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एक डोर में बांध रहा किताबों का प्यार

संकोची स्वभाव वाली एक महिला जैसे ही लोगों से भरे एक कमरे में दाखिल होती है तो उसे सारे लोग चुप्पी साधे हुए नजर आते हैं। वह हिचकिचाहट के साथ एक किताब उठाती है और उसे पढ़ना शुरू कर देती है। थोड़ी देर बाद वह भावविभोर हो रहे श्रोताओं की तरफ देखती है तो कुछ लोग अपनी हथेलियों पर ठुड्डी को रखे हुए आराम की मुद्रा में दिखाई देते हैं। उनके भीतर अपनी बारी आने की बेताबी भी महसूस की जा सकती है।

जहां किसी भी सामान्य बुक क्लब की बैठक में शामिल होने पर किसी नए व्यक्ति को अटपटा लगता है वहीं नियमित तौर पर जाने वाले लोगों के लिए यह खासा रोमांचक होता है। किताबों के प्रति प्यार का साझा अहसास उन्हें एक-दूसरे से जोड़ने का काम करता है। वैसे किताबों के शौकीनों में साहित्य को लेकर एक साझा प्यार होता है लेकिन वे अक्सर दूसरों के साथ इस भावना को खुलकर बांटने में असहज महसूस करते हैं। बुक क्लब लोगों की इस झिझक को तोड़ने में मदद करते हैं जिससे किताबों के शौकीनों के लिए अपने विचारों की अभिव्यक्ति का लोकतांत्रिक जगह मिल जाती है। यहां पर लोग दूसरों की आलोचना या सोच की परवाह किए बगैर किसी भी किताब के बारे में अपनी राय खुलकर रख सकते हैं।

पुणे में ऐसे ही एक क्लब की 2015 में शुरुआत करने वाले आयुष जैन कहते हैं, ‘बुक क्लब की बैठक में किसी भी तरह की साहित्यिक विधा पर चर्चा को लेकर कोई रोक नहीं है।’ पुणे बुक लवर्स के संस्थापक आयुष के इस सफर की शुरुआत पुणे आने के साथ शुरू हुई थी। उन्हें पुणे में कोई बढिय़ा बुक क्लब नहीं मिला तो उन्होंने अपना क्लब ही शुरू कर दिया। इसमें उनका पुराना अनुभव भी काम आया। आयुष कहते हैं, ‘मैं पहले जयपुर में एक बुक क्लब चला चुका था लिहाजा मुझे मालूम था कि पुणे में किस तरह इस नए क्लब को स्थापित करना है।’

कारोबार विश्लेषक के तौर पर काम करने वाले 29 वर्षीय आयुष अपनी व्यस्त दिनचर्या में से ही कुछ समय निकालकर किताबों के शौकीनों से मिलते हैं। इसके लिए जगह के चुनाव से लेकर नए सदस्यों को अपने साथ जोडऩे और सोशल मीडिया पर क्लब की मौजूदगी को बनाए रखने का भी जिम्मा उन्हें उठाना पड़ा। इसमें सबसे मुश्किल काम बैठक की जगह का चुनाव होता है। आयुष कहते हैं, ‘अगर दूरदराज वाली किसी जगह पर बैठक रख दी जाए तो अधिकतर लोग उसमें शामिल ही नहीं होंगे। ऐसे में सही जगह चुनना सबसे बड़ी चुनौती है।’

ऐसे ही एक बुक क्लब ‘ब्रिंग योर ओन बुक’ (बीवाईओबी) की संस्थापक निधि श्रीवास्तव ने इस मुश्किल का समाधान कुछ अलग तरीके से निकाला है। उन्होंने अपने घर पर ही क्लब की बैठक रखनी शुरू कर दी। वह कहती हैं, ‘जब मैंने पहली बार अपने घर पर क्लब के सदस्यों को बुलाया तो थोड़ी सशंकित भी थी क्योंकि ये अनजान लोग थे। लेकिन आज वही लोग मेरे अच्छे दोस्त बन चुके हैं।’ हालांकि अब इसकी बैठक आपसी सहमति वाली जगह या किसी कैफे में होती है।

बीवाईओबी के कामकाज का तरीका सामान्य बुक क्लब से थोड़ा अलग है। इसमें हरेक सदस्य हाल ही में पढ़ी गई एक किताब लेकर आता है और उस पर अपनी राय रखता है। निधि कहती हैं, ‘यह एक खुली चर्चा जैसी होती है जिसमें सारे सदस्य किसी किताब के बारे में अपनी राय रखते हैं। हालांकि हरेक बैठक का एक सभापति होता है लेकिन किसी को भी अपनी बात रखने से रोका नहीं जाता है।’ ऐसा नहीं है कि बुक क्लब से जुड़ने वाले लोग केवल युवा ही हैं। हालांकि भारत में बुक क्लब में शामिल सदस्यों की औसत आयु 24 से 35 साल ही है। यहां तक कि कुछ लड़के-लड़कियां भी इन क्लबों में शामिल होने लगे हैं।

कोलकाता का लॉ मैसन डी लिवरेस क्लब तो केवल बच्चों के लिए ही बनाया गया है। दो बच्चों की मां दिवा जैन ने स्कूलों की पढ़ाई के तरीके से नाखुश होकर इस क्लब की शुरुआत की थी। वह कहती हैं, ‘ऐसा लगता है कि स्कूलों का सारा जोर केवल बच्चों को किताबों की सामग्री याद कराने और परीक्षा में उन्हें उगल देने तक ही रह गया है।’ लॉ मैसन क्लब ने शुरू में बच्चों से कहा कि वे किताबों के छोटे-छोटे अंश घर पर पढ़कर आएं और फिर उनके बारे में क्लब के भीतर चर्चा की जाती थी। दिवा कहती हैं, ‘अब इन बच्चों में पढऩे की आदत विकसित हो चुकी है जिसके चलते चर्चा का स्वरूप भी बदल गया है। अब हम बच्चों को उनकी उम्र और पढ़ाई की आदतों के आधार पर अलग-अलग समूहों में बांट देते हैं। अब हम किसी विचार को विकसित करने और चरित्र चित्रण जैसे पहलुओं पर अधिक बल देते हैं।’

लेकिन बुक क्लब को एकजुट बनाए रखने की भी अपनी चुनौतियां हैं। आयुष कहते हैं, ‘जब आप क्लब में दोस्त बना लेते हैं तो किसी नए सदस्य के लिए उसमें शामिल हो पाना आसान नहीं होता है। हमें इस पहलू को लेकर खासा सतर्क रहना पड़ता है।’ बीवाईओबी तो अपने नए सदस्यों को घुलने-मिलने का मौका देने के लिए खास मुलाकातें भी रखता है। ऐसे में साहित्य के प्रति अनुराग लोगों को एक दूसरे से जोडऩे का काम करता है और कभी-कभी तो यह रिश्ता काफी आगे तक चला जाता है।

बीवाईओबी की संस्थापक निधि हल्के-फुल्के अंदाज में कहती हैं, ‘हमारे कुछ सदस्य तो एक दूसरे के साथ डेटिंग भी कर रहे हैं।’ हालांकि कुछ बुक क्लब की बैठकें काफी खुली होती हैं लेकिन कुछ बैठकें किसी खास विषयवस्तु या विधा पर भी आधारित होती हैं। आयुष कहते हैं, ‘इन मुलाकातों से काफी कुछ सीखने को मिलता है। जैसे कि मुझे नहीं पता था कि हास्य विधा में इतना कुछ पढऩे के लिए है।’ निधि अपने बुक क्लब में एक लाइब्रेरी भी चलाती हैं जिसका रखरखाव वह खुद करती हैं। वह कहती हैं कि बुक क्लब में शामिल होने पर कई तरह के विचार भी जानने-समझने को मिलते हैं।

आम तौर पर यह माना जाता है कि बुक क्लब में शामिल होने वाले सदस्यों के पास काफी वक्त होता है। लेकिन अब तो किताबों के शौकीनों नौकरीशुदा पेशेवरों की भी अच्छी खासी तादाद है। कामकाजी पेशेवर अपनी व्यस्त दिनचर्या में से भी अपनी पसंदीदा किताबों पर चर्चा करने का मौका निकाल लेते हैं।

साभार- http://hindi.business-standard.com

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