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सौ साल पुरानी फिल्म कालिया मर्दन का जादू जो दर्शकों के सिर चढ़कर बोला

मुंबई के फिल्म प्रभाग द्वारा आए दिन यादगार, ऐतिहासिक व भुली बिसरी फिल्मों का प्रदर्शन आम दर्शकों के लिए किया जाता है जिसमें मुंबई के फिल्म प्रेमी बड़ी संख्या में पहुँचते भी हैं। इस बार फिल्म जगत के पितृ पुरुष स्व. दादा साहब फालके द्वारा सौ साल पहले निर्मित कालियामर्दन फिल्म का प्रदर्शन किया गया। सौ साल पहले भारत में मूक फिल्म बनती थी और परदे के पास संगीतकार व गायकों की टोलियाँ संगीत व गायन से दर्शकों का मनोरंजन करती थी। इस फिल्म का प्रदर्शन भी सौ साल पुरानी उसी परंपरा के साथ किया गया। ये प्रयोग इतना अद्भुत, रोमांचक व प्रभावोत्पादक था कि मात्र 45 मिनट की इस फिल्म के माध्यम से दर्शकों ने सौ साल पुराने फिल्मी युग को जी लिया, जो शायद कोई किताब पढ़ने और उसके बारे में पढ़े गए कितने ही किस्सों से ज्यादा असरकारक था। स अवसर पर स्व. दादा साहब फालके के परिवार की तीसी व चौथी पीढ़ी भी मौजूद थी। उनकी बेटी की बेटी के दामाद और बहू ने यादगार मर्मस्पर्शी और भावुक संस्मरण प्रस्तुत कर इस फिल्म के प्रदर्शन को यादगार बना दिया।

कालियामर्दन फिल्म भगवान श्री कृष्ण के बाल चरित्र और उनकी नटखट बाल लीलाओं के साथ ही यमुना में कालिया नाग के मर्दन की कहानी पर आधारित है।

फिल्म का एक एक दृश्य दर्शकों को रोमांचित और भावुक कर रहा था। फिल्म के साथ ही दर्शक जैसे किसी टाईम मशीन के माध्यम से सौ साल पहले के उस दौर में पहुँच गए, तब फिल्म निर्माण में तकनीक के नाम पर कैमरा होता था। मात्र एक कैमरे से बनी इस फिल्म ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। कृष्ण की भूमिका दादा साहब फालके की 5 वर्षीया बेटी मंदाकिनी ने निभाई थी।

फिल्मी परदे पर चल रहे दृश्य को संयोजित करके इसका संगीत देने के लिए संगीत मंडली मौजूद थी और संगीत की प्रस्तुति ने फिल्म की दर्शनीयता और प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया। तबले और पखावज पर पं. कालिनाथ की जादुई अंगुलियों ने रोमांच पैदा किया तो सुनील कांत गुप्ता की बाँसुरी की तान ने गजब ही ढा दिया।, वीणा पर नागराज मणि ने तो सितार पर प्रशांत रहाणे की स्वर लहरियों ने पूरी फिल्म के एक एक दृश्य को जीवंत कर दिया।

स्व. दादा साहब फालके की तीसरी पीढ़ी के दामाद श्री चन्द्रशेखर कुशालकर ने स्व, फालके से जुड़े यादगार संस्मरणों से पूरे माहौल को अतीत की यादगार स्मृतियों से भिगो दिया। उन्होंने बताया कि कृष्ण बनी मंदाकिनी को नदी में कुदाने वाले दृश्य के लिए दादा साहब खुद उसे कंधे पर लेकर नदी में कूदे थे, इसके बाद जब मंदाकिनी से पूछा कि तुझे अगर अकेले नदी में कूदना पड़े तो क्या करेगी, तो उसने जवाब दिया था आपके लिए तो मैं पुल पर से भी कूद जाऊंगी।

उन्होंने बताया कि मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में जब कालिया मर्दन फिल्म लगी तो दर्शकों की माँग पर 12 वर्षीया मंदाकिनी हर शो में दर्शकों को दर्शन देने के लिए बुलाई जाती थी और फिल्म खत्म होते ही दर्शक उसके पैर छूकर बाहर निकलते थे।

श्री चन्द्रशेखर कुशालकर ने बताया कि वे वे प्रोफेसर गावंड के साथ मिलकर एक टाक शो करते हैं जिसमें दादा साहब फालके से जुड़ी यादों को श्रोताओं के साथ साझा करते हैं। उन्होंने बताया कि दादा साहब ने गंगावतरण फिल्म के लिए खुद 17 गीत लिखे थे। उन्होंने कहा कि दादा साहब फालके ने अपनी जमा पूँजी लुटाकर आज से 150 साल पहले मात्र 50 हजार से भारत में जिस फिल्म उद्योग की शुरुआत की वह आज 50 हजार करोड़ का हो चुका है।

उन्होंने बताया कि दादा साहब फालके की कार आज भी नासिक के एक गैराज में पड़ी हुई है। कई सालों तक ये कार शादी के लिए दुल्हा-दुल्हन के प्रोसेशन के लिए काम आती रही और ऐसा भी समय था जब इस कार के लिए लोग शादी की तारीख और मुहुरत तक बदलवा लेते थे।

उन्होंने बताया कि दादा साहब फालके की पत्नी श्रीमती सावित्री बाई दादा साहब से 22 साल छोटी थी और उन्होंने जी जान लगाकर बाबा साहब को सहयोग नहीं दिया होता तो दादा साहब वो सब कुछ नहीं कर पाते जो उन्होंने कर दिखाया।

उन्होंने बताया कि स्व. दादा साहब फालके फिल्म निर्माण में हुए घाटे की वजह से फिल्मी दुनिया से संन्यास लेकर 3 साल के लिए बनारस चले गए थे। वहाँ उन्होंने रंगभूमि नामक 7 घंटे का नाटक लिखा, इस नाटक का मंचन दो दिन तक लगातार होता था। लेकिन इस नाटक का मंचन इतना महंगा था कि उनको खाली जेवब वापस मुंबई आना पड़ा।

इस अवसर पर दादा साहब की पौत्रवधू श्रीमती मृदुला कुशालकर ने कहा कि सावित्री बाई ने कंधे से कंधा मिलाकर दादा साहब के साथ काम किया। भारत सरकार को या फिल्म उद्योग को सावित्री बाई के नाम से किसी महिला फिल्मकार या फिल्म से जुड़ी महिला को प्रतिवर्ष सम्मान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि कैमरे के लिए रिफ्लेक्शन के लिए वो तीन चार घंटे सफेद डादर पकड़कर धूप में खड़ी होती थी। उन्होंने दादा साहब के सपनों को पूरा करने के लिए अपने गहने तक बेच दिए। दादा साहब ने सरस्वती बाई को फिल्म से जुड़े कई काम सिखाए, आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि उस समय फिल्म निर्माण के क्षेत्र मे सावित्री बाई का योगदान कितना चुनौतीपूर्ण था। तब फिल्में लंदन से आती थी, और उनको पंच करना होता था। सावित्री बाई ने फिल्मों को पंच करना सीखा। सेट पर वो प्रतिदिन 15-20 लोगों का नाश्ता, दो समय का खाना बनाती थी। खाने के बरतन भी खुद धोती थी। कई कलाकारों का उपवास होता था तो उनके लिए उपवास का खाना बनाती थी। रात को दो बजे तक जागर प्रिंटिंग का काम करती थी।

श्री चन्द्रशेखर कुशालकर ने माँग की कि दाद साहब को मरणोपांत भारत रत्न अलंगकरण से सम्मानित किया जाना चाहिए।

इस अवसर पर मौजूद अभिनेत्री दलजीत कौर ने कहा कि उन्होंने श्रीमती सावित्री बाई के नाम से एक पुरस्कार शुरु किया है जो फिल्म उद्योग के क्षेत्र में कार्यरत किसी महिला को दिया जाता है।

इस अवसर पर मुंबई फिल्म प्रभाग के महानिदेशक श्री प्रशांत पठराबे ने फिल्म प्रभाग की विभिन्न गतिविधियों की जानकारी दी। श्री चन्द्रशेखर कुशालकर ने फिल्म प्रभाग को सावित्री बाई का चित्र व रंग भूमि नाटक की स्क्रिप्ट भेंट की।

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