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इस देश में सबसे बड़ा गुनाह है, हिन्दू होना और राष्ट्रवादी होना

जेएनयू में देश-द्रोही नारे लगाने वाले छात्रों को समर्थन देने कई नेता पहुंच गए लेकिन श्रीनगर एन.आई.टी. में देश-भक्ति जताते छात्रों के पास कोई नहीं गया। शनि-मंदिर में हिन्दू स्त्रियों को ‘अधिकार’ दिलाने कई टीवी चैनल कूद पड़े। पर सायरा बानो जैसी मुस्लिम स्त्रियों को तीन तलाक या चार बीवियों वाले जुल्म से अकेले लड़ने में किसी टीवी चैनल ने साथ नहीं दिया। क्या यह मजहबी रंगत वाले मामलों में हर कदम पर दोहरापन नहीं दर्शाता है? जवाब यही है कि यह घोर सांस्कृतिक अन्याय है! इस जुल्म में सरकार, मीडिया और न्यायालय – तीनों शामिल हैं। समय-समय तीनों मानते भी हैं कि ऐसा है, फिर भी इसे दूर करने को कुछ नहीं करते। यह अन्याय इतना खुलकर होता है कि अन्याय नहीं लगता! पर याद रहे, सारी दुनिया में सामाजिक-आर्थिक अन्याय से अधिक तीखेपन से लोग सांस्कृतिक अन्याय महसूस करते हैं! स्वयं भारत का पिछले सौ साल का इतिहास गवाह है कि सर्वाधिक कटुता, हिंसा और राजनीति इसी मामले में हुई है। कम्युनिस्टों और सेक्यूलरिस्टों द्वारा लीपा-पोती से सचाई छिप नहीं सकती।

दुर्भाग्यवश, चालू अन्याय का एक स्त्रोत भारतीय संविधान में भी है, चाहे यह बेध्यानी में शुरू हुआ हो। संविधान में सभी धर्मों की समानता की बात कहीं नहीं लिखी। बावजूद इसके यह केवल ‘अल्पसंख्यक’ धर्मों की फिक्र करता है। हिन्दू धर्म की करता ही नहीं! यही हाल सांप्रदायिकता वाली सारी बहसों का है। कुछ लोग भारत के बहुसंख्यक धर्म या धर्मावलंबियों को स्वतः-सुरक्षित मानते हैं। इस से बड़ा प्रमाद कुछ नहीं हो सकता। ऐतिहासिक अनुभव, जनसांख्यिकी और विभिन्न धर्म-मजहबों का स्वभाव – सभी इस के ठीक विपरीत गवाही देते हैं।

वस्तुतः संविधान की धारा 26 से 30 ऐसी विकृति की शिकार है, जिस की संविधान निर्माताओं ने कल्पना तक नहीं की थी। संविधान में समुदाय रूप में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का कई बार प्रयोग है, जबकि ‘बहुसंख्यक’ का एक बार भी नहीं। यानी, बहुसंख्यक के लिए कोई प्रावधान नहीं। आशय यह नहीं था कि वे अल्पसंख्यक को ऐसे अधिकार देना चाहते थे, जो बहुसंख्यक को न मिले। बल्कि वे मानकर चल रहे थे कि बहुसंख्यकों को तो वह अधिकार होंगे ही! फिक्र यह थी कि किन्हीं कारणों से अल्पसंख्यकों को उन अधिकारों से वंचित न रहना पड़े। इसलिए उन्हें बहुसंख्यकों के बराबर सभी अधिकार मिले रहें, इसलिए धारा 30 जैसे उपाय किए गए। धारा 30 (2) को पढ़कर साफ हो जाता है कि संविधान निर्माताओं की यही भावना थी।

किन्तु हिन्दू-विरोधी, वामपंथी, इस्लामी नेताओं, बुद्धिजीवियों ने धीरे-धीरे उन धाराओं का अर्थ कर दिया कि अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार हैं। यानी ऐसे, जो बहुसंख्यकों यानी हिन्दुओं को नहीं दिए जा सकते। उसी मनमानी का दैनिक व्यवहार यह हो गया है कि धारा 25 से लेकर 31 तक की व्याख्या और उपयोग हिन्दू धर्म और समुदाय के प्रति निम्न, घटिया भाव रख कर किया जाता है। इसीलिए हिन्दू मंदिरों, संस्थाओं और न्यासों पर जब चाहे सरकारी या न्यायिक हुक्म आ जाते हैं। काशी से आंध्र, कर्नाटक तक मंदिरों पर जब-तब हुक्म चलाए जाते हैं।
संविधान की धारा 31 (ए) के अंतर्गत धार्मिक संस्थाओं, न्यासों की संपत्ति का अधिग्रहण संभव है। सुप्रीम कोर्ट ने काशी विश्वनाथ मंदिर के श्री आदिविश्वेश्वर बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (1997) के निर्णय में कहा, ‘किसी मंदिर के प्रबंध का अधिकार किसी रिलीजन का अभिन्न अंग नहीं है।’ तदनुरूप अनेक मंदिरों का अधिग्रहण कर सरकार ने उन्हे अपने हाथ ले लिया। उन मंदिरों, न्यासों से होने वाली आय का सदुपयोग, दुरुपयोग राजकीय अधिकारियों और मंत्रियों की मनमर्जी से होता है।

इस में अन्याय यह है कि धारा 31(ए) का प्रयोग केवल मंदिरों पर होता रहा है। कोई चर्च, मस्जिद या दरगाह कितने भी घोटाले, विवाद या गड़बड़ी की शिकार हों, उन पर सरकार हाथ नहीं डालती। जबकि संविधान की धारा 26 से लेकर 31 तक, कहीं किसी विशेष रिलीजन या मजहब को छूट या विशेषाधिकार नहीं लिखा है। उन धाराओं को स्वयं पढ़ कर देखें। कोर्ट के निर्णयों में भी ‘किसी धार्मिक संस्था’ या ‘ए रिलीजन’ की बात की गई है। मगर व्यवहारतः केवल हिन्दू संस्थाओं पर राज्य की वक्र-दृष्टि उठती है। चाहे बहाना कुछ भी हो।

इस प्रकार, यहाँ केवल हिन्दुओं को अपने धार्मिक-शैक्षिक-सांस्कृतिक संस्थान चलाने का वह अधिकार नहीं, जो अन्य धर्मावलंबियों को है। इस हीन स्थिति के कारण ही हिन्दू धर्म से बचने, निकलने की प्रवृत्ति बनी है। कमजोर के साथ कौन रहना चाहता है? कलकत्ते में रामकृष्ण आश्रम ने कोर्ट में अर्जी दी थी कि उसे हिन्दू न माना जाए। क्यों? क्योंकि गैर-हिन्दू मान्यता मिलते ही उसे वह ताकत मिल जाती जो ‘अल्पसंख्यक’ को है! इन वैधानिक अन्याय की अनदेखी करना आँख रहते अंधे बनने का नाटक है।

यह अन्याय व्यक्तिगत स्तर पर भी है। कानूनी दृष्टि से भी गैर-हिन्दू को जहां दोहरे अधिकार हैं जबकि हिन्दू को केवल एक। कोई मुस्लिम देश के नागरिक और अल्पसंख्यक, इन दोनों रूपों में कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। कोई हिन्दू केवल नागरिक रूप में। वह हिन्दू के रूप में कोर्ट से कुछ नहीं माँग सकता। क्योंकि संविधान में ‘बहुसंख्यक’ का उल्लेख ही नहीं! इस प्रकार, समुदाय, संस्थान और व्यक्ति, हर तरह से यहाँ हिन्दू अनाथ, बेचारा है।

कोर्ट ने भी संविधान की 26-31 धाराओं का वह अर्थ कर दिया, मानो अल्पसंख्यकों को वैसे अधिकार हैं जो बहुसंख्यकों को नहीं। हज सबसिडी की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका (जनवरी 2011) पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह संविधान अनुरूप नहीं। किन्तु कोर्ट के अनुसार इस में ‘बड़ी रकम’ नहीं जाती, इसलिए इसे धारा 27 का उल्लंघन न माना जाए। मानो दस रूपए की पॉकेटमारी करना अपराध नहीं हो! ऐसे विचित्र तर्कों से अल्पसंख्यकों को तरह-तरह के विशेषाधिकार दिए गए। सारे अल्पसंख्यक मंत्रालय, आयोग, आदि उन के अन्य सत्ता-भोग केंद्र के सिवा कुछ नहीं। यह सब संविधान में ‘समानता’ के मौलिक अधिकार का खुला मजाक है।

मस्जिदों, चर्चों के अवैध कार्यों में लिप्त होने पर भी उन का अधिग्रहण नहीं होता। केरल, गुजरात और पश्चिम बंगाल में मस्जिदों का आतंकवादियों द्वारा दुरुपयोग करने की कई घटनाएं हुई। कई जगहों से चर्च द्वारा माओवादियों, अलगाववादियों की मदद करने की खबरें भी आईं। दिल्ली जामा मस्जिद से ही अनेक राजनीतिक, भड़काऊ भाषण हुए हैं। क्या यह मस्जिद और चर्च में गड़बड़ी नहीं? तब केवल काशी विश्वनाथ या तिरुपति जैसी धार्मिक संस्थाओं पर ही राजकीय नियंत्रण क्यों? यह सब भारत में हिन्दुओं का हीन दर्जा दिखाता है जो अपनी धार्मिक-शैक्षिक-सांस्कृतिक संस्थाएं उसी अधिकार से नहीं चला सकते जो ईसाइयों और मुस्लिमों को हासिल हैं।

यह चलन घोर अन्याय के साथ-साथ सेक्यूलर नीति के भी विरुद्ध है। सेक्यूलर शासन का पहला अर्थ है कि धार्मिक आधार पर राज्य नागरिकों में भेद-भाव न करे। जबकि भारत में धारा 26-31 का सारा कारोबार इस मान्यता पर है कि हिन्दू मंदिरों, आश्रमों को चर्च या मस्जिदों की तुलना में कम अधिकार हैं।

दुनिया के किसी देश में ऐसा नहीं, जहाँ अल्पसंख्यकों को वे अधिकार हों, जो बहुसंख्यकों को नहीं। मगर भारत में यही है। यह हिन्दुओं की अचेतावस्था का प्रमाण है। हिन्दू संगठनों के निकम्मेपन का भी। वे समान नागरिक संहिता पर हो-हल्ला करते हैं, जो न महत्वपूर्ण है, न आसान; क्योंकि उस में मुस्लिमों का कुछ छिनेगा। जबकि संविधान की धारा 26 से 31 को हिन्दुओं के लिए भी बराबर लागू करने में दूसरों का कुछ नहीं जाएगा। केवल हिन्दुओं को भी वह मिलेगा जो दूसरों को मिला हुआ है। इसलिए यह लड़ाई आसान है, पर है अधिक महत्वपूर्ण। इसे जीतने में देश की अनेक राजनीतिक समस्याओं का समाधान भी छिपा है।

साभार – nayaindia.com से

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2 टिप्पणियाँ
 

  • Rajeev Khaneja

    अप्रैल 14, 2016 - 9:03 pm

    In my view only Hindus are responsible for this.if you see any where in the world.whenever minorities have locked horns with majority.the former have suffered but not in India because of the generosity to the extent of foolishness of Hindus and lack of unity
    Only country in the world where majority suffers

  • Arun C. Shah

    अप्रैल 14, 2016 - 9:29 pm

    Bhagwan sab hinduonko sadbuddhi de

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