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बैंकों के आगे ये लंबी लाईन क्यों है

मिडिया वाले रोज ये दिखा रहे है कि सरकार के 500₹/1000₹ के नोट बंदी के फैसले के कारण लोग परेशान हो रहे है। बैंक वाले जनता को परेशान कर रहे है।

पर क्या ये सच है ???? नहीं ये असत्य है।

1.एक वेतनधारी व्यक्ति का एक माह का अधिकतम खर्च 20,000₹ मासिक होता है, जबकि वह अपने खाते से 24,000₹ सप्ताह के निकाल सकता हैं, यानी 96,000₹ महीना। फिर क्या परेशानी है???

2. व्यापार करने वालो के लिए 50,000₹ साप्ताहिक की लिमिट है, यानि 2,00,000₹ महीना।।
क्या अच्छे से अच्छा करोड़पति भी घर खर्च 2 लाख रुपये से ज्यादा करता होगा ??

3. निर्धन लोगो के लिए सरकार द्वारा 2 साल से जनधन योजना में खाते खोले जा रहे है और सभी लोगो के बैंक में खाते भी है। फिर वो क्यों अपने खातों में अपना साप्ताहिक या प्रतिदिन का भाड़ा नकद में ले रहे है?? क्या एक मजदुर का रोज का खर्चा 4000₹ प्रतिदिन है???

ये जितनी भी भीड़ बैंक में लगी है ये पूरी भीड़ कालेधन वाले लोगो ने करवा रखी है जो मजदुरों और गरीबों को रोज 4000₹ बदलवाने पर 400₹ से 500₹ प्रतिदिन देते है।
ये लोग भी इस लालच में सुबह 5-6 बजे से बैंक में लग जाते है। फिर एक बैंक से दूसरे बैंक में फिर तीसरे बैंक में।

ऐसे ये लोग रोज के 1000₹ से 1500₹ कमा रहे है। और धन्नासेठों का काला धन धीरे धीरे नए नोटों में बदलता जा रहा है।
वरना जो गरीब कर्जे में डुबा हुआ रहता था आज उसके जनधन खाते में रोज 49500₹ कहाँ से आ रहे है ??

कृपया बैंक वालो और सरकार को कोई दोष ना दे। बैंक वाले पिछले 10 दिनों से बिना किसी शिकायत के दिन-रात देखे बिना काम पर लगे हुए है।

आप लोगों के लिए संकट यहाँ भी काले धन वालो ने और उनके एजेंट जिनकी नोट बदलने की रेट 20% से 50% चल रही है उन्होंने खड़ा कर रखा है।

कृपया सोचें….

500₹ और 1000₹ के नोटों के चक्कर में न ट्रेनें रूकी है, न बसें, न मोटरकार, न हवाई जहाज, न बैलगाड़ी, न घोड़ागाड़ी… फिर समस्या कहाँ है ?

अफरा-तफरी कहाँ है ?

500₹ और 1000₹ के नोटों के चक्कर में न राशन की दुकान बंद है, न रेस्टोरेंट,न फल, न सब्जी का बिकना बंद है..

फिर समस्या कहाँ है ? अफरा-तफरी कहाँ है ???

न स्कूल बंद है, न कॉलेज, न सरकारी दफतर बंद है, न कारखाना, न जेल बंद है , न मजिस्ट्रेट का आदेश…

फिर अफरा-तफरी कहाँ है दोस्तों..??

यह अफरा-तफरी ब्लैकमनी समर्थकों के दिमाग से लेकर मीडिया तक और फेसबुक और व्हाट्सअप पर है।

ये वही लोग हैं जो कल तक ब्लैकमनी पर कोई कठोर कदम नहीं उठाने के कारण भा.ज.पा. सरकार को क्या-क्या कह रहे थे…*

जब उठा लिया तो इनके टी.वी. चैनलों और सोशलमीडिया की पोस्टों पर अफरा-तफरी मची है।

किसी ने आर्थिक आपतकाल कह दिया तो किसी ने तानाशाही कह दीया तो किसी ने तुगलक कह दिया….

इससे पहले सब फेंकू कह रहे थे। जब फेंकू ने फेंक दिया तो कैच संभालना मुश्किल हो रहा है… ।*

ये आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक चुपचाप ही हो सकता था तभी आर्थिक सामनता आती।*

छदम आर्थिक सामनता के नाम पर बड़ी लम्बी-लम्बी पोस्ट लिखने वाले लोग जो मूलत: *मोदी* विरोध हैं अभी इस सर्जिकल स्ट्राइक की अफरा-तफरी को ऐसे पोस्ट कर रहे हैं जैसे पूरा देश अशांत हो गया।

यकीन मानिए आपके बच्चों का भविष्य उज्जबल है…*

आपके बच्चे आने वाले समय में आर्थिक असमानता की दिनों दिन लम्बी होती जा रहा खाई से बहुत ज्यादा परेशान नहीं होंगे।

ऐसे समझिये इसे मेरे पड़ोसी में एक सरकारी बाबू है जिसे पता नहीं है कि मोल-भाव करना क्या होता है… मोहल्ले में ठेले पर सब्जी बेचने आता है उसकी बीबी कभी मोल भाव नहीं करती है… बाकी औरतें सब्जी वाले से मोल-भाव करती है। अब, जब सरकार ने नोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया तब जानते हैं उसकी बीबी भी कल मोल-भाव करते देखी गई…. इस बदलाव को समझिये कि पचास रूपये की सब्जी खरीदने के बाद कल वह धनिया और हरी मिर्च फोकट में माँग रही थी… इससे पहले वह दस-दस रूपये की धनिया और हरी मिर्च अलग से लेती थी।*

काला धन आपके व्हाइट मनी को निगल जाता है । इसे ऐसे समझिये…

जिस घर को खरीदने के लिये आप दस साल तक मुँह पर लेवा (Closed your mouth) लगा कर रखते हैं, दस साल बाद वह घर आपके खरीद से फिर उतनी ही दुरी पर रहता है…*

यह दूरी ब्लैकमनी का होता है जो हमेशा आपके पहुँच से बाहर होता है।*

और जिसके पास ब्लैकमनी होता है वह चुपचाप कैश पेमेंट कर देता है… जानते हैं बिल्डर खुलेआम 50% ब्लैकमनी माँगता है।*

दोस्तों, थोड़ा सब्र कीजिये, कस्ट कीजिये.. बैंकों में लगी लम्बी लाइन को व्यवस्थित करने में मदद कीजिये.. भविष्य में आपका भी अपना घर उसी इनकम में होगा जो अभी है !

बड़ा बदलाव छोटी-मोटी परेशानी लेकर आता ही है। हो सकता है मोदी सरकार से कुछ चीजें छूट गई हो.. उसे सुधरवाने के लिये स्वच्छ दिमाग से कोशिश करें, दबाब ना बनायें… और साथ दे इस आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक में, कि दुबारा ब्लैकमनी जमा नहीं हो पाये, *ना कि सरकार का उपहास उड़ायें।

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