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सरकार की शिक्षा नीतिः दिन भर चले अढ़ाई कोस, फिर भी दिल्ली सौ कोस

सरकार को बने दो साल हो गए लेकिन सरकार की शिक्षा-नीति अभी तक नहीं बनी है। शिक्षा-नीति बनाने के लिए जो कमेटी बिठाई गई थी, उसकी रपट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है। कमेटी बिठाई गई, इसका अर्थ क्या हुआ? यही न, कि सरकार का दिमाग खाली है। भाजपा के शिक्षा का अपना कोई नक्शा नहीं है। मोदी के दिमाग में कोई सपना नहीं है। स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्री की कुर्सी में धकेल दिया गया। वह बेचारी क्या करे? पता नहीं, रपट कब तक आएगी? कब तक उस पर बहस चलेगी और वह कब लागू होगी? सरकार की जिंदगी कुल पांच दिनहै। ढाई दिन आरजू में कट गए और ढाई दिन इंतजार में कट जाएंगे।

जो भी हो, अपने आपको राष्ट्रवादी कहनेवाली इस सरकार से ज्यादा आशाएं करना व्यर्थ है। सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2014 के बेंगलुरु अधिवेशन में प्रतिनिधियों से हाथ उठवाकर संकल्प करवाया था कि वे अपने हस्ताक्षर सिर्फ हिंदी में करेंगे। कितने मंत्री, कितने सांसद, कितने विधायक इस संदेश पर अमल कर रहे हैं? सरकारी काम-काज में हिंदी का इस्तेमाल कितना बढ़ा है? जैसी कांग्रेस, वैसी भाजपा!

शिक्षा जब तक स्वभाषा में नहीं होगी, वह लंगड़ाती रहेगी। आजादी के बाद देश में मौलिक विचारकों का टोटा क्यों पड़ गया है? 70 वर्षों में भारत ने एक भी राजनीतिशास्त्री, एक भी समाजशास्त्री, एक भी अर्थशास्त्री, एक भी दार्शनिक ऐसा पैदा क्यों नहीं किया, जो विश्व-विख्यात हुआ हो? क्योंकि हमारी-शिक्षा का माध्यम विदेशी है।

दुनिया के किसी भी महाशक्ति राष्ट्र में पढ़ाई का माध्यम विदेशी नहीं है। स्वभाषा है। सरकार का पहला काम यह होना चाहिए कि वह किसी भी विषय की पढ़ाई विदेशी माध्यम याने अंग्रेजी में न होने दे। उस पर प्रतिबंध लगाए। विदेशी भाषाएं जरुर पढ़ाई जाएं, सिर्फ अंग्रेजी नहीं, लेकिन वह भी सिर्फ दो-तीन साल के विशेष पाठ्यक्रमों में! स्कूल-काॅलेजों में सिर्फ किताबें रटवाने की बजाय काम-धंधों के प्रशिक्षण को बढ़ावा दिया जाए। समस्त जन-प्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को अनिवार्य रुप से सरकारी स्कूलों और कालेजों में ही पढ़ना पड़े, यह कानून बने। इसके अलावा भी कई सुझाव हैं लेकिन उन्हें लागू कौन करेगा?

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