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संकटमय भविष्य से मुंह मोड़ता समाज…..

महोदय

ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य व शुद्रो में बटा हिन्दू समाज जो धर्म की रक्षार्थ व उसके पालन में अपने अपने कर्तव्यों के अनुसार सबसे अधिक सक्रिय रहता था, वह अब आधुनिक चकाचौंध में जीने का आदी हो रहा है। भौतिक युग में भरपूर सुविधाओं से अपने जीवन को आनंदमय बनाने और उसको स्टेटस सिंबल (status symbol) बना कर जी कर आत्ममुग्ध होने में हिन्दू समाज अपना महत्वपूर्ण धन व समय व्यय कर रहा है।इसके अतिरिक्त उसे अपने बच्चों की उच्च शिक्षा व व्यवसायिक भविष्य (career) की चिंता होना तो स्वाभाविक है परन्तु भविष्य में उसका वंश भी सुरक्षित रहे इसके लिए वह अपने धर्म व देश के प्रति उदासीन है। वह भूल रहा है कि धर्म व देश के प्रति भी उसका कोई दायित्व बनता है।

अनेक बलिदानियों से भरे हमारे प्राचीन प्रेरणादायी इतिहास को समाज ने भुला दिया। जिन महान चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य ,राणा प्रताप,भामाशाह , वीर शिवाजी, बंदा वैरागी, राजा छत्रसाल, वीर हक़ीक़त राय,गुरु रविदास, भाई मतिदास व गुरु तेगबहादुर आदि के निरंतर संघर्ष व राष्ट्र के प्रति अभूतपूर्व समर्पण से आज हम एक सुरक्षित जीवन का आनंद ले पा रहें है फिर भी उनके बलिदान हमें स्मरण ही नहीं।

आज जिहादियों के नित्य बढ़ते अत्याचारों से भविष्य कितना भयावह होता जा रहा है उससे कोई चिंतित ही नहीं , क्यों ? हमारे बाजार, घर, बहन-बेटियां लुटे उनकी सुरक्षा के प्रति कोई उपाय हो सके उसकी किसी को कोई चिंता नहीं , क्यों ? जबकि यह स्पष्ट है कि धन-दौलत का स्वामी हिन्दू समाज ही सबसे पहले लूटता है…. बाजार लूटेंगे, घर लूटेंगे, बहन बेटियां उठेंगी फिर भी हम अपने व्यस्त समय से इन सब बेकार की चर्चाओं व सुरक्षात्मक कार्यो के प्रति कोई सरोकार नहीं रखना चाहता, उल्टा उसको नफरत फैलाने की राजनीति कह कर सरकार व जागरुक समाज को कटघरे में खड़ा करना चाहता है । आज हमारी पीढ़ी के भी कितने लोग बचे है जो यह सोचते है। अधिकाँश तो वैभवपूर्ण जीवन शैली जी कर भौतिक संसार की आनंददायी सुविधाओं का यथासंभव उपभोग कर रहें है । नई पीढ़ी तो उससे चार कदम आगे जा रही है, मन बहुत द्रवित होता है हिंदुओं के भविष्य को कौन बचायेगा? कुछ जागरुक लोग आगे आते है तो कभी किसी का तो कभी किसी का अहंकार टकराता है, अहम भी तो एक दोष है।

ब्रह्माण्ड की सर्वश्रेष्ठ योनि में जन्म लेकर अपने कुछ मानवता की रक्षार्थ दायित्वो को समझ कर उनका निर्वाह करना भी तो एक आवश्यकता है । जितना अध्ययन करता हूं और चिंतन करके लिखता हूं उतनी ही अधिक पीड़ा से द्रवित हो जाता हूं… पर एक आवश्यक उत्तरदायित्व समझ कर मन को विचलित नहीं होने देता । अतः सतत् सक्रिय व सावधान रहते हुए समाज को भी सचेत करने के लिए यथा संभव प्रयास करता रहता हूं। लेकिन दुर्भाग्य है कि इन जिहादी समस्याओं से जूझने के लिए हम जड़-पिंडो के समान अंधे, गूंगे व बहरे ही बन कर गांधी जी के तीन बंदरों की भूमिका निभा रहें है । किसी को बिल्ली के झपट्टे मारने का डर ही नहीं सभी ने कबूतर के समान आँख बंद कर रखीं है और जिहाद रुपी बिल्ली अपना काम किये जा रही है।आखिर हम कब तक अपने संकटमय भविष्य से मुंह मोड़ कर संघर्ष से बचते रहेंगे ?

विनोद कुमार सर्वोदय
ग़ाज़ियाबाद

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