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‘लोकल’ से ‘ग्लोबल’ हुई सोच से बदला शिक्षा का परिवेश ः डॉ. चन्द्रकुमार जैन


राजनांदगांव।
दिग्विजय कॉलेज के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने कहा है कि तकनीक हमारे जीवन की बुनियादी शर्त बन चुकी है। अब परम्परा के माध्यम पीछे रह होते जा रहे हैं। साहित्य, शिक्षा और समाज का हर पहलू नए ज़माने की नयी प्रौद्योगिकी के पीछे चल रहा है। डिजिटल दुनिया ने लोकल से ग्लोबल तक इंसान की सोच, कार्यक्षमता और काम करने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। यही कारण है कि कोरोना महामारी के कालखंड में साहित्य की किताबें पढ़ी-गुनीं ही नहीं जा रहीं हैं, बल्कि उन्हें जिया भी जा रहा है। आज सूचना और संचार हमारे विचार और व्यवहार के संचालक बन गए हैं।

डॉ. जैन ने कहा कि देखते ही देखते कोरोना और ऑनलाइन किताबों का अघोषित रिश्ता जुड़ गया है। दूसरी तरफ घर पर उपलब्ध नयी और पुरानी चुनिंदा किताबों की अलमारियों की कैद से एकबारगी मुक्ति भी मिल गयी। साहित्यकारों के पास भाषा की ताकत और संवेदना की सम्पदा भी है । मानवता के पक्ष में इससे बड़ी नेमत और कुछ नहीं हो सकती। लॉकडाउन में हमारा जीवन ऑनलाइन जैसा हो गया। यह स्वयं को बचाने और बाँचने का कालखंड बन है।

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. केशरीलाल वर्मा के मुख्य आतिथ्य में शोध प्रकल्प द्वारा आयोजित तथा डॉ. सुधीर शर्मा द्वारा संयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के उद्घाटन सत्र में डॉ. जैन ने उक्त विचार विषय विशेषज्ञ व विशिष्ट वक्ता के रूप में व्यक्त किया। दुसरे दिवस उन्होंने तकनीकी सत्र में भी भागीदारी की। डॉ. जैन ने कहा कि उन्होंने अनुभव किया कि यह कालखंड स्वयं को समझने का अनोखा अवसर है। ओशो के कहै कबीर दीवाना से लेकर फादर कामिल बुल्के की रामकथा तक मूल रूप में पढ़ ली। लिखा भी खूब और अपने यूट्यूब चैनल पर कोरोना जागरूकता से लेकर हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के चुनिंदा फलसफों को अपलोड कर आनंद पाया। गौरतलब है कि उद्घाटन सत्र में कल्याण कॉलेज भिलाई के प्राचार्य डॉ. आर. के साहू और साहित्यकार डॉ. सुशील त्रिवेदी ने प्रमुख अतिथि थे।

विशिष्ट वक्ता डॉ. जैन ने रोचक अंदाज़ में डॉ. जैन ने कहा कि कोरोना कालखंड ने उन्हें कालेज के कालखंडों की घंटियों को घर बैठे अलग अंदाज़ में सुनने और कुछ नया करने का अनोखा अवसर प्रदान किया है। यह सब शब्दों की ताकत को तकनीक के सहारे रचनात्मक ढंग से व्यक्त करने की मुहिम से ही मुमकिन हो सका। इसके लिए उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल से लेकर तमाम अन्य माध्यमों का भरपूर प्रयोग किया। अच्छे वक्ताओं को सुनने का क्रम भी जारी है। वक्त की मांग को समझने की कोशिश की और युवा पीढ़ी तथा साहित्यकारों से ऑनलाइन संवाद कर अच्छी बातों का एक निहायत नया दौर जी कर देखा। डॉ. जैन ने बताया कि कोरोना महामारी के फ्रंट लाइन वारियर्स पुलिस से वीडियो कांफ्रेंसिंग की मदद के 50 मिनट का ख़ास संवाद रोमांचक रहा। बाद में हजारों अनगिनत लोगों तक वह बात पहुंच गई।

डॉ. जैन ने आगे कहा कि अभी ऐसा दौर है कि महामारी हमारी लापरवाही की कहानी कह रही है। साहित्यकार उस कहानी की समीक्षा कर रहे हैं। हमने आज तक यही सीखा कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है और हम अपनी आवश्यकता बढ़ाते गए। धीरे-धीरे उनके बंदी भी बन गए। लेखनी का संसार लोगों के मेल जोल को वाणी देता रहा है किन्तु इस कठिन घड़ी में दूरियाँ इलाज का पर्याय बन गयी हैं। आज तक हम कहते रहे ज़िंदगी बनाना है तो घर से निकलो, पर बहरहाल हम कह रहे हैं कि जीवन बचाना है तो घर पर रहो। इसलिए साहित्य के प्रतिमान भी बदल गए हैं। हम घर पर ठहरे रहे लेकिन साहित्य बहुत तेज गति से घर-घर पहुँच गया।

डॉ. जैन ने कहा कि आभासी या डिजिटल दुनिया ही फ़िलहाल रीयल हो गयी है। लेकिन, यह आने वाले समय की साफ़ आहट भी है। इससे मुंह फेरना अब संभव नहीं है। सूचना व संचार ही अब विचार-व्यवहार दूसरा नाम है। भावनात्मक दूरियां मिटने वाली आभासी दुनिया वास्तविक दूरियों को चुनौती भी दे रही है।

देश के कई बड़े प्रकाशन समूहों ने अपनी किताबें मुफ्त ऑनलाइन कर दीं। कोरोना पर शोध आधारित लेखन का सिलसिला चल पड़ा है। लोग कविताएं, कहानियां, शायरी, गीत सुन रहे हैं, सुना रहे हैं। किस्से कहानियों का हिस्सा बन रहे हैं। साहित्य सही माने में सबके हित में घर बैठे पहुँच रहा है। मजा तो यह है कि खुद को भूले कितने दिन हो गए हम यह भी याद कर रहे हैं। देश के कोने-कोने से ही नहीं, विदेश से भी लोग डिजिटल माध्यम से शब्दों के ज्यादा करीब आ गए हैं।

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