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अपनी मातृृभाषा कोंकणी को ऐसे बचा रहे हैं इंग्लैं ड में जा बसेरोशन पई

यह वर्ष 2005 की बात है जबकि आईटी कंसल्टंट रोशन पई काम के सिलसिले में इंग्लैंड गए थे। वे बहुत ही शांत चेल्टेनहम में रुके। वे बताते हैं, ‘मैं शाम को 5 बजे अपना काम खत्म कर लेता था और फिर मेरे पास बहुत सारा वक्त खाली रहता था। मैं इस वक्त का सही उपयोग करने के बारे में सोचने लगा।’

बेंगलुरु में जन्मे पई कोंकणी बोलते थे जो बहुत धीमे-धीमे मरती जा रही थी क्योंकि इस भाषा का डॉक्यूमेंटेशन नहीं था और सरकार की तरफ से कोई संरक्षण भी नहीं। पई बताते हैं, ‘गोआ के बाहर जहां कहीं भी यह बोली जाती है वहां इसे वैज्ञानिक तरीके से डॉक्यूमेंटेड नहीं किया गया है। इसकी कोई मानक शब्दावली (डिक्शनरी) भी नहीं है।

जब पई ने वेल्स के बाशिंदों की कहानी सुनी तो अपनी मातृभाषा के लिए कुछ करने का इरादा उनके मन में पक्का हो गया। वेल्स के बाशिंदों ने लगभग मर चुकी अपनी भाषा को फिर से जीवित कर लिया। उन्होंने सबसे पहले अपनी भाषा का डॉक्यूमेंटेशन किया। पई ने भी आगे बढ़ने के लिए यही रास्ता चुना।

ऑनलाइन पोर्टल सेवमायलैंग्वेज डॉट ओआरजी के जरिए शुरू किए गए कोंकणी डिक्शनरी प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं कि यह कोंकणी के शब्दों को वैज्ञानिक रूप से दर्ज करने का काम करता है।

यह डिक्शनरी 10 वर्ष की हो रही है और करीब 15 हजार शब्दों का डेटाबेस तैयार हो गया है। अनुमान है कि करीब 30 हजार शब्द ऐसे हैं जो मूलत: मैंगलोर के निकट से आए हैं। सभी शब्दों को अल्फाबेटिकल ऑर्डर में जमाया गया है। यह पूरा प्रोजेक्ट वॉलिन्टियर के सहारे चलाया गया जहां कि लोग शब्द और उसका अर्थ देते गए।

लेकिन पई का कहना है, ‘सभी शब्द डिक्शनरी में ले लिए गए हों ऐसा नहीं है। जो भी शब्द हमें मिले हमने पहले उनका रिव्यू किया, उन्हें केटेलॉग में डाला और फिर भाषाविदों की सहमति से ही उन्हें डिक्शनरी में जगह दी।’ 35 वर्षीय पई अपने बूते ही इस पूरे प्रोजेक्ट को चलाए हुए हैं और आने वाली चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘जब मैंने यह साइट शुरू की थी तब इस भाषा को समझने की मेरी योग्यता कमजोर थी। भाषा ज्ञान कम था और शब्दों को जोड़ने का हुनर भी नहीं आता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है।’

बेंगलोर के एक बैंकर जयंत भट इस साइट के लिए सबसे ज्यादा योगदान करने वाले शख्स हैं। चूंकि उन्हें बचपन की स्मृतियां थीं तो उन्हीं से उन्हें प्रेरणा मिली। वे कहते हैं, ‘इस भाषा के लिए काम करते हुए मुझे अपने बचपन के दिनों की याद आती है। उन दिनों में मेरे माता-पिता शुद्ध कोंकणी बोलते थे। मैं आने वाली पीढ़ी के लिए भाषा या बोली ही नहीं बल्कि एक पूरी संस्कृति बचाना चाहता हूं।’

फेसबुक हमारे लिए वरदान की तरह रहा। हमने कोंकणी को लोकप्रिय करने के लिए इंटरनेट को माध्यम चुना। लोग हमारी रोज की अपडेट चेक करते हैं यह हमें प्रेरित करता है।’

– रोशन पई

साभार http://naidunia.jagran.com/ से

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