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संसदीय गरिमा के समक्ष पस्त होते लोकतंत्र का दर्द!

लोकसभा ठप है। चल नहीं रही है। हंगामा हो रहा है। सरकार सदन चलाना चाहती है। लेकिन विपक्ष अड़ा हुआ है। सरकार के आगे खड़ा हुआ है। जनता के लिए भिड़ा हुआ है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तरीके से चल रहे हैं। कहावतें भले ही सौ दिन में अढाई कोस चलने की हो। लेकिन पंद्रह दिन से ज्यादा वक्त हो गया हैं। सदन कुछ घंटे भी नहीं चला है। देश कतार में खड़ा है। और राहुल गांधी नए अवतार में। मामला नोटबंदी का है। सदन ठप है। प्रधानमंत्री ने विपक्ष को अलोकतांत्रिक बताया है। तो, राहुल गांधी बांहें चढ़ाकर सरकार से भिड़ रहे हैं। विपक्ष खुश हैं कि वह संसद नहीं चलने देने में सफल है। और हर सरकार तो सिर्फ सरकारों जैसी ही हुआ करती है। मगर वरिष्ठजन दुखी हैं। महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी कह रहे थे कि लोकतंत्र में इस तरह से सदन का न चलना घातक है। उन्होंने संसद में कामकाज नहीं होने पर नाराजगी जताई। वे गए तो थे रक्षा संपदा पर भाषण देने। लेकिन संसदीय शिथिलता से संतप्त राष्ट्रपति बिफर पड़े। विपक्ष को फटकारा। बोले, सांसद सदन में बोलने आते हैं। धरना देने नहीं। संसद धरना देने की जगह नहीं है। यही करना है तो कहीं और कीजिए।

प्रणब मुखर्जी अनेक बार सांसद रहे हैं। सो, आहत थे। इतने आहत कि विपक्ष को यहां तक साफ साफ कह दिया कि आप लोग बहुमत की आवाज को दबा रहे हैं। लोकतंत्र को चोट पहुंचा रहे हैं। सिर्फ अल्पमत ही सदन के बीचों बीच आता है। नारेबाजी करता है। कार्यवाही रोकता है। और ऐसे हालात पैदा करता है कि अध्यक्ष के पास सदन स्थगित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। विपक्ष का यह रवैया यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। राष्ट्रपति ने बात तो ठीक ही कही। लेकिन विपक्ष यह नहीं करेगा, तो राहुल गांधी की राजनीति कैसे निखरेगी। दो साल में जैसे तैसे तो नोटबंदी का मामला हाथ में आया है। जिस पर सरकार को जमकर घेरा जा सके। सारा विपक्ष एक हो सके। वरना, तो सारे आपसे में ही उलझे पड़े हैं। सो, संसद ठप नहीं करे, तो क्या करे।

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अपने राष्ट्रपति कोई इतने भोले नहीं है कि उन्हें यह सब पता नहीं है। वे सब जानते हैं कि उन्हें राष्ट्रपति बनानेवाली सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी के पास यही तो एकमात्र यही तो अवसर है, जिसके जरिए वे अपनी राजनीति चमका सकते हैं। जानते हैं कि पहली बार सारे विपक्ष ने राहुल गांधी को नेता के रूप में आगे किया है। लेकिन महामहिम होने की भी अपनी अलग किस्म की मर्यादाएं हुआ करती हैं। सो, बोलना पड़ता है। सब समझते हुए भी लोकतंत्र की दुहाई देने की मजबूरी को जीना पड़ता है। खैर, राष्ट्रपति तो राष्ट्रपति। मगर, अटलजी की सरकार के लौहपुरुष अपने लालकृष्ण आडवाणी भी बिफर पड़े। वे भी नाराज।

हालांकि, नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद से वैसे भी वे कहां खुश थे। पर, दो साल से पूरी तरह चुप थे। मगर नोटबंदी ने उन्हें भी सक्रिय कर दिया। लोकसभा न चलने देने पर आडवाणी को बहाना मिल गया। ऐसे भड़के कि तेवर देखने लाय़क थे। राष्ट्रपति ने तो विपक्ष को लताड़ा। राहुल गांधी मोदी को ललकार रहे हैं। लेकिन बूढ़ा शेर भी दहाड़ा। आडवाणी अपनों पर ही भड़क उठे। बोले, न स्पीकर सदन चला पा रही हैं और न ही संसदीय कार्यमंत्री। उन्होंने गुस्से में कहा कि लोकसभा को रोज रोज स्थगित करने के बजाय क्यों न अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया जाए। आडवाणी 89 को हो गए हैं। बहुत ज्यादा बुजुर्ग हो गए है। अपनी सलाह है कि चुप ही रहिए। नई सरकार ने वैसे भी उनकी राजनीतिक नैया ठिकाने लगी दी हैं और पार्टी में भी पूरी तरह से दरकिनार जैसे ही हैं। सिर्फ श्रद्धामूर्ति की तरह पार्टी कार्यक्रमों में मंच पर बिराजने का सम्मान बचा है। अपना मानना है कि चुप नहीं रहे तो वह सम्मान भी जाता रहेगा। राजनीति कुल मिलाकर सिर्फ ताकत का खेल है। और किसी भी खेल में वैसे भी कौन किसका सम्मान करता है!



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