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जिस अफसर ने नीति बनाई, उसीने अंबानी के जियो की वकालात की

प्रस्तावित जियो इंस्टीट्यूट को इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का दर्जा दिलाने के लिए खुद रिलायंस इंडस्ट्रीज के सीएमडी मुकेश अंबानी ने मोर्चा संभाल रखा था। छह इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का चयन करनेवाली कमिटी के सामने खुद अंबानी ने प्रजेंटेशन दिया था। उनके साथ थे विनय शील ओबरॉय, जिन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय में उच्च शिक्षा सचिव के पद से रिटायर होने के सालभर बाद एजुकेशन के मामले में अडवाइजर के रूप में रिलायंस को जॉइन किया था।

ओबरॉय के नेतृत्व में 8 सदस्यों की एक टीम पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी की अध्यक्षता वाली एंपावर्ड एक्सपर्ट कमिटी के सामने प्रजेंटेशन देने के लिए नई दिल्ली आई थी, लेकिन प्रजेंटेशन खुद अंबानी ने दिया। बताया जा रहा है कि कमिटी के हर सवाल का जवाब उन्होंने ही दिया था। बताया जाता है कि अंबानी ने ऐसा ही प्रस्ताव यूपीए सरकार के वक्त भी दिया था, जब विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों के प्रस्ताव पर विचार चल रहा था।

ओबरॉय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग में मार्च 2016 में टॉप पोस्ट पर थे, जब वर्ल्ड क्लास इंस्टीट्यूट्स या इंस्टीट्यूट्स ऑफ एमिनेंस की स्कीम की घोषणा केंद्रीय बजट में की गई थी। ओबराय के एचआरडी सेक्रटरी रहते इस स्कीम पर मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच गहन चर्चा हुई थी। हालांकि वह फरवरी 2017 में रिटायर हो गए और इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस रेग्युलेशंस की घोषणा सितंबर 2017 में की गई थी। ईईसी का गठन फरवरी 2018 में हुआ और इस साल अप्रैल से प्रजेंटेशंस की शुरुआत हुई।

नियम यह है कि रिटायरमेंट के बाद सालभर तक आईएएस ऑफिसर कोई कमर्शल ऑफर स्वीकार नहीं कर सकते। 1979 बैच के आईएएस ऑफिसर ओबरॉय ने मार्च 2018 के बाद रिलायंस के साथ नया सफर शुरू किया था। इस मुद्दे पर रिलायंस ने ईटी के सवालों के जवाब नहीं दिए। ओबरॉय ने भी रिलायंस के साथ जुड़ने को लेकर ईटी की कॉल्स और मेसेज का जवाब नहीं दिया।

साभार- इकॉनॉमिक टाइम्स से



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