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सवाल यह भी तो है कि अब उपराष्ट्रपति कौन होगा?

राष्ट्रपति तो रामनाथ कोविंद होंगे, लेकिन उपराष्ट्रपति कौन होगा। भैरोंसिंह शेखावत की तरह कोई तेजतर्रार राजनीतिक व्यक्ति उपराष्ट्रपति बना, तो वह राष्ट्रपति पद पर बैठे कोविंद के कद पर भारी पड़ जाएगा। क्योंकि कोविंद पद में भले ही बड़े साहित हो सकते हैं, कद से नहीं। और राजनीति की दिक्कत यही है कि यहां कद से भारी व्यक्ति ही बड़ा साबित होता है। सो, दिक्कत यही है कि अब उपराष्ट्रपति किसे बनाया जाए।

राष्ट्रपति चुनाव के बीच ही उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। संभावित नामों पर चर्चा भी राजनीति में हर किसी की जुबान पर है। लेकिन देश के दो सर्वोच्च पदों के निर्वाचन की इस चर्चा के बीच अपना दावा है कि उपराष्ट्रपति पद पर निश्चित रूप से कोई हाई प्रोफाइल नेता तो नहीं आएगा। जो भी नाम होगा, वह कोई अनजाना सा ही होगा। और जाना पहचाना भी होगा, तो कम से कम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति बनने जा रहे रामनाथ कोविंद से बड़ा नाम तो नहीं होगा। वैसे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी जो कर ले वही कम। लेकिन निश्चित रूप से कोई भी बहुत बड़ा नाम नहीं होगा। क्योंकि अगर राजनीतिक रूप से किसी बड़े व्यक्ति तो बनाया गया, तो वह उपराष्ट्रपति के पद पर होने के बावजूद अपने राजनीतिक कद की वजह से राष्ट्रपति के मुकाबले ज्यादा भारी लगेगा।

वैसे, भैरोंसिंह शेखावत अब इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए अब यह सब कहने का भले ही राजनीतिक रूप से कोई अर्थ नहीं रह जाता कि वे अब तक के सबसे श्रेष्ठ उपराष्ट्रपति थे। लेकिन वर्तमान राजनीतिक संदर्भों में उनकी याद बहुत वाजिब है। वे आदमकद के आदमी थे और मनुष्य के तौर पर महान तो थे ही। वे राजनीति में रहते हुए भी एक बेहद सधे हुए इंसान थे और जब देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर पहुंचे, तो शेखावत ने उस निष्क्रिय से लगनेवाले उपराष्ट्रपति के पद को भी सक्रिय कर दिया था। भैरोंसिंह शेखावत तो खैर, राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी थे और उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए अपने राजनीतिक प्रोफाइल को बहुत संभालकर रखते हुए उन्होंने राष्ट्रपति पद पर बैठे एपीजे अब्दुल कलाम के साथ अपनी कभी तुलना भी नहीं होने दी। फिर कलाम गैर राजनीतिक व्यक्ति थे, यह भी शेखावत के लिए सुविधा का मामला था, सो तुलना के अवसर भी कम ही आए। पर, यह सच है कि कोविंद का राजनीतिक कद उतना बड़ा नहीं है, जितना बड़ा राष्ट्रपति का पद है। इसीलिए यह कहा जा रहा है कि वे जीते, तो अपने राजनीतिक कद के मुकाबले बहुत बड़े पद पर जाएंगे। लेकिन अगर सक्रिय राजनीति में से उठाकर किसी को किसी राजनेता को उपराष्ट्रपति पद पर बिठा दिया गया, तो निश्चित रूप से वह राष्ट्रपति पर भारी साबित होगा।

इसलिए, उपराष्ट्रपति पद पर कोई गैर राजनीतिक व्यक्ति आया, तो राष्ट्रपति पद की गरिमा बनी रहेगी, वरना अब तक के इतिहास का सारा संतुलन बिगड़ जाएगा। अपनी नजर में इस वक्त महाराष्ट्र और तमिलनाडु के मौज़ूदा राज्यपाल सी. विद्यासागर राव ही देश में एक ही ऐसे आदमी हैं, जो उपराष्ट्रपति के पद पर जा सकते है। क्योंकि उनका वहां जाना राष्ट्रपति पद पर बैठे रामनाथ कोविंद के कद पर भारी साबित नहीं होगा, और राजनीतिक रूप से मजबूत तो विद्यासागर राव हैं ही। वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्र में मंत्री रहे हैं, और मूल रूप से उस आंध्र प्रदेश के निवासी हैं, जिसमें पहले तेलंगाना भी समाया हुआ था। दक्षिणी राज्य तमिलनाड़ु के वे राज्यपाल भी है। सो, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाड़ु से उनका जुड़ाव भी उन्हें जीत में ज्यादा समर्थन दिला सकता है। गुजरात में पटेलों से पार पाने के लिए गुजरात की मुख्यमंत्री रहीं आनंदीबेन पटेल भी उपराष्ट्रपति बनाई सकती है। वे प्रधानमंत्री मोदी की करीबी भी हैं और उनके जरिए किसी महिला को देश की पहली उपराष्ट्रपति बनाने का श्रेय भी बीजेपी को मिल सकता है। फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों एक ही प्रदेश से होंगे। यही सवाल अमित शाह जब भाजपा अध्यक्ष बने थे, तब भी आखिर उछला ही था ना।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राष्ट्रपति पद के लिए नाम घोषित करने के मामले में अंत तक सभी को सस्पेंस में रखा। इसी कारण उपराष्ट्रपति के मामले में भी सभी की निगाहें प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की तरफ ही है। इसीलिए फिलहाल तो, कोई दावा नहीं कर सकता और उपराष्ट्रपति के लिए किसकी दावेदारी सबसे ज़्यादा मज़बूत है, यह भी कोई नहीं कह सकता। कोई अनुमान भी नहीं लगा रहा। चुनाव आयोग उपराष्ट्रपति पद के चुनाव की तैयारी पूरी कर चुका है। वर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कार्यकाल सात अगस्त को पूरा हो रहा है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पांच अगस्त को होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव में राज्यसभा और लोकसभा के सदस्य वोट डालेंगे। शाम तक नतीजे भी देश के सामने होंगे। पांच अगस्त को जो जीतेगा, वह 7 अगस्त को कार्यभार संभालेगा।

कायदे से उपराष्ट्रपति राज्य सभा के सभापति भी होते हैं। यह वही राज्यसभा है, जहां मोदी और शाह की पार्टी का गठबंधन संख्याबल में कमजोर है। सो, उनकी कोशिश तो यही है कि उनका कोई राजनीतिक व्यक्ति इस पद पर बैठे। लेकिन कोविंद के कमजोर राजनीतिक कद ने मोदी और शाह की इस ताकतवर जोड़ी को भी मुश्किल में डाल दिया लगता है। हालांकि बहुत आसान है कि भारत सरकार के मंत्रिमंडल में से किसी को उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ा दिया जाए। लेकिन प्रधानमंत्री संसदीय दल की साफ कर चुके हैं कि वे अपने किसी भी मंत्री को फिलहाल छोड़ना नहीं चाहते। वैसे भी सरकार में एक एक मंत्री कई सारे विभागों का कामकाज देख रहा है, और 2019 के आम चुनाव से पहले बड़े राजनीतिक कद के कई व्यक्तियों की प्रधानमंत्री मोदी को जरूरत रहेगी। सो, कौन होगा अगला उपराष्ट्रपति, यह सबसे बड़ा सवाल है। और बड़े सवालों की राजनीति में अनुमान लगाने के राजनीतिक खेल नहीं चला करते। सो, इंतजार कीजिए और देखते रहिए – मोदी और शाह किसे उपराष्ट्रपति बनाते हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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