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कॉल सेंटर की नौकरी से लेकर आईपीएस बनने तक का सफर!

सूरज के कॉल सेंटर की नौकरी छोड़ने के फैसले पर उनके बॉस ने उनका इंक्रीमेंट दोगुना कर देने की पेशकश की, लेकिन सूरज नहीं माने। अपनी नौकरी के दौरान सूरज ने जो पैसे बचाए थे उसे लेकर 2007-08 में वे यूपीएससी की कोचिंग लेने के लिए दिल्ली चले गए। लेकिन लगभग छह महीने में ही उनके पास पैसे खत्म हो गए।

यह कहानी एक कॉल सेंटर में काम करने से लेकर IPS ऑफिसर बनने वाले सूरज सिंह परिहार की है। अपने दादा-दादी के साथ रहते हुए, सूरज ने जौनपुर, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव से पांचवीं तक पढ़ाई की। सूरज अपने दादा से ऐसे महापुरुषों की कहानियों को सुनते हुए बड़े हुए थे जिन्होंने देश और समाज की सेवा की थी। यहीं से उनको भी देश सेवा और लोगों के लिए कुछ खास करने की प्रेरणा मिली।

कक्षा पाँच के बाद, वह अपने माता-पिता के साथ कानपुर के जाजमऊ उपनगर चले गए और एक हिंदी मीडियम स्कूल में दाखिला ले लिया। सूरज पढ़ने में ही नहीं बल्कि खेल और रचनात्मक लेखन में भी माहिर थे। साल 2000 में, उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर नारायणन के हाथों रचनात्मक लेखन और कविता के लिए राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार भी जीता था।

साल 2001 में यूपी बोर्ड की कक्षा 12 में उन्होंने 81 प्रतिशत अंक प्राप्त किए और सभी पाँचों विषयों में डिस्केटिंक्शन साथ कॉलेज टॉप किया। इससे सूरज के लिए बेहतरीन कॉलेज के रास्ते खुल सकते थे लेकिन सूरज कुछ अलग करना चाहते थे।

सूरज ने IPS बनने का सपना देखा था, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छे कॉलेज से रेग्युलर पढ़ने की इजाज़त नहीं दे रही थी।

उनका संयुक्त परिवार था और पिता एकमात्र कमाने वाले। ऐसे में सूरज घरेलू आय में अपना योगदान देना चाहते थे। उन्होंने प्राइवेट स्टूडेंट के तौर पर एक कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई शुरू कर दी और अपने दोस्त अश्विनी के साथ मिलकर एक किराए के कमरे में अंग्रेजी सिखाने का कोचिंग संस्थान शुरू किया।

सूरज ने अपने दोस्त के साथ मिलकर अंग्रेजी सिखाने का कोचिंग सेंटर तो शुरू कर दिया, लेकिन इससे पहले तक उनकी खुद की अंग्रेजी भी इतनी अच्छी नहीं थी। बाल श्री अवार्ड के जोनल और राष्ट्रीय स्तर पर चयन के दौरान वे अपने से मिलने वाले बच्चों से हीन महसूस करते थे, क्योंकि वे बच्चे सहजता से अंग्रेजी बोल सकते थे और सूरज नहीं।

हालांकि, सूरज अच्छी तरह से अंग्रेजी पढ़, लिख और समझ सकते थे, लेकिन बातचीत कर पाना बड़ा मुश्किल था। सूरज के स्कूल और घर में अंग्रेजी बोलने का माहौल नहीं था।

इसके बाद सूरज ने अंग्रेजी समाचार पत्रों को पढ़ना, अंग्रेजी चैनलों को देखना और आईने के सामने खड़े होकर खुद से बातचीत करना शुरू किया और अपने दम पर अंग्रेजी सीखी।

“मेरे आसपास के लोग मेरा मज़ाक उड़ाते, जब वे मुझे आईने से बातें करते हुए देखते। लेकिन इस बात ने मुझे ऐसा करने से कभी नहीं रोका, “वह कहते हैं।

सूरज के शुरू किए कोचिंग सेंटर में कुछ समय में ही करीब 100 रजिस्ट्रेशन हो गए थे, लेकिन मकान मालिक से विवाद के चलते सेंटर बंद करना पड़ा। सेंटर बंद होने के बाद सूरज ने हिन्दुस्तान यूनिलीवर में मार्केटिंग की नौकरी जॉइन की लेकिन असफल रहे।

इसके बाद एक जगह उन्होंने नौकरी के लिए विज्ञापन देखा। EXL में कॉल सेंटर एक्जीक्यूटिव के लिए नौकरी थी। तब बीपीओ सेक्टर को सबसे अच्छे पे-मास्टर के रूप में जाना जाता था।

उन्होंने कॉल सेंटर में जॉब के लिए अप्लाई किया और सात राउंड के बाद उनका चयन ट्रेनिंग के लिए हो गया। 19 साल की उम्र में, नौकरी करने के लिए सूरज नोएडा चले गए। सूरज का शॉर्ट टर्म गोल घर भेजने के लिए पैसा कमाना जरूर था, लेकिन उनका बड़ा लक्ष्य ग्रेजुएशन पूरा करना और IPS बनने के लिए UPSC की अच्छी तैयारी करना था।

सूरज कॉल सेंटर की ट्रेनिंग के लिए नोएडा आ गए, जहाँ आवाज और उच्चारण को लेकर उनका प्रशिक्षण हुआ। लेकिन इसके बाद हुए टेस्ट में वे फेल हो गए। जब उन्हें कम्पनी से जाने के लिए कहा गया तो उन्होंने अपने प्रबंधक, कनिष्क से एक आखिरी मौका देने की विनती की।

उन्हें एक महीने का अल्टीमेटम दिया गया। उस एक महीने में, सूरज ने इतनी मेहनत की, कि उन्होंने न केवल री-टेस्ट पास किया, बल्कि ’द वॉल ऑफ फेम’ में भी जगह बनाई। उन्हें कम्पनी में 60 प्रतिशत अप्रेजल मिला। लेकिन वे इससे खुश नहीं थे और उन्होंने अपने मुख्य लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने की ठानी।

वे कहते हैं, “क्योंकि मैं जानता था कि यह मेरा लक्ष्य नहीं है। इसलिए मैंने नौकरी छोड़ने का फैसला किया।”

सूरज के नौकरी छोड़ने के फैसले पर EXL के उपाध्यक्ष ने उनका इंक्रीमेंट दोगुना कर देने की पेशकश की, लेकिन सूरज नहीं माने। अपनी नौकरी के दौरान सूरज ने जो पैसे बचाए थे उसे लेकर 2007-08 में वे UPSC की कोचिंग करने के लिए दिल्ली चले गए। लेकिन लगभग छह महीने में ही उनके पैसे खत्म हो गए।

आर्थिक परेशानी का दबाव बढ़ने लगा तो उन्होंने आठ बैंकों में पीओ की परीक्षा के लिए आवेदन किया और सभी को क्रैक भी कर लिया। उन्होंने बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र में नौकरी जॉइन कर ली, जहाँ उन्होंने ठाणे की शाखा में चार महीने तक काम किया।

इसी दौरान उनका चयन SBI में भी हो गया। उन्होंने इस परीक्षा में AIR-7 हासिल की थी। SBI के साथ उन्होंने आगरा, दिल्ली और रुड़की में एक साल तक काम किया। जब उन्हें चमोली में बैंक प्रबंधक के रूप में पदोन्नत किया गया, तब उन्होंने एक बड़ा निर्णय लिया।

“यह एक बड़ा काम था और मुझे पता था कि अगर मैं चमोली चला गया तो अपने सपने से पूरी तरह कट जाऊंगा। इसलिए, मैंने एक बार फिर नौकरी छोड़ने का फैसला किया,” सूरज ने बताया।

हालाँकि इसी दौरान उन्होंने सीमा और उत्पाद शुल्क विभाग में एक निरीक्षक के पद के लिए AIR-23 के साथ SSC की परीक्षा भी पास कर ली।

SBI के विपरीत, इस नई नौकरी में उनके पास वीकेंड ऑफ था, ऐसे में उन्होंने खुद को पूरी तरह से UPSC की तैयारी के लिए समर्पित कर दिया।

नौकरी करते हुए UPSC क्रैक करने के सवाल पर वे कहते है, “मैं पहले प्रयास में सफल नहीं हुआ।”

उनका पहला प्रयास 2011 में असफल हुआ जब वे SBI के लिए काम कर रहे थे। इस परीक्षा में वे साक्षात्कार तक तो पहुंचे लेकिन एक मामूली अंतर से चूक गए। उन्होंने 2012 में दूसरी बार फिर से परीक्षा दी, लेकिन इस बार वे मुख्य परीक्षा में रह गए।

अपने तीसरे और अंतिम प्रयास में, उन्होंने परीक्षा तो पास कर ली लेकिन उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा में हुआ। उनका सपना IPS बनने का था। जब वे अंतिम प्रयास में IPS में आने को लेकर संशय में थे, सरकार ने परीक्षा देने की सीमा को पांच बार कर दिया और आयु सीमा में भी दो वर्ष की वृद्धि कर दी। ऐसे में सूरज को परीक्षा देने के लिए दो मौके और मिल गए। उन्होंने चौथी बार UPSC की परीक्षा दी और AIR 189 प्राप्त की। सूरज 30 साल की उम्र में IPS अधिकारी बन गए।

“ग्रेहाउंड्स के साथ जंगल में एक हफ्ते तक गुरिल्ला रणनीति सीखने से लेकर लॉन्ग रूट मार्च, कई किलोमीटर की दौड़, कॉम्बैट सर्किट, फायरिंग, घुड़सवारी, तैराकी आदि 30 की उम्र में करना मेरे लिए चुनौतीपूर्ण था, लेकिन मैंने इसमें सर्वश्रेष्ठ दिया,” सूरज ने कहा।

उन्होंने पहले प्रयास में ही अपने सभी इनडोर और आउटडोर प्रशिक्षण को पास किया और अल्फा ग्रेड के साथ अपने कमांडो पाठ्यक्रम को भी पूरा किया।

 

 

प्रशिक्षण के बाद, पहले 18 महीनों के लिए, सूरज को सिटी एसपी के रूप में रायपुर में तैनात किया गया। बाद में उन्हें पदोन्नत कर दंतेवाड़ा के रेड कॉरिडोर में एएसपी के रूप में नियुक्त किया गया।

सूरज बताते हैं, “नक्सल संबंधित हिंसा में सुकमा और बीजापुर के आसपास के जिलों के बाद दंतेवाड़ा तीसरे स्थान पर आता है। पिछले पांच महीनों में DGP, IG और SP के नेतृत्व में हमारी टीम ने लगभग एक करोड़ रुपए की इनामी राशि के नक्सलियों को गिरफ़्तार कर, उनसे मुठभेड़ और आत्मसमर्पण करवा उन पर लगाम लगाई है।”

सूरज इस क्षेत्र में सॉफ्ट एंड हार्ड पुलिसिंग से बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। माओ के दुष्प्रचार को रोकने की लिए उन्होंने अपनी रचनात्मकता का उपयोग करते हुए ‘नई सुबह का सूरज’ नाम से एक अवेयरनेस फिल्म भी बनाई है। उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्र में जागरूकता फैलाने के लिए कविताएं भी लिखी है और एक वीडियो गीत भी बनाया है।

सूरज अपनी बात इस सकारात्मक सन्देश के साथ खत्म करते हैं कि उनके पास पहुंचने वाले बहुत से आकांक्षी युवा IPS की नौकरी में मिलने वाली सुविधाओं के बारे में पूछते हैं, लेकिन वे उनसे एक ऐसी प्रेरणा खोजने के लिए कहते हैं जो सुविधाओं से ज्यादा मायने रखती है। भारतीय पुलिस सेवा नौकरी नहीं है, यह एक सेवा है। वे बेहतर लोगों की संगति रखने, रचनात्मक आलोचना को सकारात्मक रूप से लेने, अपनी गलतियों और दूसरों से सीखने के साथ ही जीवन में अच्छा करने के लिए काम, अध्ययन, शौक और खेल के बीच संतुलन बनाने के लिए कहते हैं।

साभार- https://hindi.thebetterin से

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