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जीवन का प्राकृत स्वरुप ही उत्सव है

जीवन क्या है ?क्या नहीं है? यह तय करना सरल भी है! और चुनौती पूर्ण भी है!एक समझ यह भी है कि जीवन केवल जीवन है ,उससे कम या ज्यादा ,कुछ भी नहीं।पर यह तो बात को बढ़़ने ही नही देना है या शुरू होते ही खत्म करना है।जीवन सनातन होकर निरन्तरता का एक ऐसा सिलसिला है ,जो जन्म और मृत्यु का नियन्ता है।जन्म, जीवन के अंश जीव का साकार होना है और मृत्यु ,जीव का निराकार में लीन हो जाना है।इस तरह जीवन को सागर की लहरो की तरह जीव के साकार से निराकार होने का अंतहीन सिलसिला भी मान सकते है।जीव के लिये जीवन सबसे महत्वपूर्ण समय है, जिसके समाप्त होते ही, जीव का साकार स्वरूप भी अनन्त में व्याप्त हो जाता है।जीव, जीवन की महत्ता और उसके साकार स्वरूप का दीवाना है। इस कारण जीवकी मूल चाहना प्राय:यह होती है कि, वह साकार स्वरूप में रहे, अनन्त निराकार में जल्दी न समायें।शायद हममें से अधिकतर, जीव के प्राकृत स्वरुप में स्वयं तक ही सीमित न रहकर ,जीवन में हर प्रसंग का उत्सव मनाना चाहते हैं।प्रतिदिन सोना,जागना,उठना , घूमना, खाना पीना,कमाना आदि आदि।

शायद रोजमर्रा की एकरसता को बदलने के लिये हम सब जीवन के हर प्रसंग में ,सदैव कुछ न कुछ उत्सव करने की, सहज चाहना रखते है।इसका नतीज़ा यह है कि हममे से कई मनुष्यों को यह लगता है कि बिना उत्सव का जीवन भी कोई जीवन है पर यह भी वस्तुस्थिति है कि मनुष्य के अलावा कोई अन्य जीव मनुष्यों जैसा उत्सव नहीं मनाते हैं। उन सबका जीवनक्रम ही एक तरह से उत्सव हैं ।मनुष्येतर जीवो की अपनी भावाभिव्यक्ति तो हम महसूस कर पाते है पर मनुष्य द्वारा सृजित उत्सव परम्परा पर मनुष्यों का एकाधिकार जैसा लगता है,पर वास्तविकता में ऐसा है नहीं ।मनुष्येत्तर जीवन में उत्सव की अभिव्यक्ति का ढंग निराला है ।उसे देखने के लिये एक अलग अनुभूति और उत्सवदृष्टि होना जरूरी है।

जीवन के रुप स्वरूप,आकार प्रकार और जीवन चक्र में बहुत अधिक विविधताये है। मनुष्य के अलावा जीवन के उत्सव की अभिव्यक्ति देखने या अनुभव करने के लिये जीवन की अभिव्यक्तियों को देखपाने के लिये एक दृष्टा भाव और अनुभूतिमय धीरज जरूरी है।मनुष्येत्तर उत्सव परम्परा का एक निश्चित प्राकृतिक क्रम है वह मनुष्य की तरह सुविधानुसार और सकारण किसी निमित्तानुसार नहीं होता।जैसे वसन्त ऋतु मे आम पर मौर आना या आम का बौराना आम के उत्सव का प्रारम्भ है।आम पर फल आने की शुरूआत छोटी छोटी केरियो से लेकर लटालूम आमो से पेड़ का लद जाना ,आम की उत्सवधर्मिता का चरम है।छोटे बड़े बच्चों से लेकर कई तरह के पक्षियो का “आम फल उत्सव “मे अधिकारपूर्वक भागीदारी करना , यह सब आमवृक्ष की उत्सव परम्परा की धीर-गंभीर प्राकृतव्यवस्था का हम सबको अहसास कराता है।आम के मौरो पर मंडराने वाली मधुमक्खियां उत्सव की शुरुआत में ही उत्सव के सानन्द समापन की आधारभूमि तय कर देती हैं ।कभी किसी वर्ष आम के पेड़ पर मौर नहीं आते और उस साल केवल नये नये पत्ते ही आते हैं और नये पत्तों को पतझड़ आने तक बिना किसी उत्सव या चहल पहल के ही ,सूनेपन के सानिध्य से ही संतोष करना होता है।

हरसिंगार पर जो फूलो की बहार आती है तो हर सुबह अपनी आधार भूमि को हरसिंगार अपने पुष्पो की चादर ओढ़ाकर ,जीवनदात्री धरती का अभिनन्दन करता है।हरितिमा से सराबोर गेहूं और धान के खेतों मे उत्सव की शुरूआत बालियों की बारात निकलने से होती है जो तो मक्का ,जुवार,बाजरा के भुट्टों का आगमन अनाज उत्सव की शुरूआत कर छोटी बड़ी चिड़ियाओं को भोजन उत्सव का खुला मौन निमंत्रण दे देता है।ठंड की शुरूआत होते ही न जाने कितने रंग-बिरंगे फूलो के खिलने पर रंग-बिरंगी तितलियों को अपने आसपास निरन्तर अटखेलियां कर, तितलियों का उड़ान उत्सव अपने आप समूची अवनी और अम्बर को रंगीन बना देता है।तरह तरह की सुगंधों से सराबोर मोगरा, चमेली ,रातरानी जैसे छोटे छोटे फूल सारे वातावरण में खुशनुमा खुशबू व्याप्त कर उत्सव की सूचना हर दिशा में फैला देते है।

ठण्ड की बिदाई और गर्मी का आगमन सारे उत्सवों को संन्यास परम्परा की ओर धकेल देता है।सन्नाटे की कड़ी धूप में जीवन की सारी चहलपहल ध्यानस्थ गतिविधिविहीन सन्यासी बन जाती हैं। हरीतिमा से भरपूर जंगल, पहाड़, घास के मैदान जलविहीन याने जीवनविहीन हो धीरे धीरे पीले पडते जाते है और गर्मी में गेरूआ रूप रंग धारण कर लेते हैं।इस तरह निस्तब्ध संन्यास शांति से अपने आप को एकाकार कर मौन को मुखर कर देता हैं। गर्मी में झुलसा हुआ सूखा जीवन, बारिश की बूंदों के स्पर्श मात्र से ,अलसाये सुप्त जीवन को, सबकहीं नये उत्सव के आगमन सूचना देने को आतुर हो, धरती में चारोऔर व्याप्त सूखे संन्यास के प्रतीक गेरूआ रंग को फिर से कल-कल बहती छोटी बड़ी नदियो के पानी में, अपने अल्पकालीन ग्रीष्मावकाशी गेरूआ रंग रूपी संन्यास को धोकर, उसे अनन्त जल में प्रवाहित करते हुए, धरती के जीवन में हरियाली और खुशहाली के नये उत्सव की उदधोषणा करता है।बरखा की बूंदें जीवन ही उत्सव है यह संदेश दे धरती के हर कण में बदलाव का नयादौर ,जीवन के नये नये अंकुरों का उदय कर पुन:जीवन उत्सव मे भागीदार बनने का अवसर देता है।

हम सब जो जीवन के किसी न किसी रुप में इस धरती पर जीव के रुप में व्यक्त हुए है।हम सब चाहे न चाहे,माने न माने हम सबका जीवन ही उत्सव है ।तभी तो जीव मात्र की उत्सवधर्मिता जीवन भर गतिशील रहकर इस धरती में जीवन को सतत प्रवाहमय बनाये हुए है।इसी से हर समय सहज प्राकृत स्वरूप में उत्सव, हमे और हमारी धरती के सभी जीवो के, जीवन के सनातन क्रम को, हर क्षण नये जीवनचक्र में आगे बढ़ाते हैऔर जीवन के उत्सव प्रसंगों से , जीवन का क्रम तथा अर्थ समझाते रहते है।इसी से जीवन और उत्सव हमारे जीवन में सनातन रूप से रचे बसे है।तभी तो हमारी धरती पर सारे जीवों का जीवन ही उत्सव है।जीवन को उत्सव कहना तो सरल है।पर जीवन भर मनुष्यों का मन आशा निराशा,राग और द्वेष,लोभ लालच और सत्य असत्य के आसपास ही घूमता रहता है।मनुष्येत्तर जीवन में यह सब मौजूद नहीं हैं।जीवन अपने प्राकृत स्वरूप में ऊर्जा की जैविक अभिव्यक्ति है।जिसमें मूलत:जीवन की जीवन्त हलचले ही होती है।जीवन की जीवन्त हलचले ही उत्सवों का सृजनात्मक स्वरूप है जो सारे जीवों में भिन्न भिन्न रूपों में निरन्तर अभिव्यक्त होता है।

अनिल त्रिवेदी
त्रिवेदी परिसर,३०४/२भोलाराम उस्ताद मार्ग,
ग्राम पिपल्याराव,ए बी रोड़ इन्दौर मप्र
Email [email protected]
Mob 9329947486

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