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पत्रकारिता से कई अपेक्षा रखती डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ की पुस्तक ‘पत्रकारिता और अपेक्षाएँ’

डॉ. अर्पण जी जैन ‘अविचल’ की पुस्तक ‘पत्रकारिता और अपेक्षाएँ’ अपने नाम को सार्थक करने के साथ-साथ पाठकों की अपेक्षाओं पर भी पूरी तरह खरी उतरी है। लेखन से ज्ञात हुआ कि पत्रकारिता का इतिहास और आज के समय की पत्रकारिता में ज़मीन-आसमान का अंतर आ चुका है। आज के समय में निष्पक्ष पत्रकारिता एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।वाकई यह पाञ्चजन्य शंखनाद के ही समान है। सांस्कृतिक अखण्डता, परम्पराएँ, राजनैतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व और राष्ट्रीयता की संवाहक, संरक्षक, संपोषक भारतीय पत्रकारिता है।

‘भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता का इतिहास’ पढ़ते हुए विदित हुआ कि कलकत्ता गज़ट, हिंदी का पहला साप्ताहिक पत्र ‘उद्दण्ड मार्तण्ड’ के बाद ही कई भाषाओं में पत्रकारिता विकसित हुई। ‘ज़िद्दी ख़बरों का आईना के माध्यम से लेखक ने बड़े ही रोचक तरीके से जैसे पराड़कर के त्याग के भाल से, चतुर्वेदी और विद्यार्थी के झोले से लेकर प्रेमचन्द के संघर्ष से होकर गुज़री ख़बरों की बेताबी को दर्शाया है। प्रारम्भ से ही पत्रकारिता का प्रयोग देश में जागरुकता लाने के लिए किया जाता रहा है। भारतेंदु हरिश्चंद्र, पंडित जुगल किशोर, गणेशशंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी आदि कई विद्वतजनों ने हिंदी पत्रकारिता के जो मानदंड स्थापित किये, आज की पत्रकारिता के आधार स्तम्भ हैं। ख़बरों की महत्ता बताते हुए कूड़ेदान, संपादक से लेकर पाठक तक संघर्ष कर पहुँचती ख़बर ही स्वर्णिम युग लिख पाती है। आपकी पुस्तक पढ़ते हुए महसूस हो रहा है कि आपने लिखते समय पूरी निष्पक्षता के साथ जनता, पाठक, संपादक, पत्रकार सभी के साथ न्याय किया है। यह आपके लेखन कौशल और साहित्यिक अनुभव का ही परिणाम है।

आज ख़बरों पर बाज़ारवाद के प्रभाव से बदरंग होती पत्रकारिता की पीड़ा को समझते हुए आपका लेखन स्वतः ही पाठक से जुड़ जाता है। यह आपके लेखन की सार्थकता है। सत्यता की खोज कर पाने में सक्षम ज़िद्दी ख़बरें ही पाठक के मन मस्तिष्क से जुड़ने का सामर्थ्य रखती हैं। जनमानस का आंकलन करते हुए समाज के उच्चताप को ख़बरें किस प्रकार नियंत्रित करती हैं, यह सुदृढ़ पत्रकारिता से ही सम्भव है, जैसा कि आपने स्पष्ट किया है। भारतीय पत्रकारिता स्वतंत्र रूप से विकसित हुई है, भारत की आज़ादी में भी पत्रकारिता का अभूतपूर्व योगदान रहा है। पत्रकारिता के नए कलेवर में पत्रकारिता के विस्तार के साथ-साथ नैतिक चारित्रिक पतन भी हुआ है।संपादकों से हिंदी की अपेक्षाएँ स्पष्ट करते हुए बताया है कि संपादक रीढ़ की हड्डी होता है। आज भाषा की मौलिकता और भयाक्रांत पत्रकारिता को संपादक ही बचा सकता है।

मध्यांतर में विदेशी भाषा की स्वीकार्यता बढ़ने के चलते हिंदी के अस्तित्व पर ज़रूर खतरा मंडराने लगा था, परन्तु वर्तमान समय में हिंदी पत्रकारिता ने हिंदी में पुनः प्राण फूंक दिए हैं। इसका अधिक से अधिक श्रेय जाता है सूचना और संचार क्रांति को। आज की तकनीकी, इंटरनेट, मोबाइल पत्रकारिता, वेब दुनिया को और कम्प्यूटर साक्षरता के बढ़ते प्रतिशत ने हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में कई नए आयाम खोल दिये हैं। इंटरनेट के कारण ही आज वेब पत्रकारिता, मोबाइल पत्रकारिता बहुत प्रचलित हो गए हैं, जिन्हें आधार बनाकर आज के युवा हिंदी पत्रकारिता को नई ऊँचाइयों पर ले जा रहे हैं। पाठकों की रुचियों का ध्यान रखते हुए उन्हें हर तरह की जानकारी एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने, उन्हें देश दुनिया से जोड़ने में हिंदी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान है। यही आकर्षण हर युवा को इस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के लिए अवश्य प्रेरित कर रहा है।

पानी को बाँधा तो सरोवर, मोतियों को बाँधा तो हार के माध्यम से पत्रकारिता को पक्षकारिता से बचाने के लिए आचार संहिता की आवश्यकता को बहुत ही सहजता से स्पष्ट किया है।अपने को श्रेष्ठ बताने की लालसा में जनता की पीड़ा, धरने, प्रदर्शन, रैली, विरोध सब दब कर रह गए हैं। लोकतंत्र के चार स्तम्भों में से एक स्तम्भ पत्रकारिता है, जिसका कार्य है सत्ता को भटकाव से बचाकर जनमत के सवालों को सरकार तक पहुँचाना। आपके वक्तव्य के अनुसार ‘अगर पत्रकारिता स्तम्भ मज़बूत होगा तो न जनता भयाक्रांत होगी और न पत्रकारिता’। परन्तु आजकल पत्रकारिता में गम्भीरता और सजगता की कमी, राजनैतिक दबाव, बाज़ारवाद का प्रभाव देखने को मिलता है। यह लोकतंत्र के लिये घातक है। पत्रकारिता की लक्ष्मणरेखा स्पष्ट करते हुए आपने भूतपूर्व प्रधानमंत्री के बहुत ही प्रभावपूर्ण कथन .. कि -“भारत एक भूमि का टुकड़ा नहीं एक जीता जागता राष्ट्रपुरुष है’ ने हम सभी पाठकों की चेतना को जगा दिया है।

लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने अपनी पुस्तक ‘पत्रकारिता और अपेक्षाएँ’ में लिखा है कि देश में जब से सेंसरशिप लागू की गई तब से क़लम की ताक़त कम हो गई है।पत्रकारिता के मानक नहीं मान्यता बदलकर वर्तमान समय की पत्रकारिता को अवमूल्यन से बचा सकते हैं। हम इतिहास की किताबों को खोलकर पढ़ें, उन्हें आत्मसात करें तभी आदर्श स्थापित कर पाएँगे। डॉ. अर्पण जी जैन की क़लम को सार्थक करने की दिशा में कदम बढ़ाएँ, तभी पत्रकारिता और अपेक्षाओं के साथ हम भी अपेक्षाओं पर खरे उतरे पाए। क्योंकि राष्ट्रपुरुष के प्रति हमारे भी तो कुछ कर्त्तव्य हैं ही।

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के संस्थापक डॉ. अर्पण जैन अपने संस्थान के माध्यम से अनेक वर्षों से हिन्दी योद्धा तैयार कर रहे हैं। हिंदी को रोज़गार मूलक भाषा बनाए जाने के साथ -साथ साहित्य के प्रचार प्रसार में नवोदित रचनाकारों को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। संस्थान का महत्त्वपूर्ण प्रयास ‘सात से जोड़े अपना साथ’ उक्ति चरितार्थ करते हुए राष्ट्रभाषा, जागरुकता, रोज़गार मूलक, न्याय की भाषा, त्रिभाषा, तकनीकी दक्षता, साहित्य शुचिता के सोपान पर बढ़ते हुए हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने का उद्देश्य पूरा करना है। क्योंकि अपनी भाषा के लिए काम करना आत्मविश्वास, आत्मसम्मान दोनों बढ़ाता है। हिंदी योद्धा एकजुट होकर, हस्ताक्षर बदलो अभियान, रोज़गार व बाज़ार मूलक बनाकर, हिंदी प्रचार प्रसार के लिए प्रतियोगिताएँ संचालित कर इस यज्ञ को सफल बना सकते हैं। डॉ. अर्पण जैन के लिखे लेख पर अगर सार्थक व जागरुक प्रयास किया जाए तो पत्रकारिता और पाठक दोनों को खोने से बचाया जा सकता है, बस ज़रूरत है इस दिशा में शुरुआत करने की।

पुस्तक- पत्रकारिता और अपेक्षाएँ
लेखक- डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
प्रकाशन- संस्मय प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य- मात्र 70 रुपए

 

 

 

 

(समीक्षक अनिता दीपक शर्मा, इंदौर निवासी हैं)

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