हुआ करते थे। हमे मिलने आने वालो के लिए चाय व बिस्कुट लाया करते थे। बाद में कैलाश सत्यार्थी ने अपनी अलग संस्था बचपन बचाओ आंदोलन के नाम से खोल ली व उनकी पत्नी, बेटी व एक मित्र वकील की मदद से उसका कारोबार इतना बढ़ा कि वह देखते-ही-देखते इस क्षेत्र में ‘माल’ बन गए व अंतः में मलाला के साथ उन्हें नोबल पुरुस्कार मिल गया। तब मैंने लिखा था कि समय का फेर देखिए कि उनका गुरू तो गुड़ ही रहा मगर चेला कैलाश सत्यार्थी मिश्री बनकर आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर का आदमी है।

संयोग से उस समय दिल्ली प्रेस में मेरे सहयोगी व मित्र अनिल त्यागी ने भू भारती पत्रिका में हरियाणा के तीन स्वामी शीर्षक से एक कवर स्टोरी लिखी थी जिसमें उनके अलावा स्वामी इंद्रवेश व आदित्यवेश का भी जिक्र था। वे तीनो ही हरियाणा में आर्य समाज का प्रचार-प्रसार करने के साथ-साथ वहां राजनीति भी करते थे। वे तीनों स्वामी होने के नाम पर हवन करते और धर्म के गेरूआ कपड़े पहनते पर जमकर अपनी राजनीति करते। स्वामी इंद्रवेश बाद में सांसद में बने।

उन दिनों हरियाणा में आर्य समाज का काफी प्रभाव था। वे अन्य स्वामी के साथ मांस-मदिरा के खिलाफ अभियान चला रहे थे। वहां काफी तादाद में भट्टे थे जहां काम करने वाले लोगों को बंधुआ मजदूर बनाकर रखा जाता था। वे उन्हें मुक्त करवाने का अभियान अपने बंधुआ मुक्ति मोर्चा संगठन के जरिए चलाते थे। मेरे तत्कालीन संपादक ने जब पहली बार मुझे उनका इंटरव्यू करने को कहा तो मैंने इस सवाल पर जोर दिया कि जो लोग मुक्त करवाए जाते हैं उनका हश्र क्या होता है।

संयोग से उस समय मुक्त करवाए गए बंधुआ लोगों के पुनर्वास के लिए राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी संगठन काम नहीं कर रहा था। वे भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे सके व उन्होंने उनके पुनर्वास की जरूरत को स्वीकार करते हुए कहा था कि हमें उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने की बहुत जरूरत है वरना वे पुनः उसी पुरानी हालात में पहुंच जाएंगे।

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में जन्मे इस 81 वर्षीय स्वामी अग्निवेश का असली नाम वेपा श्याम राव था। उन्होंने अपने ब्राह्मण होने की पहचान को त्याग दिया था। वे हरियाणा विधान सभा के सदस्य भी रहे व बाद में हरियाणा सरकार में मंत्री भी बने। वे आर्य समाज की सबसे बड़ी संस्था विश्व इकाई के अध्यक्ष भी थे। जब वे महज चार साल के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया व उनके मामा ने उन्हें पाला। जोकि छत्तीसगढ़ के तत्कालीन राज घराने में दीवान थे।

उन्होंने कानून व कामर्स में डिग्री ली। एक बार दिवंगत प्रणव मुखर्जी ने यह खुलासा किया था कि वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनसे एक साल वरिष्ठ थे। उन्होंने भारत के प्रधान न्यायाधीश रहेमुखर्जी के अधीन वकील रहते हुए वकालत की प्रेक्टिस भी की थी। उन्हें तमाम समस्याओं को हल करने में काफी आनंद आता था। उन्होंने 2011 में सामाजिक कार्यकर्ताओं, कविता श्रीवास्तव रजिंदर सच्चर, गौतम नवलखा, मनु धन आदि के साथ मिलकर देश में माओवादियों से शांतिवार्ता करने की असफल कोशिश की। वे माओवादियों द्वारा अपह्त किए गए तीन पुलिस वालो को छुड़ाने में कामयाब रहे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह से भी माओवादियेां के साथ बातचीत करने की अपील की थी।

वे पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव के भी काफी करीब थे। वे समस्या सुलझाने की कोशिश में अपने हाथ जला लेने के लिए भी जाने जाते थे। जब इंडियन एक्सप्रेस में हड़ताल हुई तो उन्होंने प्रबंधको के साथ मध्यस्थता करने की कोशिश की मगर यूनियन ने उनकी मध्यस्था को स्वीकार नहीं किया। जब अन्ना ने 2011 में भष्ट्राचार विरोधी आंदोलन शुरू किया तो वे भी उससे जुड़े। उस दौरान उनका एक वीडियो काफी प्रचलित हुआ जिसमें उन्हें सरकार को यह कहते दिखाया गया कि वे आंदोलनकारियों से सख्ती से निपटे। इसके बाद स्वामी ने इस संगठन को उन्हें बदनाम करने का आरोप लगाते हुए संगठन से अलग हुए तमाम आला नेताओं व पदाधिकारियों की तरह अलग होने का ऐलान कर दिया।

जब उन्होंने पुरी में चर्चित जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं के प्रवेश देने की वकालत की तो उनके खिलाफ वहां जमकर विरोध प्रदर्शन हुए व उनका पुतला तक जलाया गया। उन पर कश्मीर व बाबा अमरनाथ के खिलाफ अपमान जनक बातें करने के आरोप भी लगे व तमाम हिंदू संगठनों ने उनकी जमकर आलोचना की। तब सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज एचएल दत्तू व सीके प्रसाद की खंडपीठ ने उनसे कहा था कि वे लोगों को आहत करने वाली बाते कहने के पहले अपने शब्दों को तौल लिया करें। उसके बाद ही उन्हें बोला करे। हिंदू विरोधी बयानों के कारण 2018 में झारखंड में उन पर हमला भी हुआ।

वे बिगबॉस में भी शामिल हुए व उन्होंने टीवी पर कुछ कार्यक्रम भी दिए। इस पर आर्य समाज उनसे काफी नाराज हो गया। उनका कहना था कि वे तो समाज में जागरूकता फैलाने के लिए यह सब कर रहे हैं। उनके मरने के बाद सीबीआई के अंतरिम अध्यक्ष रहे रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी ने कहा कि उनके निधन के कारण एक मुसीबत से छुटकारा मिल गया है। वे भेड़ की खाल में ऐसे शेर थे जो घोर हिंदू विरोधी था। बाकी उन्होंने शेर की जगह भेडिया शब्द लिखा। उन्होंने लिखा कि मेरी यमराज से यही शिकायत है कि उन्होंने उन्हें उठाने में इतना समय क्यों लगाया। वहीं भाजपा नेता पीकुटलीधर राव ने कहा कि किसी के मरने के बाद आलोचना नहीं करते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं व नया इंडिया से जुड़े हैं)

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