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लंका विजय कर भारत का झंडा फहराने वाला महान सम्राट राजेन्द्र सिंह चोल

मुझे मेरे बचपन के वो दिन आज भी याद है, जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे:-

था शिवराज बड़ा ही वीर
और बड़ा ही था रणधीर
कभी न दु:ख में था घबराता
खुशी ख़ुशी सब दु:ख सह जाता|

यह कोई साधारण कविता नहीं है| यह हमारे भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ट है| इस प्रकार ही जब हमें महाराणा प्रताप और राणा सांगा की वीरता से भरी कहानी पढ़ाई जाती थी या फिर सुभुद्रकुमारी चौहान की कविता:-

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी
खूब लडी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी|

जहाँ इस प्रकार की कथाओं से मन में जोश भर जाता था, ह्रदय में देश भक्ति की लहर दौड़ जाती थी, वहां वीर बालक हकीकत राय की कथा पढ़ते हुए तो मुगलों से बदले की भावना बलवती होती थी| हमारी उस समय की सरकार, जो जवाहर लाल नेहरू के हाथ में थी, के आरम्भिक पांच शिक्षा मंत्री मुसलमान बना कर बड़ी कुशलता से इन वीरों कि गाथाएँ पाठ्यक्रमों से निकाल कर उनके स्थान पर अकबर को महानˎ और्न्गजेब जैसे अत्याचारी शासकों आदि की कहानियां भर दी गई और वह भी झूठ का सहारा लेकर बढ़ा चढ़ा कर भरीं गई| इसका ही परिणाम है कि आज देश में अल्पसंख्यक कहने वाले मुसलमान बहुसंख्यक लोगों का निरंतर अपमान करते जा रहे हैं, कह रहे हैं कि याद रखो हमें इस देश पर आठ वर्ष रक् राज किया है और बहुसंख्यक समुदाय मुंह लटकाए बैठा हुआ है| उसके अन्दर का खून जो हिलोरे मारना चाहिए था आज सूख गया है|

कुछ इस प्रकार की ही अवस्था हम हमारे देश के जिस भाग को कभी कामरूप कहा जाता था, जिसे आज असम कहते हैं, के जिस राजा ने मुगलों को खूब धूल चटाई और एक बार, दो बार नहीं पूरे सत्रह बार हराया, उसका नाम तक भी आज इतिहास में लुप्त हो चुका है, खो चुका है| दक्षिण भारत के जिस राजा ने एशिया के एक बड़े भाग पर भारतीय सत्र्ता कि स्थापना की उस चोल वंशीय राजा राजेन्द्र का णा भी इतिहास कि पुस्तकों में कहीं दिखाई नहं देता,यह सब भी उनकी योजना का ही एक भाग रहा ताकि हम उसे याद करके उस गौरव का पुन: प्राप्त करने का विचार तक भी न कर सकें| इस प्रकार हमें पंगु बना कर रख दिया गया है| आओ हम एशिया के बड़े भाग के विजेता दक्षिण भारतीय राजा राजेंद्र सिंह चोल को एक महान योद्ध, योजना कार और सफल प्रशासक के रूप में एक बार फिर से स्मरण करें|

राजेन्द्र सिंह चोल प्रथम दक्षिण भारत का एक वीर योद्धा, अत्यंत पराक्रमी तथा वीर राजा था| उसने सनˎ १०१२ से लेकर १०४४ तक निरंतर बत्तीस वर्ष तक सफलता पूर्वक अपना राज्य बनाए रखा| यह दक्षिण भारत के इतिहास का एक महानˎ शासक था| यह अपने वंश के भी सर्वाधिक शक्तिशाली और महानˎ शासक थे| वह निरंतर संघर्ष करते रहे | युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं को सदा ही पराजित करते रहे और अपने राज्य की सीमाओं को बढाते रहे| इस प्रकार अपने राज्य का इतना विस्तार किया कि वह दक्षिण भारत के सर्वाधिक शाक्तिशाली राजा बन गए| राजेन्द्र चोल ने जहां जहां पर भी अपनी विजय प्राप्त कीं, वहां वहां पर नए भवनों का निर्माण करवाया, इन भवनों के द्वारा उन्होंने अद्भुत वास्तुकला का प्रदर्शंन किया| राजा राजेन्द्र चोल की शासन व्यवस्था भी अत्यंत उत्तम प्रकार की थी| उस की इस व्यवस्था के कारण प्रजा बहुत सुख का अनुभव करती थी| इस प्रकार वास्तुकला के साथ ही साथ शासन प्रणाली को भी अति उत्तम बनाने की कला उनके पास थी|

यह घटना सनˎ १०१७ की है जब हमारे इस शक्तिशाली नायक तथा अद्भुत योद्धा राजेन्द्र चोल ने सिंहल (श्रीलंका) के प्रतापी राजा महेंद्र पंचम को बुरी तरह परास्त करके सम्पूर्ण सिंहल(श्रीलंका) पर कब्जा कर लिया | इस प्रकार वह अपनी सत्ता को केवल भारत तक ही नहीं भारत के बाहर ले जाने का न केवल साहस ही कर पाये अपितु बाहर लेजा कर भारत के गौरव का डंका वहां पर बजा दिया|

स्थल मार्ग अर्थात् भूमि पर युद्ध कर विजय पाने वाले तो बहुत से शक्तिशाली राजा हुए हैं और मुगलों ने भी विजयें राप्त की हैं किन्तु जब जब जलमार्ग का प्रश्न आता तो यह योद्धा पीछे को हट जाते थे या फिर मारे जाते थे किन्तु राजा राजेन्द्र चोल ने अपनी एक विशाल जल सेना को भी तैयार किया| इस जल सेना की सहायता से उन्होंने जल युद्ध किए और अपने आक्रमण के समय मार्ग में पड़ने वाली नदियों पर अपने शत्रुओं के छक्के छुडाते हुए वह निरंतर आगे और आगे ही बढ़ते चले गए| अपनी इसी नौसेना की बल पर ही राजा राजेन्द्र चोल ने अरब सागर की और मुख किया और इस पर स्थित सदिमन्तीक नामक द्वीप पर बड़ी सरलता से अपना अधिकार जमा लिया| जल मार्ग मे पड़ने वाले इन द्वीपों पर समय समय पर अनेक राजा अपनी मनमर्जी चलाते रहते थे, राजा राजेन्द्र चोल ने अपने अनेक युद्धपोतों को तैयार किया हुआ था और इन युद्धपोतों की ही सहायता से इन सब राजाओं और उनकी सेना को तबाह कर दिया और इस प्रकार राजा राजेन्द्र चोल प्रथम ने जावा, सुमात्रा एवं मालदीव आदि द्वीपों पर अपना झंडा फहराने का साहस कर इन पर अधिकार कर लिया था|

इस प्रकार उसकी सूझ बुझ और शक्ति के परिणाम स्वरूप एक बहुत बड़ा भूभाग उसके राज्य का भाग बन गया| राज्य की विशालता के अनुसार राज्य की केन्द्रीय बागडोर को संभालने के लिए कोई केन्द्रीय स्थान भी आवश्यक था| अपनी इस आवश्यकता को पूर्ण करते हुए उन्होंने (गंगई कोड़ा) चोलपुरम नामक स्थान पर अपनी नई राजधानी स्थापित की| इस राजधानी को भव्य रूप दिया गया| इसकी भव्यता के लिए ही उन्होंने वहां पर एक बहुत ही बड़ी कृत्रिम झील का निर्माण करवाया| यह झील सोलह मील लम्बी और तीन मील चौड़ी थी| यदि आज के माप के अनुसार कहें तो हम कह सकते हैं कि यह झील लगभग चोबीस किलोमीटर की लम्बाई और लगभग साढे चार किलोमीटर की चौड़ाई का विशाल आकार अपने अन्दर समेटे हुए थी| जब हम भारत की झीलों के इतिहास के पन्ने खोलते हैं तो हम पाते हैं कि यह झील भारत के इतिहास में किसी भी मानव द्वारा बनाई गई सबसे बड़ी झीलों में से एक मानी जाती है। इस झील के लिये पानी कहाँ से आये, यह भी एक प्रश्न हो सकता है किन्तु राजा राजेन्द्र चोल की सूझ का ही परिणाम था कि इस झील के लिए बंगाल से गंगा का जल लाकर डाला गया और इस प्रकार इसने एक झील का रूप लिया|

आज हम देखते हैं कि शाहजहाँ के शासन काल की हमारे इतिहासकारों ने खूब प्रशंसा की है और कर रहे हैं , जबकि उसके काल में भीषण अकाल के कारण हजारों की संख्या में प्रजा ने दम तोड़ दिया| पशु, पक्षी जो मारे गए, उनकी कोई गिनती ही नहीं मिलती किन्तु इसकी चर्चा किये बिना उसकी शासन व्यवस्था की चर्चा के पुल बांधे ही चले जा रहे हैं| अकबर को महानˎ बताया जाता है} आज तो इस प्रकार के लोग भी सामने आने लगे हैं जो औरंगजेब को भी क्रूर बादशाह के रूप में मानने को तैयार नहीं है| दूसरी ओर दक्षिण भारत में शासक और एशिया महाद्वीप के एक बड़े भाग पर राजेन्द्र चोल का राज्य, था, जो भरपूर समृद्ध था, सब प्रकार के वैभव इस राज्य में देखे जा सकते थे| शक्ति और वीरता का यह पर्याय बन चुका था किन्तु हमारे इतिहास की पुस्तकों को एक साजिश रचाते हुए इस राजा के सम्बन्ध में शांत कर दिया गया है| इतिहास में इस राजा को कोई स्थान ही नहीं दिया गया|

हाँ! समुद्र का एक क्षेत्र चोला झील के नाम से खूब सुप्रसिद्ध हुआ था किन्तु इसे भी अब बंगाल की खाडी कहने लग गए है| इस झील से चोला झील का नाम छीन लिया गया है| यह चोला झील सदियों तक अपने नाम के कारण चोलवंश की महानता को स्मरण कराती रही किन्तु पहले इसे कलिंग सागर का नाम दिया गया और फिर जब इस देश के दुर्भाग्य से जब इस देश पर ब्रिटिश राज्य स्थापित हुआ तो इसे बंगाल की खाड़ी के रूप में एक नया नाम दिया गया| इस प्रकार चोल शब्द इस झील से सदा के लिए प्रयोग से बाहर कर दिया गया| केवल मुस्लिम पंथी इतिहासकारों ने ही नहीं, वामपंथी इतिहासकारों ने भी हमारे इतिहास के साथ खूब खिलवाड़ किया है और आज भी कर रहे हैं| इन्होने सदा ही हमारे देश के वीर योद्धाओं और निर्माताओं के इतिहास को नष्ट करने की साजिश रची और इस साजिश के साथ ही हमारे मंदिरों और हमारी विश्व प्रसिद्द महानˎ संस्कृति को नष्ट करने वाले मुगल आक्रांताओं के बारे में बढ़ा चढ़ा कर पढ़ाया|

राजेन्द्र चोल एक ऐसा शासक था जो युद्ध में अपने देश की महिलाओं को भी सम्मान देता था| इस कारण उसे सच्चे अर्थों में वेद अनुगामी कह सकते हैं| उसकी सेना में अनेक महिलायें सेना के उच्च पदों पर आसीन थीं, यहाँ तक कि उसकी सेना में कमांडर(सेनापति) तक के पद पर भी पुरुषों के साथ ही साथ अनेक महिलायें भी थीं| यह तो मुगलों का आगमन था कि महिलाओं को पर्दे के पीछे जाना पडा| इसका भी एक कारण था| मुग़ल लोग किसी भी सुन्दर महिला को उठा ले जाते थे| उसे और उसकी इज्जत को नोच लेते थे| उनके इस भयंकर अन्याय से बचने के लिए वेद मार्ग पर चलने वाली विश्व में सर्वोत्तम स्थान रखने वाली भारत की माहिलाओं को पर्दा प्रथा को अपनाना पडा|

इस समय से पूर्व विवाह आदि सब आयोजन बड़े ही सरल और सुगम वातावरण में होते थे किन्तु मुगलों के अत्याचार के कारण अपनी सुरक्षा बनाए रखने के लिए विवाह के समय अनेक योद्धाओं को साथ लेकर जाना आरम्भ किया, इसे आज बारात कहने लगे हैं| जिस देश में सदा से ही विवाह दिन में हुआ करते थे, उस देश में मुगलों की बुरी नजर से बचने के लिए रात्री काल में शस्त्रों की छाया में विवाह करने आरम्भ करने पड़े और जिस दश में विवाह के समय दुल्हन का चेहरा कभी ढका नहीं जाता था, उस देश में मुगलों के भय से दुल्हन को अपना चेहरा पूरी तरह से ढकना पड़ा, जिससे उसे सांस लेने में भी कठिनाई आने लगी| यह सब अत्याचार करने वाले मुगलों को इतिहास में महानˎ कहना और राजेन्द्र चोल जैसे वीर, तेजस्वी, शिल्पकार, प्रशासन में पटू राजाओं को इतिहास में कोई महत्त्व न देना अपने आप में ही एक प्रश्न खडा करता है|

आज देश निहार रहा है अपने परम वैभव को एक बार फिर से पाने के लिए| इतिहास के वीर सिपाहियो उठो! एक बार फिर से तुलिका हाथ में लो और इतिहास के पन्नों को साफ़ कर इस पर इतिहास की यह सत्य गाथा उकेर दो, जो इस देश के वीर सपूतों का एक बार फिर से मंगल गान करने लगे|

डॅा. अशोक आर्य
पाकेट १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से.७ वैशाली
२०१०११२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६
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