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आतंकियों की हमदर्द जम्मू कश्मीर सरकार

देश के अंदर राजनीति इस हद तक गिरने पर उतारू हो जाएगी ऐसा कभी सोचा भी नही था। कोई दलितों के नाम पर राजनीति कर रहा है, कोई पटेलों पर तो कहीं जाटों पर। राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि कर्नाटक में सत्ता हथियाने के लिए लिंगायत समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर उसको भी अलग से धर्म मान लिया गया। कहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 1984 के सिख दंगों के आरोपी कांग्रेसी नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को लेकर सांप्रदायिक सद्भावना के लिए दिल्ली के राजघाट पर 5 घंटे का उपवास रखते हैं। तो ऐसे माहौल में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती चुप क्यों रहे। उसने भी अपने पुराने साथियों को एकत्र करने का कार्य शुरु कर दिया। तभी तो सीएम को देशद्रोहियों और देशभक्तों में अंतर नजर नहीं आ रहा। इसलिए तो महबूबा मुफ्ती पत्थरबाजों और सुरक्षाबलों में गलत और ठीक का आकलन जानबूझकर नहीं करना चाहती। देश में चारों ओर सभी दल राजनीति में अपने चहेते वोट बैंक को इकट्ठा करने में व्यस्त हैं। तो माहौल का फायदा उठाने में महबूबा मुफ्ती क्यों पीछे रहे। उसने भी अपने पुराने हमदर्द रहे अलगाववादियों को फिर राजी करना शुरू कर दिया है।

महबूबा को सत्ता जाने का डर सताने लगा कि उनकी विपक्षी पार्टी के नेता पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला इस समय अलगाववादियों के सबसे बड़े समर्थक बने हुए हैं। लेकिन ये नया नहीं है। जम्मू-कश्मीर में जो भी दल सत्ता से बाहर हो जाता है। तो उस दल को पत्थरबाज और अलगाववादी नेता बेचारे लगने शुरू हो जाते हैं। चुनाव में अलगाववादियों और पत्थरबाजों का समर्थन नेशनल कांफ्रेंस को नहीं मिल जाए। जिसके कारण पीडीपी को सत्ता से बाहर का रास्ता न देखना पड़े। इसलिए जम्मू-कश्मीर सरकार घाटी में सुरक्षाबलों पर पत्थर फैंकने वाले पाक-प्रेमी पत्थरबाजों के केस वापस लेकर सरकार आतंकवाद की पैरोकार बनती जा रही है।

जहाँ सुरक्षाबल आतंकवाद के खात्मे के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगाते है., और आतंकवादियों के खिलाफ कोई मुहिम चलाते हैं। तो घाटी के पत्थरबाज सेना के जवानों के ऊपर पत्थरबाजी करते हुए। आतंकवादियों को बचाने की कोशिश करते हैं। जिससे सेना को दो मोर्चों पर एक साथ लड़ना पड़ता है। एक ओर पत्थरबाज और एक ओर आतंकवाद। सेना के कार्य में बाधा डालने वाले इन मिनी आतंकवादियों पर आखिरकार राज्य सरकार इतनी मेहरबान क्यों हो गई है। हाल ही में घाटी के कंगन में नकाबपोश प्रदर्शनकारी पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन में एक पत्थरबाज की मौत होने पर राज्य की मुखिया पत्थरबाजों और अलगाववादियों को खुश करने के लिए एक पुलिसकर्मी के खिलाफ कारवाई करते हुए उसको सस्पैंड कर उसके खिलाफ कार्रवाई करने का हुक्म देती है। जबकि सेना पर पत्थरबाजी का जिक्र तक भी नहीं करती।

पिछले दिनो मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सुरक्षाबलों पर पथराव करने वाले पाकिस्तान प्रेमी 9730 पत्थरबाजों का केस वापस लेने की मंजूरी देकर सुरक्षाबलों के मनोबल को कमजोर करने का काम किया है। ये पत्थरबाज घाटी में मिनी आतंकवादी ट्रेनरों को भटके हुए युवा बताकर महबूबा सरकार उनकी पैरोकार बन गई है। इतना ही नही 2008-10 के दौरान मसरत आलम को राष्ट्रविरोधी प्रदर्शनों का मास्टरमाइंड था। इन दो-तीन साल में पत्थरबाजी की कई घटनायें हुई जिसमें करीब 112 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। मसरत के खिलाफ देशद्रोह के मामले सहित कई अन्य मामले दर्ज हैं। दस लाख रुपये का ईनामी आतंकवादी मसरत को अक्टूबर 2010 में गिरफ्तार किया गया था। जिसे 1 मार्च को मुफ्ती के राज्य के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद छोड़ दिया गया।

महबूबा सरकार घाटी में ये सब तब कर रही है, जब घाटी में उसकी सहयोगी पार्टी भाजपा है। जो राष्ट्रवाद के नाम पर जम्मू-कश्मीर हिंदुओं की घर वापसी, अनुच्छेद-370 का मामला उसके घोषणा पत्र में शामिल था। लेकिन भाजपा की ऐसी क्या मजबूरी है कि उसको घाटी में ऱाष्ट्रविरोधी और राष्ट्रभक्तों में कोई फर्क नजर नहीं आता है। और इस सारे मसले को वो आखें बंद करके देखने में व्यस्त है। शायद भाजपा इस समय अपने गठबंधन धर्म के कारण न बोल पा रही हो लेकिन गठबंधन धर्म सुरक्षाबलों के आत्म-सम्मान और उनकी जान से ऊपर है, क्या ?

अगर ऊपर है, तो कहीं सैनिकों के सम्मान के साथ हो रही राजनीति किसी ओर नए राष्ट्रवाद को जन्म न देदे।

जहाँ आम लोगों की सुरक्षा के लिए किसी प्रकार की कोई घटना घाटी में न घटे तो सेना का एक अधिकारी एक पत्थरबाज को ढाल बनाकर होने वाली अनहोनी घटना को रोकता है। तो उसके खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज करवाने का आदेश सरकार देती है। इसी प्रकार सेना की टुकड़ी पर हमला करने वाले के खिलाफ जब सेना बचाव पक्ष में गोली चलाती है, तो उस मामले में भी सेना के मेजर आदित्य सहित अन्य सेना के जवानों पर आईपीसी की धारा 302 और 307 के तहत एफआईआर क्यों दर्ज करवाई जाती है ? ये एफआईआर क्या महबूबा ने पाकिस्तान को खुश करने के लिए दर्ज करवाई। इस बात का जवाब न तो पीडीपी के पास और न ही उसकी सहयोगी पार्टी भाजपा के पास है। इतना ही नहीं जिस गुप्तचर विभाग के आईपीएस अधिकारी की सूचना पर इनामी आतंकी बुरहानवानी का एनकाउंटर किया जाता है। तो उस अधिकारी का तबादला जम्मू-कश्मीर से दिल्ली करा दिया जाता है।

क्यों नहीं मस्जिद के बाहर अपनी डयूटी पर तैनात डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की अलगाववादी नेता मीरवाइज के समर्थक हत्या कर देते हैं। तो उसके पूछताछ के लिए एक बार भी मीरवाइज उमर फारूक और वहां मौजूद उनके समर्थकों में से किसी को भी एक बार भी थाने में भी नहीं बुलाया जाता है। क्यों नहीं आतंकियों के जनाजे में जानी वाली भीड़ के खिलाफ एके-47 से दी जाने वाली सलामी के खिलाफ रोक नहीं लगाई जाती ?

क्यों पत्थरबाजी और आतंकवाद के सबसे बड़े घाटी के अलगाववादी नेता गिलानी को रिहा कर दिया जाता है ? जो पिछले काफी समय से घर में नजरबंद था।

इन सब बातों को देखकर ध्यान में आता है कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों, पत्थरबाजों और आतंकवाद की सरकार ज्यादा हमदर्द बनती जा रही है। शायद महबूबा इन पत्थरबाजों और आतंकवादियों में उनके भटके हुए युवा इसलिए नजर आने लगे क्योंकि महबूबा की पार्टी उनको कहीं न कहीं अपना वोट बैंक नजर आ रहा है।

(लेखक जम्मू-कश्मीर विषयों के जानकार हैं। )



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