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कोरोना में उत्तर प्रदेश के जेल बंदियों के लिए टेलीफोन ही सहारा

लखनऊ और गौतबुद्ध नगर की जिला जेल सबसे आगे

शोध में करीब 16,000 बंदियों का आंकड़ा

महिलाओं को भी मिला फोन

उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों के लिए टेलीफोन बाहरी दुनिया से संवाद का सबसे जरूरी साथी बन गया है। कोरोना की वजह से भारत में बंदियों की मुलाकात पर रोक लगा दी गई है। मुलाकात बंदियों के लिए अपने परिवार से सीधे जोड़ने का प्रमुख माध्यम है। लेकिन इसके विकल्प के तौर पर अब टेलीफोन को प्रमुखता मिल गई है।

मुलाकात पर रोक के बाद से उत्तर प्रदेश की 69 जेलों में बंदियों के लिए फोन की निशुल्क सुविधा शुरु कर दी गई है। हाल में किए गए एक शोध में संवाद की इन जरूरतों को समझने के लिए राज्य की 5 जेलों- नैनी (केंद्रीय जेल), लखनऊ (जिला जेल), आगरा (जिला जेल), गाजियाबाद (जिला जेल) और गौतम बुद्ध नगर (जिला जेल) को शामिल किया गया था।

यह पांचों जेलें उत्तर प्रदेश की जेलों का प्रतिनिधित्व करती हैं। उत्तर प्रदेश भारत की सबसे ज्यादा आबादी का राज्य है और इन जेलों में क्षमता से ज्यादा बंदी हैं। इनमें महिला बंदी भी शामिल हैं। शोध में इन पांचों जेलों के करीब 15, 790 बंदियों के फोन के इस्तेमाल के आंकड़ों को शामिल किया गया।

यह सर्वेक्षण जेल सुधारक वर्तिका नन्दा के देश की जेलों पर किए जा रहे एक शोध का हिस्सा है। वे जेलों पर काम कर रही तिनका तिनका फाउंडेशन की संस्थापक हैं। इन आंकड़ों को उत्तर प्रदेश के जेल विभाग से लिया गया है।

सर्वेक्षण से यह साफ है कि जेलों में कोरोना काल में फोन-कॉल का अनुपात कम से कम तीन गुना बढ़ गया है। नोएडा और गौतम बुद्ध नगर की जिला जेलों में हर रोज किए जा रहे फोन में वृद्धि का अनुपात अधिकतम है। यहां पर फोन कॉल में 7 से सीधे 325 और 38 से 260 का उछाल दर्ज किया गया है। दिलचस्प बात यह भी कि कोरोना से पहले इन जेलों में महिलाओं ने एक भी फोन नहीं किया था और अब यह संख्या 25 और 5 पर है।

इस परिप्रक्ष्य में जेल में फोन की उपलब्धता भी गौर करने योग्य है। जिला जेल, लखनऊ में प्रति 435 बंदियों पर एक फोन जबकि केंद्रीय जेल, नैनी में प्रति 2079 बंदियों पर एक फोन उपलब्ध है।

उत्तर प्रदेश कारागार विभाग के महानिदेशक आनंद कुमार का कहना है कि कोरोना संकट की शुरुआत के साथ ही विभाग ने पूरी सक्रियता दिखाते हुए जेलों में टेलीफोन की सुविधा उपलब्ध करवा दी। जेल स्टाफ यह कोशिश कर रहा है कि सभी बंदियों को फोन के जरिए अपने परिवारों से संपर्क करने का पूरा मौका मिले।

वर्तिका नन्दा का कहना है कि जेलों में फोन की यह सुविधा जेल सुधार की दिशा में एक कारगर कदम है। संवादविहीन जेलों में अब संवाद की एक नई परंपरा बन रही है। यह जेलों में सुधार लाने और उन्हें मानवीय बनाने में मदद करेगा।

शोध से यह भी सामने आया कि कोरोना से पहले ज्यादातर जेलों में महिलाओं को फोन करने की सुविधा नहीं दी जाती थी क्योंकि फोन बूथ पुरुषों की जेल में लगे होते हैं। अब जेलों ने फोन लाइनों की सुविधा सभी बंदियों के लिए बराबरी के साथ उपलब्ध करवा दी है। जेल प्रशासन ने फोन ऐसी जगहों पर लगवा दिए हैं जहां महिलाओं के जाने पर पाबंदी नहीं है।

बंदी जेल में आए इस बदलाव से बेहद खुश हैं। फोन की सुविधा ने उनकी जिंदगी में सुकून दिया है लेकिन कई जेलों में बंदियों की बड़ी तादाद के सामने फोन की संख्या बहुत कम है। इसलिए अगली कॉल के इंतजार का समय 3 से 10 दिन के बीच का है। मौजूदा समय में एक बंदी को प्रति काल 2 से 5 मिनट तक बात करने की सुविधा है। जाहिर है, फोन बढ़ेंगे तो बंदिशों में जीती जेलों में तनाव कुछ कम होगा। मुलाकातें बंद होने से सिमटे संवाद के बीच फिलहाल फोन ही सबसे बड़ा आसरा है.

वर्तिका नन्दा के बारे में: देश की स्थापित जेल सुधारक और एक अनूठी श्रृंखला- तिनका तिनका- की संस्थापक। उनकी तीन किताबें- तिनका तिनका तिहाड़, तिनका तिनका डासना और तिनका तिनका मध्यप्रदेश जेलों की कहानी कहती हैं। सुप्रीम कोर्ट की जेलों की स्थिति की सुनवाई का भी हिस्सा बनीं। खास प्रयोगों के चलते महिलाओं के लिए देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान स्त्री शक्ति पुरस्कार से भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित। दो बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शामिल। दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज के पत्रकारिता विभाग में अध्यापन।

संपर्क : [email protected] / 9811201839

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