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तितलियाँ पालने के शौक ने पहुँचाया लिमका बुक में

तितलियों को अपना सच्चा दोस्त मानने वाली प्राची की कहानी किसी बीहड़ या पहाड़ी गांव की कहानी नहीं है, बल्कि ये कहानी है हरियाणा के फरीदाबाद की एक लड़की की.

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत प्राची सिंह चार्टर्ड अकाउन्टेंट हैं और कॉरपोरेट ट्रेनर भी, पर दिल से वो एक लेपिडोप्टरिस्ट (कीट, तितलियों को पढ़ने वाला व्यक्ति) हैं। प्राची (30) ने अपने घर के बगीचे में तितलियों की दस प्रजातियों को पाल रखा है और इन सबका ख्याल वो खुद ही रखती हैं। ये तितलियां घर में लगे पौधों में अपना जीवन चक्र शुरू करती हैं, प्राची के इर्द-गिर्द उड़ते हुए बड़ी होती हैं और फिर यहीं की होकर रह जाती हैं। वे इन तितलियों को पिछले सत्रह सालों से पालती आ रही हैं औऱ उनका नाम एक साथ दस प्रजातियों की तितलियों का पालन-पोषण करने वाली देश की पहली महिला के रूप में लिमका बुक ऑफ रिकॉर्ड्स (2020) में दर्ज है।

अब प्राची इनके बारे में स्कूल के छात्रों के साथ समाज को भी जागरुक कर रही हैं। वो बताती हैं, “स्कूली छात्र जब लार्वा, प्यूपा, तितलियों को वास्तविक रूप में देखते हैं तो इससे उनकी जिज्ञासा शांत होती है और वो करीब से प्रकृति और जीवन को समझ पाते हैं।” स्कूल में पढ़ते हुए जब छठी कक्षा में प्राची ने तितलियों के जीवन चक्र के बारे में स्कूल में पढ़ा तो अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उन्होंने अपने घर के आसपास लगे पेड़ में से ही एक लार्वा ढूंढा और उसे पालना शुरू किया।

“मैं हर दिन उसे खाने के लिए पत्तियां देती थी। पहली तितली, जो काले रंग की थी, लगभग 30 से 40 दिनों में तैयार हुई। जब उसे अपने पड़ोस में रहने वाले परिवार को दिखाया तो उन्होंने तुरंत कहा-ब्लैक एंड ब्यूटीफुल. उनका कमेंट मुझे ये समझाने के लिए काफी था कि प्रकृति हमें जो भी रूप दें उसकी अपनी खूबसूरती होती है,” प्राची कहती हैं.

प्राची बताती हैं, “जब मैंने तितलियों को पालना शुरू किया तो उस वक्त ना तो फोन पर एक क्लिक में आप इंटरनेट पर कुछ सर्च कर सकते थे, ना ही गूगल जैसी सुविधाएं थी। उस वक्त तितलियों के अंडों को ढूंढने की कोशिश मैं उन पेड़ों में कीड़ों को ढूंढती थी औऱ धीरे-धीरे मुझे ये समझ आया कि तितलियों की अलग-अलग प्रजातियां अलग-अलग पेड़ों पर मिलती हैं, सभी तितलियां एक ही पत्ते नहीं खाती आदि। शुरू के दस बारह साल तो मैं खुद ही इन्हें देखकर इनके व्यवहार को समझने लगी थी.”

उन्होंने बाद में तितलियों के लिए आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू किया और बीएनएचएस (बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी) से कोर्स भी किया।

“अब मैं लोगों को, खासतौर से बच्चों को अपने यहां बुलाती हूं ताकि वो तितलियों को, उनके अंडों को, जिन पेड़ पौधों पर वो अंडे देते हैं, उन्हें देखें। मैं बच्चों को प्रकृति को करीब से देखने का मौका देती हूं ताकि वो प्रकृति से जुड़ाव महसूस कर सकें।” पूरी दिल्ली एनसीआर में लगभग 80 से 90 प्रजातियों की तितलियां रहती हैं, उनमें से प्राची के बगीचे में 10 तरह की तितलियां है। वे अब तक 550 तितलियां पाल चुकी हैं। इनका जीवनकाल करीब 40-50 दिन होता है.

वे हर रोज़ समय निकालकर इन पौधों के बीच बैठती हैं. “अपनी तितलियों को, पेड़-पौधों को ध्यान से देखना मुझे अच्छा लगता है। सब लोग महीने में कम से कम एक दिन जरूर पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ काम करें। लोग अपने बगीचे में जो पेड़ लगे हैं, उनमें कीटनाशक का इस्तेमाल न करें और कुछ ऐसे पेड़ जरूर

जिन पर तितलियां रहना और अंडे देना पसंद करती हैं,” कहना है प्राची का जो बच्चों के लिए तितली पालन विषय पर एक किताब को अंतिम रूप दे रही हैं. लॉकडाउन के दौरान भी उन्होंने अपने शौक के प्रचार प्रसार का काम जारी रखा है। दोस्त और पड़ोसी जो पहले वक़्त न निकाल सके, अब तितली पालन के लिए उत्सुक हैं.

आसान है बालकनी में तितलियां पालना
प्राची का कहना है कि कोई भी अपनी बालकनी में तितलियों के लिए बग़ीचा तैयार कर सकता हैं, क्योंकि बहुत सारी ऐसी तितलियां हैं जो कि बालकनी में भी लगे पौधों में अंडे देती हैं। बस बालकनी में नेट नहीं लगा होना चाहिए। बेल, नींबू, मदार, अशोक, गुलमोहर कुछ ऐसे पेड़ हैं जिन पर आकर तितलियां अंडे देती हैं। इन पेड़ों को बड़े गमलों में लगाएं और हमेशा ध्यान दें कि क्या पत्तों पर कीड़े नज़र आ रहे हैं।

फूलों के पौधे जैसे, पीटोनिया, मॉर्निंग ग्लोरी, गुड़हल भी लगाएं। इन पौधों से तितलियां खुद-ब-खुद बालकनी में आना शुरू कर देंगी। बस किसी भी तरह के कीटनाशक न डालें।

साभार https://thedialogue.co.in/ से

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