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इटारसी की ऐतिहासिक गड़बड़ी को सुधारने की कवायद पर आएगी किताब

 17 जून की सुबह इटारसी रेलवे जंक्शन पर रिले रूट इंटरलॉकिंग सिस्टम का खाक हो गया। मल्टी डायरेक्शनल जंक्शन पर ट्रेन थमीं तो एक ही सवाल था अब क्या होगा। बिना सिग्नल के ट्रेन चलाना खतरनाक था। रेल मंत्री और मंत्रालय की मॉनिटरिंग। ऐसे हालात में सवाल यही था, ये कैसे होगा। लेकिन टीम रेलवे की हिम्मत भी कम नहीं थी। तय किया 24 घंटे काम करेंगे। टीम के मुखिया बने चीफ ट्रैक इंजीनियर आरके मीणा।
जोन के जीएम का संदेश उन्हें मिला कि मिशन इम्पाॅसिबल को पाॅसिबल बनाने के लिए वे प्रोजेक्ट चीफ एडमिनिस्ट्रेटिव बनाए गए हैं। मीणा कहते हैं कि काम शुरू किया तो फिर 23 जुलाई को ही थकान महसूस हुई। ठीक ऐसे ही मोर्चा संभाला सिग्नल एंड टेलीकॉम विभाग के अफसर शैलेष खंडेलवाल ने। अब दोनों अपने 36 दिन के अनुभव लिखेंगे। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने बताया कि केस स्टडी अपने डिपार्टमेंट में तो देंगे ही साथ ही रेलवे के विभिन्न ट्रेनिंग स्कूल और मैनेजमेंट सेंटर्स को भेजेंगे। अफसरों ने जो महसूस किया, सीखा और सिखाया जानते वह भी कम रोचक नहीं। जानते हैं उन्हीं की जुबानी।
जुनून के आगे ठंडा था फीवर
आरके मीणा, चीफ ट्रैक इंजीनियर, डब्ल्यूसीआर
30 साल की सर्विस में टीम लीडर के रूप में यह पहला अनुभव था। चुनौती बड़ी थी लेकिन जीएम ने भरोसा जताया तो मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया। इंजीनियरिंग विभाग का काम पहले पूरा करना था। एसएंडटी ट्रेन चलाने के लिए तैयार हो उससे पहले ट्रैक और इलेक्ट्रिकल का काम पूरा कराया। डेडलाइन से 10 दिन पहले ये दोनों काम पूरे कराए। रोज शाम को 7 बजे मीटिंग में तय किया जाता था कि अगले दो दिन में क्या करना है, क्या समस्या आएगी, कैसे जूझना है। बाद में जीएम को रिपोर्ट देना। देशभर से आए 700 से ज्यादा टीम मेंबर्स के बेहतर इंतजाम पर ध्यान भी जरूरी था। तीन दिन फीवर रहा। ब्लड टेस्ट हुआ। तब यही सोच रहा था मैं बैठ गया तो टीम को मोरल भी डाउन होगा, इसलिए जुटे रहना है। पत्नी भी बीमार हो गईं, बच्चे बाहर हैं, वो अकेले ही इलाज कराते रहीं। पर हम डटे रहे।’
रोज शाम को सभी डिपार्टमेंट के लोगों के साथ मीटिंग करते। दो दिन का काम तय कर लेते। इंतजाम देखने थे तो काम की रिपोर्ट भी देनी थी। मैनेजमेंट का यह अलग अनुभव था।

बेहतरीन काम वाले आए तो जीता किला
शैलेष खंडेलवाल, चीफ एसएंडटी इंजीनियर कंस्ट्रक्शन डब्ल्यूसीआर
”पहली चुनौती थी ट्रेन चलाना। 200 में से 10 फीसदी ट्रेन भी चला सकें तो बड़ी बात। अस्थाई इंतजाम करना था, लेकिन रेलवे बोर्ड की मंजूरी जरूरी थी। फिर परमानेंट काम के लिए अच्छी टीम चाहिए थी। मुंबई, नागपुर, बिलासपुर, आगरा से ऐसे दो दर्जन साथियों को बुलाया जिनका आउटपुट जबरदस्त था। हमारे डिपार्टमेंट ने 7-7 दिन का काम तय किया। पर जितना काम, उतनी समस्याएं। रोज एक खत्म करते दूसरी खड़ी हाे जाती। एक रिले पूरे भोपाल में नहीं मिला। इंटरनेट पर सर्च किया, तो पता चला कि इलेक्ट्रिकल डिपार्टमेंट के पास भी हो सकती हैं। रात 10 बजे पता चला भोपाल के निशातपुरा स्टोर में रिले है। आदमी रवाना हुआ, सुबह छह बजे रिले फिट कर दी। 6-7 घंटे के अलावा ज्यादातर समय आरआरआई में बीता। यह केस सीखने और सिखाने वाला रहा। केस स्टडी तैयार कर रहे हैं। यह सबके लिए उपयोगी होगी।’
हर दिन 6 से 7 घंटे के अलावापूरा समय आरआरआई में बीता। एक-एक मिनट का पूरा उपयोग किया। आखिर हमारी टीम ने कम समय में बेस्ट काम करके दिखाया।

साभार- दैनिक भास्कर से 

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