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गुलजार से गुलजार हुआ जयपुर का साहित्य उत्सव

जयपुर साहित्य के महाकुंभ यानि दसवें लिटरेटचर फेस्टिवल की रंगारंग शुरुआत में चारों तरफ जयपुर के डिग्गी पैलेस में संगीत की शानदार मधुर स्वरलहरियों के साथ चारों तरफ राजस्थानी संस्कृति अपनी सुरभि बिखेर रही थी। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव , गुलजार और एन वाल्डमैन की उपस्थित में राजधानी जयपुर में पांच दिवसीय जयपुर साहित्य महोत्सव का आगाज हुआ.
उबलती हांडिया इतनी, सभी में जिंदगी उबलती है, लेकिन न पकती है न गलती है ये जिंदगी यूं ही चलती है। कवि और गीतकार गुलजार और देश के उत्तर पूर्व से आए शिलांग चैम्बर कोयर बैंड ने वंदे मातरम और पूरे देश को जोड़ने वाली ट्रेन की हलचल को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत कर दसवें ​जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की यादगार शुरूआत की।

डिग्गी पैलेस के खचाखच भरे फ्रंट लॉन में गुलजार ने कहा कि तकरीर करना मुझे सबसे भारी काम लगता है। अब तक मैं अपनी नज्म सुना कर चला जाता था, लेकिन इस बार आयोजकों ने मुझे की नोट स्पीकर बना दिया। अपनी परेशानी को उन्होंने कुछ यूं बया किया कि मुझे उन कुर्सियों पर बैठने से डर लगता है जिन पर बैठने से पांव जमीन पर नहीं लगते।

उन्होंने कहा कि फूल चाहे कितनी भी ऊंची टहनी पर लग जाए, लेकिन मिट्टी से जुड़ा रहता है तभी खिलता है। गुलजार ने कहा कि जब तक पांव मैले नहीं हो तब तक कलम भी स्याही चखना बंद कर देती है। गुलजार ने कहा कि सियासत मैं समझता नहीं हू, लेकिन आम आदमी की तरह प्रभावित जरूर करती है। उन्होंने कहा कि किसी भी एक व्यक्ति के लिए एक जमाने को बहका लेना आसान नहीं है। पूरे समाज को नहीं बहकाया जा सकता। आपका समाज से जुड़ाव जरूरी है।

मेरे अंदर कुछ उबलता है तब लिखता हूं

अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में गुलजार ने कहा कि मैं क्या लिखता हूं और मेरे लिखने से फर्क क्या पडता है, यह मैं कई बार सोचता हूं, लेकिन मैं तब लिखता हूं जब मेरे अंदर कुछ उबलता है। जैसे एक चूल्हे पर रखी हांडी में कुछ उबलता है और उसकी भाप से उस पर रखा बर्तन खड़खड़ता है यह भाप ही मेरे लिखने का कारण बनती है।

रूकोगे तो गिर जाओगे

गुलजार ने जमाने की रवानी को कुछ यूं बयां किया— एक जमाना गुजरता था कल गली से, बडी रफ्तार में था, मैं जरा सा हट गया कि उसे रास्ता दे दूं, मैं खुद से कह रहा हूं कि जमाना चल रहा है तुम रूकोगे तो गिरोगे।

एक भाषा को सम​र्पित करें

गुलजार ने आयोजकों से कहा कि दस साल पर बधाई, लेकिन अगली बार से देश की किसी एक भाषा पर फोकस जरूर करें। उन्होने बताया कि वे समकालीन शायरों के काम पर एक किताब ले कर आ रहे है और इस समय सबसे अच्छी कविता नॉर्थ ईस्ट में लिखी जा रही है। जब जिंदगी से जुडी़ है। उन्होने कहा कि हमारा यहां कोई भी भाषा क्षेत्रीय नही है, सभी भाषाएं राष्ट्रीय है।

उद्घाटन सत्र को अमेरिका की कवियत्री एनी वॉल्डमेन ने भी सम्बोधित किया। इस मौके पर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इस बडे़ आयेाजन के लिए आयोजकों को धन्यवाद दिया और कहा कि इस आयेाजन ने हमें भी जयपुर को सजाने संवारने के लिए मजबूर किया है।

वहीं देशी और विदेशी संस्कृति को अपने दिलों में संजोय हुए दर्शक शब्दों, रचनाओं, साहित्य व कला की इस छठा में बेफिक्री के साथ खोए नजर आए। मेन गेट पर राजस्थानी सजावट, वाद्य यंत्र व नगाड़ों की थाप और इस संस्कृति में संवरी युवतियों की पोशाक ने हर आने वाले का दिल जीत लिया। फेस्टिवल की शुरआत फ्रंट लॉन में शिलॉन्ग चैम्बर काइर के म्यूजिशियन की बेहतरीन स्वरलहरियों के साथ हुई। संगीत की धूनों ने ऐसा समा बांधा कि शब्दों का यह मेला जगमगा उठा।

वहीं राजस्थान के नाथूलाल एंड कंपनी ने लोककला गीतों और धूनों की ऐसी जुगत बैठाई कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठे। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा फ्रंट लॉन गूंज उठा। वहीं युवा दर्शकों ने सिटी बजाकर इस माहौल का अभिवादन किया। इसके बाद मुख्यमंत्री ने जेएलएफ 2017 का उद्घाटन किया। शब्दों के जादूगर गीतकार गुलजार और अमरीकन कवियित्री एनी वॉल्डमैन भी रहे मौजूद।

गुलजार ने अपने जीवन के अनुभव बांटते हुए कहा कि जयपुर शहर और जयपुर के लोग बहुत खुबसूरत है यहां आकर मन खुश हो जाता है। जब भी मैं बड़ी कुर्सी पर बैठता हूं जब पैर जमीन पर नहीं लगते है तो बहुत डर लगता है। लगता है कि मैं गिरने वाला हूं इसी तरह जब पैन की जमीन को नहीं लगता है तो वह स्याही सोखना बंद कर देता है लिखना बंद कर देता है ऐसे में लिखने के लिए जरूरी है कि इंसान जमीन से जुड़ा रहे।

उल्लेखनीय है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के 10 साल पूरे हो रहे हैं और इस दौरान यह एक छोटे से विचार से विष्व का सबसे बड़ा निःशुल्क साहित्योत्सव बन गया. पिछले एक दशक के दौरान यह फेस्टिवल 1300 से अधिक वक्ताओं और 12 लाख से अधिक लोगों की मेजबानी कर चुका है.

थीम- द फ्रीडम टू ड्रीमः इंडिया एट 70
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक चर्चा और सामाजिक संवाद के सफल प्रणेता के तौर पर जेएलएफ इस वर्ष ‘द फ्रीडम टू ड्रीम’ की थीम के पर आयोजित हो रहा है. इस के जरिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक का जश्न मनाया जा रहा है. इसके तहत भारत के इतिहास और भविष्य के संदर्भ में आधुनिक भारत के बारे में भी चर्चा की जाएगी.
250 से अधिक लेखक और सेलिब्रेटी
दुनिया के सबसे बड़े साहित्यिक आयोजन के रूप में पहचाने जाने वाले इस लिट फेस्ट में इस बार 250 से अधिक लेखक, विचारक, राजनेता, पत्रकार और लोकप्रिय सांस्कृतिक हस्तियां हिस्सा लेंगी. आयोजकों के अनुसार इस बार दर्शकों की संख्या पिछले संस्करण में आए 3,30,000 दर्शकों से बेहद अधिक होगी.

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