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कृष्ण का नाम ही उत्सव है

भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष अष्टमी । एक ऐसी विभूति का जन्म ,जिसने साधक और साध्य के मध्य की साधना को मनुष्यों के कर्म के रूप में स्थापित किया । प्रभाकर मीमांसक जिसे वाक्यांशो की समग्रता कहते हैं , उन वाक्यांशो की समग्रता रूपी अन्विताभिदानवाद को जिसने जीवन रूपी वाक्यांशो में चरितार्थ किया , और जिसने भाद्रपद मास के पारम्परिक मलयगिरि रंग की आभा के समान समस्त आभओं को स्वयं में समेट लिया , श्रीकृष्ण ।

जर्मन दार्शनिक विट्टगेन्स्टिन कहते हैं कि जो नहीं कहा जा सकता, उसे कहना भी नहीं चाहिए । और कृष्ण का जन्म , कुछ न् कहते हुए भी , मात्र कृष्ण के होने के कारण , सब कुछ व्यक्त कर देता है ।

जीवन के निहितार्थ क्या हो , जीवन के आयाम क्या हों ,जीवन की अनुभूतियाँ क्या हों , और जीवन की परिभाषा क्या हो , कृष्ण का जीवन इन सभी प्रश्नों का उत्तर है । शास्त्रीय संगीत में तीन गायन शैलियाँ होती हैं , मन्द्र में गाये जाने वाला ध्रुपद , मध्य में गाये जाने वाला ख़्याल और तार में गाये जाने वाला प्रेममय धमार । इन तीन सप्तकों के संतुलन से ही संगीत का माधुर्य प्रकट होता है । उसी प्रकार जीवन् के गाम्भीर्य रूपी ध्रुपद में ,जब तथागत के मध्य मार्ग रूपी ख़्याल और मीरा की भक्तिमय धमार का आध्यात्मिक संतुलन बैठता है, तो जिस उत्सव का प्राकट्य जीवन में होता है, उस उत्सव का नाम है श्रीकृष्ण ।

जीवन् की चाहे कोई भी परिस्थिति रही हो ,कृष्ण ने प्रत्येक परिस्थिति को एक उत्सव ,एक उल्लास बना दिया था । कहा जाता है कि आध्यात्मिक सत्य की खोज और व्याख्या एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है । हर युग अपने ढंग से अपनी परिस्थितियों के संदर्भ में सत्य के नए सोपानों का अन्वेषण करता है । और आध्यात्मिक सत्य की इस निरन्तर की जाने वाली खोज व अन्वेषण में जब भी मनुष्य को कहीं द्वंद हुआ ,जब भी मनुष्य कहीं किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ , तो उसे सदा ही कृष्ण की वो बात याद आयी — ” अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्व: सामासिकस्य च ” कि अक्षरों में मैं अकार और समास में द्वंद हूँ । तो आध्यात्मिक बारहखड़ी में जब प्रारम्भिक पग रूपी अकार और सत्यान्वेषी तार्किकता में आने वाले संकट रूपी द्वंद्व ही जब कृष्ण स्वरुप हो , तो हमें यह मानने में कोई समस्या नहीं होना चाहिए कि जीवन मे चाहे परिस्थिति कोई भी हो ,उसमें कृष्ण की उत्सवमयी उपस्थिति हम सदा ही अपने समीप पाते हैं । न्याय दर्शन ने तो ईश्वर को आत्मा ही कहा है जो कि चैतन्य से युक्त हैं । और वही चैतन्यता, जब मनुष्य के भीतर कृष्ण का उत्सव लेकर आती है ,तो मनुष्य चैतन्य महाप्रभु बनकर , पूरे भारत में हरे कृष्ण-हरे कृष्ण की ज्योत जलाता है । ये संकेत है इस बात का कि जब भी कहीं किसी मनुष्य के भीतर कृष्ण के उस आल्हाद रूपी आदित्य का उद्भव हुआ है , उसका प्रस्तुतीकरण सदा ही नृत्य रूपी प्रभात से हुआ है ।

गुप्तवंश के महानतम सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के राजदरबार के नौ रत्नों में से एक अमरसिंह , द्वारा रचित अमरकोष में उन अष्ट दिग्गज़ों का वर्णन किया गया है जिन्होंने कि इस पृथ्वी को अपने पर उठा रखा है । और दक्षिण भारत के शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य के सर्वाधिक लोकप्रिय शासक कृष्णदेवराय के राजदरबार में जो आठ रत्न थे ,वे अष्ट दिग्गज के नाम से जाने जाते थे । अतः ये स्वाभाविक ही है कि अष्ट दिग्गज रूपी अष्टमी तिथि पर जब रोहिणी नक्षत्र रूपी कोई व्यक्तित्व जन्म लेता है ,तो वो कृष्ण के नाम से ही जाना जाता है । जीवन के एक उत्सव , एक उल्लास , एक उमंग स्वरूप कृष्ण आप सभी के जीवन में प्रसन्नता , प्रमोद और प्रकाश का प्रादुर्भाव करें , ताकि उजास और उत्साह रूपी उस परम तत्व को आप प्राप्त कर सकें, जिसके होने का अर्थ ही है एक महोत्सव ।

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