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नियम तो एक सजा है

हम भारत के लोग हमेशा से नियम तोड़ने में विश्वास रखते है। नियम में रहे तो क्या जीवन। जीवन तो अलमस्त हो तभी मजा है। नियम तो वैसे भी गले में रस्सी जैसा होता है। साला एक सीमा में रहो इससे ज्यादा कुछ मत करो पर हम तो कुछ अलग करने में विश्वास रखते है और नियम-कानून इन सब को तोड़ कर ही सब कुछ करते है।

सरकार ने जब से सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया है। बाजार में, पार्टीयों में तांबे के लोटे और स्टील के गिलास फिर से अपना अस्तित्व जमाने के लिए प्रयास रत है । लेकिन कई सुधिजन है जो लोटे और स्टील के गिलास को हेय दृष्टि से देखते हुए बाजार से दबे छुपे जुगाड़ लगाकर डिस्पोजल गिलास, कटोरी और चम्मच से ही पार्टीयों में मजे उड़ा रहे है । कोई सरकारी नियम का हवाला दे तो कहते है नियम में मजा लिया तो क्या मजा है । नियम तो एक सजा है।

स्वच्छ भारत अभियान चलाया जा रहा है। हमसे ही टेक्स की अतिरिक्त राशि ले कर नगर पालिक निगम हमारे शहर को साफ सुथरा बनाने में लगी है ताकि भविष्य में नम्बर वन का अवार्ड मिल जाए और नेता व अधिकारी तरह-तरह से अनुरोध कर रहे है कि शहर साफ रखे गंदगी न फैलाए वरना जुर्माना लगेगा लेकिन मजाल है कि हम नियम का पालन करे । अभी नवरात्र में खीर और खीचड़ी का प्रसाद मंदिर के बाहर सड़क पर लोगो को पकड़-पकड़ कर बांटा । लोगों ने भी खाया और दोना सड़क पर फैका और चल दिए । नियम तोड़ा सार्वजनिक रूप से पर किसी अधिकारी के बाप की ताकत नहीं की प्रसाद बांटने या खाने वाले पर जुर्माना लगा सके ।सड़क पर बारात और जुलूसों में तो ये नियम डंके की चोट पर हम तोड़ते है ।

चौराहे पर सिग्नल तोड़ कर निकलना तो जैसे गर्व की बात हो इस तरह से लोग लाल बत्ती में तेज गति से निकलते है जैसे नियम इनके बाप की जागीर हो । और जो नहीं निकल पाते या वर्दी वाले के डर के मारे हिम्मत नहीं कर पाते उनका काम नियम की दुहाई देना और मन मसोसकर हरी बत्ती का इंतजार होता है।

मंदिर हो या सिनेमा घर लाईन तोड़कर नियम विरुद्ध जुगाड़ लगा कर आगे लाईन में लगकर होशियार बनने का अवसर कोई भारतवासी नहीं चूकता। ये बात अलग है कि लाख कोशिश के बावजूद कोई पहचान वाला नहीं दिखे और कोई दूसरा जुगाड़ लगा कर निकल जाए तो ईमानदारी की दुहाई देने लगते है।

रेल की टिकट खिड़की पर ‘भय्या रेल निकल जाएगी प्लीज़ हमें टिकट ले लेने दिजिए’ की स्थिति से लगभग हर कोई वाकिफ है । बाकी लाईन में खड़े 50-60 लोग बेवकूफ की तरह उस भय्या वाले या वाली को देखते रहते है और वो घर से देरी से आकर सबको धत्ता दे कर नियम विरुद्ध टिकट ले कर खुशी-खुशी प्लेटफार्म की ओर बढ़ जाते है । बाकी सब मन ही मन कुढ़ते रहते है।

देश की सरकार से लेकर किसी भी छोटे बड़े आयोजन के मंच का माईक जिनके पास होता है। वो सारे नियम तोड़ने का अधिकार रखता है। दो मिनट का समय दो घंटे में भी पूरा नहीं होता। लगता है ब्रह्मा के दो मिनट को मृत्यूलोक में लागु करने का प्रयास कर रहे है। जब तक संचालक हाथ में पर्ची न थमा दे तब तक भरे सदन नियम तोड़ने का मजा लेते रहते है।आखिर नियम से जिए तो क्या जिए मजा तो नियम तोड़ने में है।

-संदीप सृजन
संपादक – शाश्वत सृजन
ए-99 वी. डी. मार्केट, उज्जैन
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इमेल- [email protected]

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