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लद्दाख में शिक्षा का स्तर

जम्मू काश्मीर अध्ययन केंद्र, एवं गरवारे कॉलेज पुणे इनके संयुक्त्त प्रयास से विगत दिनों में लद्दाख में शिक्षा के स्तर को जानने के लिए एक टीम भेजी गयी थी । जिसमें जम्मू काश्मीर अध्ययन केंद्र की और से रंजन जी, अरविन्द जी, अंजलि जी, और गरवारे कॉलेज की और से विनय जी तथा 12 पत्रकारिता के छात्र शामिल थे।
इस सर्वेक्षण का मूल उद्देशय लद्दाख में शिक्षा की दशा एवं दिशा को जानता था । 2 अगस्त 2015 को श्रीनगर से सभी लोगो ने प्रस्थान किया और शाम 5:30 के करीब कारगिल शहर में पहुंच गए। एक टीम कारगिल शहर में रुक गयी और बाकि लोगों ने लेह की तरफ यात्रा जारी राखी, करीब रात 10:30 के करीब वे भी लेह पहुँच गए । इस तरह से लद्दाख के दोनों जिलों में एक एक टीम ने अपना काम किया । इस पूरी टीम ने लद्दाख के दोनों जिलों लेह और कारगिल के लगभग सभी शहर, ब्लाक और दूरस्थ के क्षेत्रों का दौरा किया । लेह जिलों में इस टीम ने लेह शहर, चुमाथांग, न्युमा, आनले, कहलसी, नुब्रा और इनके आसपास के गावों का अध्ययन किया । कारगिल जिले में कारगिल शहर, जन्सकार वैली, आर्यन गाव, बटालिक, सुरु वैली और वहां के गावों में अध्ययन किया ।

इस अध्ययन के दौरान टीम के सदस्यों ने छात्रों, शिक्षक, अभिभावक, ग्राम प्रधान, , सरकारी अधिकारी एवं राजनेताओं से मुलाक़ात की और जानकारी प्राप्त की। इस टीम ने आंगनबाड़ी, प्राथमिक से लेकर दोनों जिलों के इकलौते कॉलेजों तक में दौरा किया और शिक्षा की स्थिति को समझा । इस दौरान टीम के सदस्यों ने रिम्णाद् , दर्रे और दुनिया की सर्वोत्तम ऊंचाई 18,900 फ़ीट की सड़क तक की यात्रा की । इस सम्पूर्ण यात्रा में टीम के सदस्यों ने लद्दाख के विभिन्न क्षेत्रों के जनजीवन को बहुत करीब से देखा, जाना और जिया।
वहां के समाज में प्लावित अखंड देशभक्ति और भारतीयता को भी महसूस किया । लेह के लगभग हर स्कूल में तिरंगा बना हुआ था और सारे बच्चों को राष्ट्रगीत याद था । जो वे पूरे ज़ोर शोर से सुनते भी थे। कारगिल के एक 12 साल के बालक से जब हमने पुछा कि “क्या बनना चाहते हो” तो उसका जवाब था “फौजी अफसर” और जब हमने पूछा कि “फौजी अफसर बन के क्या करोगे?” तो उसने कहा “देश के दुश्मनों का सफाया ।” ये भाव वहां के बच्चे बच्चे में मौजूद था परन्तु स्कूलों में हमने हर जगह मूलभूत सुविधाओं तक का अभाव देखा । जहां औसत तापमान 5-7 डिग्री होता है, वहां स्कूलों में हीटिंग तक की सुविधा नही थी । शौचालयों जैसी अति मूलभूत सुविधा भी खस्ता हाल थी । कई स्कूलों में पीने का पानी तक उपलब्द्ध नही था ।लेकिन फिर भी अध्यापक बच्चों को पढ़ा रहे थे और बच्चे पढ़ रहे थे।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तो हालत और भी खराब नज़र आये । दोनों जिलों में सिर्फ एक-एक डिग्री कॉलेज है । कोई इंजीनियरिंग अथवा मेडिकल कॉलेज सम्पूर्ण लद्दाख में नही है । आई.टी.आई. में भी, जहां पचासों ट्रेड होते हैं वहां सिर्फ तीन ट्रेड पढ़ाये जा रहे हैं । लद्दाख के छात्र मज़बूर हैं , उच्च शिक्षा के लिए, घर से दूर लद्दाख से बाहर जाने के लिए । जोकि महंगा भी है और सबके लिए संभव भी नही है। एक केंद्रीय विश्विद्यालय की मांग हमनें लद्दाख में मुखर रूप से सुनी और उसकी आवश्यकता भी महसूस की ।
भारतीय सेना का प्रयास सरहनीय है । सेना के चलाये गए सद्भावना स्कूल अच्छी स्थिति में है । जहां लद्दाखी बच्चो को पढ़ाई के साथ साथ हॉस्टल और गणवेश की सुविधा भी मिलती है।
कहीं कहीं तिब्बत की निर्वासित सरकार द्वारा चलाये जा रहे स्कूल भी मिले । वे भी बेहतर स्थिति में थे । कुल मिला कर लद्दाख में हमें शिक्षा का स्तर संतोषप्रद अनुभूत नही हुआ । जिसके लिए राज्य सरकार किसी न किसी रूप में उत्तरदायी दिख पड़ी ।

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